रविवार, 6 जुलाई 2014

मौसम की तरह तुम भी बदल तो न जाओगे


-संजय द्विवेदी
    उनका संकट यह है कि उन्हें अरसे बाद देश में एक ऐसी सरकार का नेतृत्व करने का अवसर मिला है, जो पूर्ण बहुमत की सरकार है। जिसके साथ प्रबल जनादेश और जनांकांक्षाएं संयुक्त हैं। जाहिर तौर पर समर्थ राजनीतिक नेतृत्व के बिना दस साल तक चली यूपीए सरकार के मुकाबले वे ज्यादा आदमकद और सरोकारी राजनेता हैं। गुजरात में अपने कामकाज और बेहद धारदार चुनाव अभियान चलाकर वे वैसे भी आकांक्षाओं का विस्तार जरूरत से ज्यादा कर चुके हैं। नरेंद्र मोदी का वर्णन इससे ज्यादा भी किया जा सकता है, किंतु मोदी अब केंद्रीय सत्ता में हैं जो उनके लिए एक अनजानी जगह है।
   यहां यह भी स्वीकारना होगा कि उनके विरोधी बेहद चतुर-चालाक और सत्ता संविमर्श में दशकों से लगे हुए लोग हैं। वे इतने टीवी और मीडिया चपल हैं कि एक महीने में ही अच्छे दिन आने वाले हैं के नारे को एक मजाक में बदल चुके हैं। यह देखना भी रोचक है कि मप्र से लेकर दिल्ली तक कांग्रेस अब महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़क पर संघर्ष कर रही है। तो क्या महंगाई अलग-अलग होती है? मनमोहन और मोदी की महंगाई का अंतर क्या है? जाहिर तौर पर जनता को इन सवालों से मतलब नहीं होता, उसे राहत चाहिए, जीवन जीने की न्यूनतम जरूरतें पूरी होनी चाहिए। उसे राज और ताज बदलने से बहुत मतलब नहीं होता। उसने बदलाव इसी आशा से किया है कि उसके अच्छे दिन आएंगें। क्योंकि चुनावी मैदान में यह वादा करने वाले मोदी अकेले थे इसलिए जनता ने उनके सर्वाधिक सांसदों को चुनकर भेजा। शेष राजनीतिक दल महंगाई, भ्रष्टाचार और निर्णयहीनता से लड़ने के बजाए मोदी को रोकने में लगे थे, ऐसे में मोदी को वे अतिरिक्त ताकत और सहानुभूति दोनों दे रहे थे। इस अभूतपूर्व चुनाव के परिणाम बताते हैं कि लोग आज भी उम्मीदों से खाली नहीं हैं और वे एक नई तरह की राजनीति को जन्म देना चाहते हैं। राजनीतिक दलों के तमाम किंतु-परंतु के बावजूद देश की जनता एक नई राजनीतिक शैली को पसंद कर रही है और उसे ताकत दे रही है।
   एक विशाल देश की आकांक्षाएं और सपने जाहिर तौर पर एक नहीं हो सकते। दिल्ली को इसे समझकर कदम उठाने होंगें किंतु देश आगे बढ़े और जनता का एजेंडा राजनीति का भी एजेंडा बने यह सोच सबकी है। सत्ता पर नियंत्रण और राजनीतिक दलों पर सामाजिक समूहों का निरंतर दबाव जरूरी है। वरना सत्ता मनमाने व्यवहार से जनविरोधी चरित्र जल्दी ही ओढ़ लेती है। पांच साल का जनादेश उसे शासन करने का प्रमाणपत्र लगने लगता है। एक अतिरिक्त अहंकार के बोझ से दबी हमारी राष्ट्रीय राजनीति और नौकरशाही की नजर में हम भारतीय सबसे निकम्मे,काहिल और बेईमान लोग दिखने लगते हैं। दिल्ली में बैठे राजपुत्रों को दो समय के भोजन के बंदोबस्त में जुटा भारत नजर नहीं आता है और यहीं जनता और सत्ता से रिश्ते टूट जाते हैं। अंग्रेजी राज की मानसिकता और अंग्रेजी कानूनों से देश आज भी मुक्त नहीं है। जनसेवक और लोकसेवक की परिभाषा में आने वाले पदाधिकारी आज भी अपने को साहब कहलाना पसंद करते हैं, उनके लिए आमजन तो सेवक और नौकर सरीखे ही होंगें। जिस मानसिकता से अंग्रेज नौकरशाही हम भारतीयों को हेय दृष्टि से, हिकारत की नजर से देखती थी, हमें काहिल-कामजोर, नमक हराम समझकर दमनचक्र चलाती थी, उसमें बदलाव कहां आया है? साहब आज भी साहब है। लोकतंत्र के सात दशक की यात्रा सिर्फ आम भारतीय के अपमान और तिरस्कार की यात्रा बनकर रह गयी है। पांच रूपए, एक रूपए में भरपेट भोजन हमें मिलता है, यह बताने वाली राजनीति और नौकरशाही की खुद की एक थाली कितने में पड़ती है, उसका भी हिसाब लेने की जरूरत है। अखबार आपको बता ही रहे हैं एक गरीब राज्य छत्तीसगढ़ के विधानसभा अध्यक्ष के बंगले में कितने एसी लगाए गए हैं। यह प्रतीकात्मक सूचनाएं बताती हैं कि हिंदुस्तान कहां से और कितना बदला है।
  सरकारी अफसरों की अकड़, हेकड़ी और देहभाषा देखिए उनके लिए आम जनता तो छोड़िए सामान्य आम जनप्रतिनिधि भी कोई मायने नहीं रखता। उन्हें साहब कहलाना और साहबी दिखाना पसंद है। जिस भारतीय आम जन को हम निकम्मा समझने की अंग्रेजी सरकार की मानसिकता से ग्रस्त हैं, अपना चश्मा उतारेंगें तो आपको इनमें ही श्रमदेव और श्रमदेवियां नजर आएंगीं। एक गरीब देश और उसके अमीर शासक। यह देश अफसरों की फौज और राजनेताओं को इतनी सुविधाएं साधन इसलिए दे रहा है कि ये इन सुविधाओं को पाकर अपेक्षित संवेदनशीलता के साथ जनता के एजेंडे पर काम करेंगें। किंतु सत्ता पाकर लोगों की दृष्टि और सृष्टि दोनों बदल जाती है।
     दिल्ली की सत्ता पर ऐसे समय में नरेंद्र मोदी का आगमन एक ठंडी हवा के झोंके की तरह है, क्योंकि वे मनमोहन सिंह की तरह इंडिया नहीं भारत के प्रतिनिधि हैं। वे गांवों के दर्द, उसकी गरीबी और संघर्ष को जानते हैं। दिल्ली उन्हें बदल न सके इसके लिए हम सबको प्रार्थना करनी चाहिए। उनके जीवन के अनुभव और उनकी समूची जीवन यात्रा उम्मीदों को जागने वाली है। देश ने उनके इसी देशीपने पर मुग्ध होकर उन्हें स्वीकारा है। खतरा यहीं बड़ा है कि वे जनादेश पा चुके हैं और लुटियंस जोन को क्रेक कर चुके हैं। कल तक जो ताकतें उन्हें दिल्ली न आने देने के लिए सारे जुगत लगा रही थीं और इसमें उनके दल के अंदर-बाहर के लोग भी शामिल थे, अब वे उनका अनूकूलन करने का प्रयास करेंगें। दिल्ली आपको अपने जैसा बना लेती है या फिर वेबफा हो जाती है। नरेंद्र मोदी अपार जनशक्ति से समर्थन से वहां पहुंचे हैं तो उम्मीद की जानी चाहिए कि वे इस जनविश्वास की रक्षा करते हुए शासन-प्रशासन में आम आदमी के लिए ज्यादा संवेदना का विस्तार करेंगें। वे उन इलाकों पर भी ध्यान देंगें जहां असली नक्सलियों से ज्यादा लूट और अत्याचार शासन का खुद का तंत्र और उद्योंगों कर रहे हैं। वे इस बात को समझने की कोशिश करेंगें कि क्यों जमीनों, जंगलों और पानी की लूट का माहौल बना हुआ है और उन लोगों की परवाह किए बिना जो इन संसाधनों पर अपना पहला हक रखते हैं। सवाल यह भी हैं कि सरकार एक व्यापारी की तरह काम करेगी या एक संवेदनशील मानवीय आचरण भी करेगी। दिल्ली की बेरहमी के किस्से हमारे इतिहास में बिखरे पड़े हैं। दिल्ली के बारे में हमारे समय के एक बड़े कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना लिखते हैं-
दिल्ली हमका चाकर कीन्ह
दिल दिमाग भूसा भर-दीन्ह।

  इतिहास की इस घड़ी में समूचा देश नरेंद्र मोदी को दिल्ली में रहकर भी देशी आदमी बने रहने की प्रार्थना प्रभु से कर रहा है। वह उम्मीद कर रहा है कि वे देश की राजधानी को उस सोच से मुक्त कराएंगें जिसमें आम भारतीय के बारे में अच्छी धारणा नहीं है। उस प्रशासन तंत्र में संवेदना भरने का काम भी करेंगें जिसे भारतीयता, उसके मूल्यों, संस्कृति और यहां के लोगों से दूरी बनाना ही पसंद है। वह भारतीय मेघा का सम्मान करने वाला वातावरण भी बनाने का काम करेंगें। हिंदुस्तान को समझकर झकझोरने और इस देश की एकता के लिए गुजरात से आए नायकों स्वामी दयांनद, महात्मा गांधी और सरदार पटेल ने अभूतपूर्व काम किया है। सही मायने में हमारे अंदर सोये हुए मनुष्य को जगाने, झकझोरने और एक भारतीय दृष्टि से सोचने का जो जज्बा महात्मा गांधी ने हमें दिया वह आज हमारा मार्गदर्शक हो सकता है। गुजरात की घरती से आने के नाते, अपने पूर्व जीवन के अनुभवों के आधार पर नरेंद्र मोदी अगर कुछ कर पाते हैं तो यही बात देश के माथे पर सौभाग्य का टीका साबित होगी। ऐसे में उन्हें यह परवाह करने की जरूरत नहीं है कि देश के प्रभु वर्गों में उनको लेकर क्या राय बनती है। उन्हें तो देश की महान जनता पर भरोसा करना चाहिए, जिसने उन्हें भारत जैसे महादेश की कमान तब सौंप दी जब हर प्रभावी विचार, व्यक्ति, बुद्धिजीवी और संस्थाएं उनके दिल्ली की तरफ बढ़ रहे अश्वमेघ को रोकने के लिए हम संभव उपाय अपना रहे थे। दिल्ली उन्हें अनूकूलित करने के प्रयासों में विफल होती है तो नरेंद्र मोदी को इतिहास पुरूष बनने से कोई रोक नहीं सकता। वे विश्व इतिहास के एक ऐसे नायक बनेंगें जिस पर हमारी पीढियों को गर्व होगा और वे कहेंगी कि हमने नरेंद्र मोदी को देखा था।

शनिवार, 28 जून 2014

कुछ ज्यादा ही हड़बड़ी में हैं मोदी के आलोचक !


-संजय द्विवेदी
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनाकांक्षाओं के उस उच्च शिखर पर विराजे हैं जहां से उन्हें नीचे ही आना है। चुनावी सभाओं में उनकी वाणी पर मुग्ध राष्ट्र उन्हें मुक्तिदाता मानकर वोट कर चुका है। किंतु हमें समझना होगा कि यह टीवी समय है। इसमें टीवी को हर दिन एक शिकार चाहिए। टीवी चैनलों को मैदान में गए बिना और कोई खर्च किए बिना बन जाने वाली उत्तेजक टीवी बहसें चाहिए, जो निश्चय ही किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचती और उनका एजेंडा पहले से सेट होता है। इसमें अतिथि वक्ता और एंकर की जुगलबंदियां भी अब दिखने लगी हैं। जाहिर तौर इन बहसों का सबसे आसान शिकार सरकार ही होती है। कल तक जो सत्ता में थे वे इसके शिकार बने और अब नरेंद्र मोदी सरकार इसके निशाने पर है।
   आप देखें तो नरेंद्र मोदी जिन ताकतों के घता बताकर दिल्ली के शासक वर्गों को चुनौती देते हुए वहां पहुंचे हैं। वे आसानी से उन्हें स्वीकार कहां करने वाले हैं। भाजपा और संघ परिवार का संकट यह है कि उनके पास न तो बौद्धिक योद्धाओं की लंबी-चौड़ी जमात है, न ही राजनीतिक-सामाजिक-मीडिया विमर्श को नई राह दिखाने वाले व्याख्याकार। ये व्याख्याकार और टिप्पणीकार वही हैं जिन्हें मोदी और उनकी सरकार पहले दिन से नापसंद है। वे उस सिर्फ उस विचार से नफरत नहीं करते जिसे नरेंद्र मोदी मानते हैं, उन्हें नरेंद्र मोदी से व्यक्तिगत धृणा भी है।  शायद इसीलिए सरकार के साधारण फैसलों पर जैसा मीडिया हाहाकार व्याप्त है, वह आश्चर्य में डालता है। नई सरकार भी इससे घबराई हुयी लगती है और उसका प्रबंधन कमजोर नजर आता है। क्या ही अच्छा होता कि रेलभाड़ा बजट में ही बढाया जाता और यदि तुरंत बढ़ाना जरूरी था तो सरकार समूचे तर्कों के साथ जनता के बीच आती और बताती कि रेलवे के आर्थिक हालात यह हैं, इसलिए किराया वृद्धि जरूरी है और किराया बढ़ाने से जो धन आ रहा है उससे सरकार क्या करने जा रही है। नरेंद्र मोदी का सम्मोहन अभी टूटा नहीं है, जनता उनकी हर बात को स्वीकार करती। वे टीआरपी दिलाते हैं, इसलिए उनकी बात जनमाध्यमों से अक्षरशः लोगों को पहुंचती। किंतु मोदी ने भी लंबी खामोशी की चादर ओढ़ ली और लंबे समय बाद एक बयान ट्विटर पर दिया जिसमें समाधान कम तल्खी और दुख ज्यादा था। नरेंद्र मोदी को यह समझना होगा कि वे वास्तव में इस देश के प्रभुवर्गों, शासक वर्गों, वैचारिक दुकानें चलाने वाले बहसबाजों, नामधारी और स्वयंभू बौद्धिकों और टीवी चर्चाओं में मशगूल दिल्लीवालों के नेता नहीं है, वे उन्हें नेता मान भी नहीं सकते क्योंकि मोदी उनकी सारी समझ को चुनौती देकर यहां पहुंचे हैं। मोदी को जनता को प्रधानमंत्री चुन लिया है किंतु यह वर्ग उन्हें मन से स्वीकार नहीं कर पाया है। इसलिए मोदी सही कहते हैं कि उन पर 100 घंटे में हमले तेज हो गए। लोकतंत्र की इस त्रासदी से उन्हें कौन बचा सकता है? जबकि उनके पास सांसदों का संख्या बल और जनसमर्थन तो है किंतु बौद्धिकों का खेमा जो यूपीए-3 के इंतजार में बैठा था, उसे मोदी कहां सुहाते हैं।
   यह सोचना कितना रोमांचक है कि यूपीए-3 की सरकार केंद्र में बन जाती तो उसके नेताओं की देहभाषा और प्रतिक्रिया क्या होती? जिस लूट तंत्र और दंभी शासन को उन्होंने दस साल चलाया और मान-मर्यादाओं की सारी हदें तोड़ दीं, उसके बावजूद वे सरकार बना लेते तो क्या करते? यह सोच कर भी रूहें कांप जाती हैं। किंतु जनता का विवेक सबसे बड़ा है वो टीवी बहसबाजों और बौद्धिक जमातों पर भारी है। जनता के केंद्र में भारत है, उसके लोग हैं, उनका हित है किंतु हमारी बौद्धिक जमातों के लिए उनकी कथित विचारधारा, सेकुलरिज्म का नित्य आलाप, उनकी समाज तोड़क सोच देश से बड़ी है। वे ही हैं जो कश्मीर में देशतोड़कों के साथ खड़े हैं, वे ही हैं जो माओवादी आतंक के साथ खड़े हैं, वे ही हैं जो जातियों,पंथों की जंग में अपने राजनीतिक विचारों को पनपते हुए देखना चाहते हैं, वे ही हैं जो यह मानने को तैयार नहीं है कि भारत एक राष्ट्र है। वे इसे अंग्रेजों द्वारा बनाया गया राष्ट्र मानते हैं। इसलिए उन्हें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे शब्दों से नफरत है। वे गांधी, लोहिया, दीनदयाल और जयप्रकाश के सपनों का देश बनते नहीं देखना चाहते। उन्हें पता है कि भारत का अगर भारत से परिचय होता है तो उनके समाज तोड़क नकारात्मक विचारों की दूकान बंद हो जाएगी। इसलिए वे मोदी के चुनावी नारे अच्छे दिन आने वाले हैं का मजाक इसलिए बनाते हैं क्योंकि कुछ जरूरी चीजों के दाम बढ़ गए हैं। किसे नहीं पता था कि चुनाव के बाद चीजों के दाम बढ़ेंगें? किसे नहीं पता था कि सरकारों को देश चलाने के लिए कुछ अप्रिय कदम उठाने पड़ते हैं? किसे नहीं पता था कि चुनावी नारे और सरकारें चलाने कि वास्तविकता में अंतर होता है? सिर्फ आलोचना के लिए आलोचना और अपने रचे नकारात्मक विचारों के संसार में विचरण करने वालों की चिंताओं को छोड़िए। यह भी देखिए कि सरकार के कदम उसकी नीयत कैसे बता रहे हैं। कोई सरकार कैसे काम करेगी, उसके प्राथमिक यह कदम बता देते हैं। मोदी का पहला महीना चीनी, रेलवे भाड़ा बढ़ाने वाला साबित हुआ है किंतु हमें यह भी सोचना होगा कि हमारी अर्थव्यवस्था को अभी लंबी यात्रा तय करनी है। देश का बजट ही उसकी दिशा तय करेगा। वित्तमंत्री अरूण जेतली के बजट का अभी सभी को इंतजार है। उससे ही सरकार के सपनों और उम्मीदों की दिशा तय होगी। इतना तय है कि सरकार की नीयत पर अभी शक नहीं किया जा सकता। मोदी ने जिस तरह प्रधानमंत्री पद संभालते ही काले धन  का पता लगाने के लिए  विशेष जांच दल का गठन किया वह बताता है कि सरकार को अपने संकल्प याद हैं और वह सत्ता पाकर सब कुछ भूल नहीं गयी है। इसके साथ ही मंत्रियों और अपने सांसदों को नियंत्रित करने के लिए, उनके सार्वजनिक व्यवहार व आचरण को ठीक रखने के लिए जो प्रयत्न किए जा रहे हैं वे साधारण नहीं हैं और शायद भारतीय राजनीति में यह पहली बार हैं। पिछली सरकार में प्रधानमंत्री कुछ करने और कहने के पहले को कहीं और से सिग्नल का इंतजार करना पड़ता था। शासक की यह दयनीयता तो मोदी सरकार में शायद ही दिखे।

  कमजोर मानसून को लेकर सरकार की चिंताएं लगातार हो रही बैठकों से व्यक्त हो रही है। यह बात बताती है कि सरकार को अपनी चिंताओं का पूर्व में ही आभास है। कृषि मंत्रालय ने देश के 500 जिलों के लिए आकस्मिक योजना तैयार की है। खाद्य सुरक्षा कानून लागू करने के लिए राज्यों को तीन माह का वक्त और दिया गया है। इसके साथ ही जमाखोरी को रोकने के लिए राज्यों को त्वरित अदालतें गठित करने को कहा गया है। मोदी सरकार के एक महीने आधार पर उनकी सरकार के बारे में कोई राय बना पाना संभव नहीं दिखता। किंतु जो लोग नरेंद्र मोदी को जानते हैं उन्हें पता है कि मोदी जल्दी ही दिल्ली को समझ जाएंगें और सत्ता के सूत्रों को पूरी तरह नियंत्रण में ले लेगें। गुजरात जैसे छोटे राज्य में शासन करना और दिल्ली की सरकार चलाना दोनों एक ही चीज नहीं हैं। संघीय ढांचे में केंद्र की ज्यादातर योजनाओं का क्रियान्वयन राज्यों की मिशनरी ही करती है। जाहिर तौर पर मोदी राज्यों को विश्वास में लेकर एक वातावरण बना रहे हैं, जो विकास और सुशासन की ओर जाता हुआ दिखता है। एक ऐसे समय में जब देश निराश-हताश हो चुका था, दिल्ली की राजसत्ता पर मोदी का आना निश्चय ही नई सरकार के साथ ढेर सारी अपेक्षाओं को बढ़ाता है। जाहिर तौर पर यह यूपीए-3 नहीं है, इसलिए इससे उम्मीदें ज्यादा हैं और यह आशा भी है कि कम से कम यह सरकार भ्रष्ट और जनविरोधी नहीं होगी। इतना तो देशवासी भी मानते हैं कि यह सरकार फैसले लेने वाली और सपनों की ओर दौड़ लगाने वाली सरकार होगी। यह भी अच्छा ही है कि नरेंद्र मोदी के आलोचक इतने सशक्त हैं कि वे उन्हें भटकने भी नहीं देंगें।

रविवार, 22 जून 2014

स्त्रियों के खिलाफ बुरी खबरों का समय



-संजय द्विवेदी

  यह शायद बेहद खराब समय है, जब औरतों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों की खबरें रोजाना हमें हैरान कर रही हैं। भारत में औरतों के खिलाफ हो रहे ये अत्याचार बताते हैं कि प्रगति और विकास के तमाम मानकों को छू रहे इस देश का मन अभी भी औरत को एक खास नजर से ही देखता है। स्त्री के प्रति अपेक्षित संवेदनशीलता का विस्तार अभी न समाज में हुआ है, न पुलिस में, न ही परिवारों में। सोचने का विषय यह भी है कि नवरात्रि के साल में दो बार आने वाले पर्व में कन्या पूजन करने वाला समाज स्त्री के प्रति इतना असहिष्णु कैसे हो सकता है? इसके साथ ही घरेलू हिंसा का एक अलग संसार है, जहां परिजन और रक्त संबंधी ही स्त्री के खिलाफ अत्याचार करते हुए दिखते हैं।
   स्त्री के खिलाफ हो रही हिंसा में स्त्री की भी उपस्थिति चौंकाने वाली है। यानि स्त्री भी अपने ही वर्ग के खिलाफ हो रही हिंसा में उसी उत्साह से शामिल है जैसे पुरूष। यह देखना और सुनना दुखद है किंतु सच है कि स्त्री के खिलाफ हिंसा की जड़ें समाज में बहुत गहरी जम चुकी हैं। आर्थिक स्वालंबन और प्रतिकार कर रही स्त्री के इस अनाचार के विरूद्ध खड़े होने से ये मामले ज्यादा संख्या में सामने आने लगे हैं। प्रकृति प्रदत्त कोमलता और कमजोरियों के नाते स्त्री के खिलाफ समाज का इस तरह का रवैया ही था, जिसके नाते सरकार को घरेलू हिंसा रोकथाम के लिए 2006 में एक कानून लाना पड़ा। इसके बाद दिल्ली में हुए निर्भया कांड ने सारे देश को झकझोरकर रख दिया। इस बीच बदांयू और उप्र के अनेक स्थानों से बेहद शर्मनाक खबरें आईं। निर्ममता और वहशियत की ये कहानियां बताती है समाज आज भी उसी मानसिकता में जी रहा है जहां औरतें को इस्तेमाल की वस्तु समझा जाता है। हम देखें तो हमारे पूरे परिवेश में ही स्त्री को एक कमोडिटी की तरह स्थापित करने के प्रयास चल रहे हैं। मनोरंजन, फिल्मों और विज्ञापनों की दुनिया में ये सच्चाई और नंगे रूप में सामने आती है। जहां औरतें एक वस्तु की तरह उपस्थित हैं। उन्हें सेक्स आब्जेक्ट की तरह प्रस्तुत करने पर जोर है। वे विज्ञापनों में ऐसी वस्तुएं भी बेचती नजर आ रही हैं जिसका वे स्वयं इस्तेमाल नहीं करतीं। रूपहले स्क्रीन के बाजार में उतरी इस बोल्ड-बिंदास-लगभग निर्वसन स्त्री ने, समाज में रह रही स्त्री का जीना मुहाल कर दिया है।

   पल-पल सजे बाजार में उपस्थित स्त्री के सपने और उसकी दुनिया को इस समय ने बेहद सीमित कर दिया है। उसके लिए अवसर बढ़े हैं, किंतु सुरक्षा घट रही है। वह चमकते परदे पर बेहद शक्तिशाली दिखती है, किंतु उसके घर पहुंचने तक चिंतांएं उतनी ही गहरी हैं, जितनी पहले हुए करती थीं। द सेंकेंड सेक्स की लेखिका सिमोन लिखती हैं कि स्त्री बनती नहीं है, उसे बनाया जाता है। जाहिर है सिमोन के समय के अनुभव आज भी बदले नहीं हैं। बदलते समय ने स्त्री को अवसरों के तमाम द्वार खोले हैं, किंतु उसकी तरफ देखने का नजरिया अभी बदलना शेष है। आवश्यक्ता इस बात की है कि हम परिवार से ही इसकी शुरूआत करें। पितृसत्ता की निर्मम छवियों से मुक्त हमें एक ऐसा समाज बनाने की ओर बढ़ना है जहां स्त्री को समान अवसर और समान सम्मान हासिल हैं। तमाम परिवारों में नारकीय जीवन जी रही स्त्रियां हैं, वैसा ही सीखते युवा हैं। बदलती दुनिया में औरतें हर क्षेत्र में अपनी क्षमताएं साबित कर चुकी हैं। वे कठिन कामों को अंजाम दे रही हैं और कहीं भी पुरूषों से कमतर नहीं हैं। शैक्षणिक परिणामों से लेकर मैदानी कामों में उनका हस्तक्षेप कहीं भी अप्रभावी नहीं है। वे जिम्मेदार,कुशल, ज्यादा संवेदनाओं से युक्त और ज्यादा मानवीय हैं। परिवारों में आज स्थितियां बदल रही हैं। स्त्री की क्षमता और उसकी संवेदना को आदर मिल रहा है, वे अवसर पाकर आकाश नाप रही हैं। तमाम परिवारों में अकेली लड़की पैदा करके पुत्र न करने के फैसले भी लिए हैं। यह बदलती दुनिया का एक चेहरा है। किंतु हमें देखना होगा कि एक बहुत बड़ा समाज आज भी अंधेरे में हैं। वह अपनी बनी-बनी धारणाओं को तोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। जहां आज भी पुत्री के जन्म पर दुख के बादल छा जाते हैं। स्त्री को सम्मान नहीं हैं और उसे ही पहला शिकार बनाया जाता है। मध्ययुगीन बर्बरता के निशान आज भी हमारे मनो में हैं। इसलिए हम स्त्री को सबसे पहले और आसान निशाना बनाते हैं, क्योंकि वह कमजोर तो है ही, घर की इज्जत भी है। प्रतिष्ठा से जुड़े होने के नाते तमाम क्षेत्रों में आपसी रंजिशों में भी पहला शिकार औरत को बनाया जाता है। इसलिए लगता है कि एक मानवीय समाज बनाने और औरतों के प्रति संवेदना भरने में हम विफल ही रहे हैं। यहां अंतर गांव और शहर का नहीं समझ और मान्यताओं का भी है। गांवों में भी आपको ऐसे परिवार मिल जाएंगें जहां स्त्रियों को बेहद सम्मान से देखा जाता है और फैसलों में वे ही निर्णायक होती हैं। शहरों में भी ऐसे परिवार मिलेंगें जहां औरतें कोई मायने नहीं रखतीं हैं। हमें यह भी समझना होगा कि स्त्री का सशक्तिकरण पुरूष के विरूद्ध नहीं है। पुरूषों के सम्मान के विरूद्ध नहीं है, वरन वह समाज के पक्ष में है। परिवार और समाज को चलाने की एक धुरी स्त्री है तो दूसरा पुरुष है। दोनों के समन्वित सहभाग से ही एक सुंदर समाज की रचना हो सकती है। स्त्रियों ने इस समय में अपनी शक्ति को पहचान लिया है। वे बेहतर कर रही हैं और आगे आसमां छूने की कोशिशों में हैं। यहां भी पुरूष सत्ता चोटिल होती हुयी लगती है। उसके प्रति सम्मान और संवेदनशीलता के बजाए, किस्से बनाने और उसे कमतर साबित करने की कोशिशें हर स्तर हो रही हैं। तेज होते सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के इस दौर में सिर्फ कानून ही स्त्री के साथ खड़े हैं। कई जगह तो स्त्रियां भी, स्त्रियों के खिलाफ खड़ी हैं। यह एक संक्रमण काल है, स्त्री को अपने वजूद को साबित करते हुए निरंतर आगे बढ़ने का समय है। वह जीत रही है और आगे बढ़ रही है। अपने सपनों में रंग भर रही है। आसान शिकार होने के नाते कुछ शिकारी उसकी घात में हैं किंतु आज की औरत इससे डरती नहीं, घबराती नहीं, वह बने-बनाए कठघरों को तोड़कर आगे आ रही है। मीडिया, महिला आयोग, पुलिस और सरकार सहित तमाम स्वयंसेवी संगठन रात दिन इस काम में लगे हैं कि कैसे औरतें ज्यादा सुरक्षित और ज्यादा अधिकार सम्पन्न हों। यह काम अगर इनके बस का होता तो हो गया होता, सबसे जरूरी है परिवारों में बच्चों को सही संस्कार। वे घर से औरतों का सम्मान करना सीखें। वे अपनी बहन-मां का आदर करना सीखें। वे यह देख पाएं कि उनके पिता और मां दोनों बराबरी के हैं, कोई किसी से कम नहीं हैं। वे परिवार की धुरी हैं। वे यह भी सीखें की कि हमारी संस्कृति में कन्या पूजन जैसे विधान क्यों रखे गए हैं? क्योंकि हमारी सभी विद्याओं की मालिका देवियां हैं? क्यों हम दुर्गा से शक्ति, सरस्वती से बुद्धि और लक्ष्मी से वैभव की मांग करते हैं? क्यों हमें यह पढ़ाया और बताया गया कि जहां स्त्रियां की पूजा होती है देवता वहीं निवास करते हैं। जाहिर तौर पर संस्कृति का हर पाठ स्त्री के सम्मान और उसकी शुचिता के पक्ष में है, किंतु जाने किन प्रभावों में हम अपनी ही सांस्कृतिक मान्यताओं और संदेशों के खिलाफ खड़े हैं। स्त्री को आदर देता समाज ही एक संवेदनशील और मानवीय समाज कहा जाएगा।अगर हम ऐसा नहीं कर सकते तो हमें अपनी महान संस्कृति पर गर्व करने का अभिनय और ढोंग बंद कर देना चाहिए।

सोमवार, 16 जून 2014

लंबे समय के बाद एक सरकार!


-संजय द्विवेदी
       हिंदुस्तानी मन की आकांक्षाएं बहुत अलग हैं। वह बहुत कम प्रतिक्रिया करके भी ज्यादा कहता है। 2014 के चुनाव इस बात की गवाही देते हैं कि जनता के मन में चल रही हलचलों का भान हमें कहां हो पाया। हम सब सेकुलरिज्म की ढोल बजाते रहे और ऐसे लोग सरकार में आ गए जिनके सेकुलर होने पर लगभग सभी राजनीतिक दलों को सामूहिक शक है। तो क्या देश की जनता अब सेकुलर नहीं रही? या उसकी पंथनिरपेक्षता को एक संकल्प नहीं, बल्कि राजनातिक नारे के रूप में इस्तेमाल करने वालों को उसने पहचान लिया है। उसने जता दिया कि काम कीजिए तभी भरोसा बनेगा और तभी आपकी राजनीति चलेगी। सिर्फ नारे पर अब वोट बरसने वाले नहीं हैं। ये भरोसा तब और गहरा होता है जब नवीन पटनायक (उड़ीसा), जयललिता (तमिलनाडु) और ममता बनर्जी (बंगाल) जैसे नेताओं की जमीन बनी रहती है, किंतु तमाम भूमिपुत्रों के पैर जमीन से उखड़ जाते हैं।
   एक सक्षम विकल्प बनी भाजपा के लिए भी संदेश साफ हैं कि सारा कुछ नारों से हासिल नहीं हो सकता। विकास-सुशासन और नकली पंथनिरपेक्षता नारों की स्पर्धा के बीच लोगों ने विकास-सुशासन को जगह दी है। लोग उम्मीद से खाली नहीं हैं। एक राजनेता के तौर नरेंद्र मोदी ने फिर एक हारे हुए देश की उम्मीदों को जगा दिया है।  आप अन्ना हजारे के आंदोलन में रामलीला मैदान में जमे लोगों को याद कीजिए। उनकी भाषा को सुनिए- मध्यवर्ग के वे चेहरे किस तरह राजनीति और राजनेताओं से खिसियाए हुए थे। किस तरह वे हमारी राजनीति और संसद के खिलाफ एकजुट थे। संसद और सरकार मिमिया रही थी। वक्त की उस तारीख ने आज काफी कुछ बदल दिया है। राजनेताओं के प्रति घृणा का स्तर, एक अकेले नेता ने कम कर दिया है। आज लोगों का जनतंत्र पर भरोसा बढ़ा है तो राजनीतिक नेतृत्व पर भी। राजनीति और राजनीतिज्ञों के प्रति लोकधृणा का वह स्तर आज नहीं है। इसके लिए निश्चय ही देश के राजनेताओं को रामलीला मैदान के दृश्यों को ध्यान में रखते हुए नरेंद्र मोदी को बधाई देनी चाहिए। यह बात बताती है कि कम काम और कम सफलताओं के बावजूद अगर आपके जीवन और मन में सच्चाई है। आप ईमानदार प्रयत्न करते हुए भी दिखते हैं तो लोग आपको सिर-माथे बिठाते हैं। किंतु जब आप अहंकार भरी देहभाषा से जनतंत्र में जनता को प्रजा समझने की भूल करते हैं, तो वह भारी पड़ती है।
संवाद से सार्थक होता जनतंत्रः
सत्ताधीशों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे संवाद से भागते हैं। जनता के सवालों पर बातचीत करने के बजाए असुविधाजनक प्रश्नों से वे बचना चाहते हैं। पिछली सरकार ने इसी संवादहीनता के फल अर्जित किए हैं। वहां खामोशी एक रणनीति की तरह इस्तेमाल की जा रही थी। सरकार के मुखिया खामोश थे तो शेष पार्टी नेतृत्व दूसरों की लिखी स्क्रिप्ट पढ़ने में व्यस्त था। असुविधाजनक सवालों पर गहरी और लंबी चुप्पी उनकी रणनीति बन गयी थी। यूपीए के दुबारा चुनाव जीतने के बाद यह चुप्पी, अहंकार में बदल गयी। पांच साल तक जनता द्वारा दी गयी सत्ता को जागीर मानने की भ्रम भी पैदा हुआ। रामलीला मैदान के सभी प्रतिरोधों में सरकार का जवाब यही होता था कि हमें पांच साल का जनादेश मिला है। जनादेश को जागीर और उपनिवेश में बदलने की शैली भारी पड़ी। कांग्रेस की त्यागमूर्ति अध्यक्षा ने प्रधानमंत्री का पद तो चाहे-अनचाहे छोड़ दिया किंतु सत्ता के मोह से वे बच नहीं पाईं। भरोसा न हो तो संजय बारू की किताब जरूर देखिए। सत्ता पर नाजायज नियंत्रण और जनता से संवादहीनता दोनों ही खबरें हवा में रहीं और समय ने इसे सच साबित किया। नरेंद्र मोदी यहीं बाजी मार ले गए। वे जनता के बीच रहे और संवाद में कोई कमी नहीं की। लगातार बातचीत करते हुए मोदी ने जनता के दिलों में उतरकर वो उम्मीदें जगा दीं, जिनके इंतजार में लोग लंबे अरसे से प्रतिक्षारत थे। संवाद की शैली, संचार माध्यमों के सही इस्तेमाल ने उन्हें नायक से महानायक बना दिया।
सपनों के सौदागरः
इस पूरे दौर में नरेंद्र मोदी सपनों के सौदागर की तरह प्रकट हुए हैं। हताश-निराश देश और उम्मीद तोड़ती राजनीतिक धाराओं के बीच वे एक नई और ताजा विचारधारा तथा एक ठंडी हवा के झोंके की तरह हैं। भारत जैसे महादेश को संभालने और उससे संवाद करने के लिए उनके पीछे एक चमकदार अतीत है। संघर्ष है और त्याग से उपजी सफलताएं हैं। जनमानस के बीच वे एक ऐसे धीरोदात्त नायक की तरह स्थापित हैं, जो बदलाव ला सकता है। परिवारवादी, जातिवादी, क्षेत्रवादी राजनीति के पैरोकारों के लिए वे सचमुच एक चुनौती की तरह हैं। उनकी वाणी और कृति में बहुत कुछ साम्य दिखता है। वे जैसे हैं, वैसे ही प्रस्तुत हुए हैं। उन्होंने गुजरात दंगों के लिए माफी न मांगकर और टोपी पहनने के सवाल पर जो स्टैंड लिया है वह बताता है कि वे इस नकली राजनीति में एक असली आदमी हैं। सवा करोड़ हिंदुस्तानियों की बात करने वाले मोदी, अगर जाति-धर्म के बंटवारे से अलग सबको एक मानने की बात कर रहे हैं तो उनके साहस की दाद देनी पड़ेगी। यह पारंपरिक राजनीति से अलग है और अच्छा भी। कश्मीर जैसे संवेदनशील सवालों पर कश्मीर पंडितों को उनकी जमीन पर वापस ले जाने की पहल एक नई तरह की शुरूआत है। अपने शपथ ग्रहण से लेकर भूटान यात्रा तक जो भी संदेश उन्होंने दिए हैं वह एक बेहतर शुरूआत तो है ही। इसके अलावा सांसदों-मंत्रियों को निजी स्टाफ में रिश्तेदारों को न रखने की हिदायत, है तो छोटी पर इसके मायने बहुत बड़े हैं। राजनीतिक क्षेत्र में आज मोदी का कद अपने समतुल्य नेताओं में सबसे बड़ा है तो इसके पीछे उनके सुनियोजित प्रयास,निजी ईमानदारी,कर्मठता और निरंतर कुछ करते रहने की भावना ही है। वे सही मायने में एक ऐसे राजनेता हैं जो परिवारवाद की राजनीति को घता बताकर मैदान में उतरा है।
सुशासन नारा नहीं एक संकल्पः

जिसके लिए सुशासन एक नारा नहीं पवित्र संकल्प है। उसने देश की नौकरशाही को शक्ति देने की बात कही ताकि वे तेजी से फैसले ले सकें। राजनीति में पारदर्शिता और संवाद से ही वे आगे बढ़ने की सोचते हैं। ऐसा व्यक्ति कोई भी हो, लोगों का दुलारा बन जाता है। वे सिर्फ नायक हैं नहीं, नायक सरीखा आचरण भी कर रहे हैं। देश की जनता बहुत भावुक है। लंबी गुलामी ने उसके मन में यह बैठा दिया है कि केंद्र कमजोर होगा, शासक कमजोर होगा तो देश टूट जाएगा। इस निराशाजनक समय में मोदी को लाकर जनता ने एक मजबूत केंद्र और मजबूत शासक देकर दरअसल अपने मन में पल रहे अज्ञात भयों से मुक्ति पायी है। उसे अब सेकुलरिज्म के बदले अराजकता, सार्वजनिक धन की लूट, वंशवाद की लहलहाती बेलें नहीं चाहिए- उसे एक ऐसा भारत चाहिए जिसमें सम्मान,सुरक्षा,रोजगार और आर्थिक प्रगति के अवसर हों। नरेंद्र मोदी जब अपनी सरकार को गरीबों को समर्पित करते हैं तो इसके मायने बहुत अलग हैं। वे जानते हैं कि सरकारी स्कूलों और अस्पतालों के हालात क्या हैं। इनके बरबाद होने के मायने क्या हैं। वे यह भी जानते हैं कि गरीब आदमी के हक में कोई खड़ा है तो वह सिर्फ सरकार है। इसलिए सरकारी तंत्र को अपेक्षित संवेदना से युक्त करना जरूरी है। सरकारी तंत्र की संवेदनशीलता ही इस जनतंत्र की जड़ों को मजबूती देगी। संसाधनों की लूट में लगी कंपनियों और रोज और विकराल होती गैरबराबरी के बीच भी उम्मीदों का एक दिया टिमटिमा रहा है कि आखिर कभी तो हम अपने लोकतंत्र को न्यायपूर्ण और संवेदनशील होता देख पाएंगें। एक सक्षम सरकार को लगभग तीन दशक बाद पाकर लोगों में आशाएं जगी हैं। राजनीति से भी कुछ बदल सकता है, यह भरोसा भी जगा है। लोगों की आशाएं पूर्ण हों इसके लिए सरकार के साथ आम लोगों को भी अपनी सार्वजनिक सक्रियता बढ़ानी होगी। समाज एक दंडशक्ति के रूप में, निगहबानी के लिए सरकारी तंत्र पर नजर रखे तभी जनतंत्र अपने को सार्थक होता हुआ देख पाएगा। उम्मीद की जानी चाहिए आमजन भी चुनाव के बाद अपने कठघरों में बंद होने के बजाए सरकार और उसके तंत्र पर चौकस निगाहें रखेंगें। 

गुरुवार, 12 जून 2014

कापी के मास्टर

                             


                          -         संजय द्विवेदी

हिंदी पत्रकारिता में अंग्रेजी पत्रकारिता की तरह कापी संपादन का बहुत रिवाज नहीं है। अपने लेखन और उसकी भाषा के सौंदर्य पर मुग्ध साहित्यकारों के अतिप्रभाव के चलते हिंदी पत्रकारिता का संकोच इस संदर्भ में लंबे समय तक कायम रहा। जनसत्ता और इंडिया टुडे (हिंदी) के दो सुविचारित प्रयोगों को छोड़कर ये बात आज भी कमोबेश कम ही नजर आ रही है। वैसे भी जब आज की हिंदी पत्रकारिता भाषाई अराजकता और हिंग्लिश की दीवानी हो रही है ऐसे समय में हिंदी की प्रांजलता और पठनीयता को स्थापित करने वाले संपादकों को जब भी याद किया जाएगा, जगदीश उपासने उनमें से एक हैं। वे कापी संपादन के मास्टर हैं। भाषा को लेकर उनका अनुराग इसलिए और भी महत्व का हो जाता है कि मूलतः मराठीभाषी होने के नाते भी उन्होंने हिंदी की सबसे महत्वपूर्ण पत्रिका इंडिया टुडे को स्थापित करने में अपना योगदान दिया। 
   जनसत्ता, युगधर्म, हिंदुस्तान समाचार जैसे अखबारों में पत्रकारिता करने के बाद जब वे इंडिया टुडे पहुंचे तो इस पत्रिका का दावा देश की भाषा में देश की धड़कन बनने का था। समय ने साबित किया कि इसे इस पत्रिका ने सच कर दिखाया। छत्तीसगढ़ के बालोद और रायपुर शहर से अपनी पढ़ाई करते हुए छात्र आंदोलनों और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े जगदीश उपासने ने विधि की परीक्षा में गोल्ड मैडल भी हासिल किया। अखिलभारतीय विद्यार्थी परिषद, मप्र के वे प्रमुख कार्यकर्ताओं में एक थे। आपातकाल के दौरान वे तीन माह फरार रहे तो मीसा बंदी के रूप में 16 महीने की जेल भी काटी ।उनके पिता और माता का छत्तीसगढ़ के सार्वजनिक जीवन में खासा हस्तक्षेप था। मां रजनीताई उपासने 1977 में रायपुर शहर से विधायक भी चुनी गयी। उनके छोटे भाई सच्चिदानंद उपासने आज भी छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। राजनीतिक परिवार और एक खास विचारधारा से जुड़े होने के बावजूद उन्होंने पत्रकारिता में अपेक्षित संतुलन बनाए रखा। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को एक ऐसी भाषा दी जिसमें हिंदी का वास्तविक सौंदर्य व्यक्त होता है।
  उन्होंने कई पुस्तकों का संपादन किया है जिनमें दस खंडों में प्रकाशित सावरकर समग्र काफी महत्वपूर्ण है। टीवी चैनलों में राजनीतिक परिचर्चाओं का आप एक जरूरी चेहरा बन चुके हैं। गंभीर अध्ययन, यात्राएं, लेखन और व्याख्यान उनके शौक हैं। आज जबकि वे मीडिया में एक लंबी और सार्थक पारी खेल कर माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के नोयडा परिसर के प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं तो भी वे रायपुर के अपने एक वरिष्ठ संपादक दिगंबर सिंह ठाकुर को याद करते हैं, जिन्होंने पहली बार उनसे एक कापी तीस बार लिखवायी थी। वे प्रभाष जोशी, प्रभु चावला और बबन प्रसाद मिश्र जैसे वरिष्ठों को अपने कैरियर में दिए गए योगदान के लिए याद करते हैं, जिन्होंने हमेशा उन्हें कुछ अलग करने को प्रेरित किया।