मंगलवार, 30 दिसंबर 2014
डेली न्यूज एक्टीविस्ट, लखनऊ मे दिनांक 30.12.2014 को छपा लेख
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संजय द्विवेदी
प्रो.संजय द्विवेदी,
पत्रकार एवं लेखक
ब्लाग में व्यक्त विचार निजी हैं। इसका किसी संगठन अथवा मेरे व्यवसाय से संबंध नहीं है।
सोमवार, 29 दिसंबर 2014
जाते हुए साल का विदागीत!
-संजय द्विवेदी
जाते हुए साल को विदाई देते हुए हम उम्मीदों से
भरे हुए हैं, यह मानकर कि 2015 भारत के लिए कुछ ज्यादा रोशनी लेकर आएगा। देश
उम्मीदों से भरा हुआ है और दुनिया भर में बसे भारतवंशी भी अपने देश से शिकायतें
नहीं कर रहे हैं, उन्हें भी लगने लगा है कि कुछ अच्छा हो सकता है। इसलिए 2014 को
थैंक्स कि उसने हमें सपने देखने लायक बनाया। उसने हमें पिछले दस सालों के अवसाद,
पीड़ा और सत्ता की मदांध शैली से मुक्त किया। आज देश संवाद करता हुआ, बोलता हुआ,
अपने सपनों की तरफ दौड़ लगाता हुआ, कुछ करने का भाव लिए हुए दिखता है। यह उम्मीदें
ऐसे ही नहीं आयी हैं। ये आई हैं एक राजनीतिक परिवर्तन के नाते जिसके लिए 2014 को
हम भूल नहीं सकते।
साल-2014 भारत से भारत के परिचय का साल
है। थके हुए लोगों और हारे हुए मन को दिलासा देने का साल है। हिंदुस्तान ही वह
देश है, जिसे कभी राजसत्ता ने बहुत आंदोलित नहीं किया। हमारा समाज अपने स्वाभिमान
और स्वावलंबन पर भरोसा करने वाला समाज है। हमारा समाज सत्ता की ओर देखने वाला समाज
नहीं है, ना ही वह सत्ता के बल पर आगे बढने वाला समाज है। इस समाज की जिजीविषा
सालों साल से उसके साथ है। शासक और शासन की भूमिका को हमेशा हमने बहुत सीमित माना।
किंतु यह अच्छे और बुरे का फर्क जानने वाला समाज जरूर है। उसे पता है कि सत्ता को
कितना मान देना और कब बदल देना।
आप कल्पना करें कि
यूपीए-3 के हाथ इस देश की सत्ता लगी होती तो क्या हम 2014 को माफ कर पाते। आने
वाला साल क्या उम्मीदों का साल होता। सत्ता की सीमित भूमिका के बावजूद उसका
सकारात्मक और ऊर्जावान होना जरूरी है। उसकी ऊर्जा से ही समाज निश्चिंत होकर अपने
सपनों में रंग भरता है। आप मानें या न मानें वह उत्साह और सकारात्मकता 2014 हमें
देकर जा रहा है। यह सकारात्मकता बनाए रखना, सत्ता के नए सवारों का काम है। हमें
अनूकूलता चाहिए, हम अपना श्रेष्ठतम देने के लिए आतुर समाज हैं। दुनिया इसीलिए हमें
एक नई नजर से देख रही है। 2014 की सबसे बड़ी देन यही है कि वह एक ऐसे परिवर्तन का
वाहक बना है, जिसका यह देश लंबे समय से इंतजार कर रहा था। समाज जीवन ऐसी ही
सूचनाओं से ताकत पाता है। हम एक राष्ट्र हैं यह भावना भी हममें आज दिखने लगी है।
जम्मू-काश्मीर की विकराल बाढ़ हो या सीमापार पाकिस्तान बच्चों की सामूहिक हत्या,
देश का मन विचलित हुआ और उसने भावनाओं के माध्यम से इस दर्द को बांटा। यही इस
भूभाग की विशेषता है। हम अपने और पड़ोसी दोनों के दुख में दुखी होते हैं और उसकी
खुशी में खुश होते हैं। 2014 की बुरी सूचनाएं भी एक भावनात्मक क्षण थी, जिसमें देश
एक दिखा। यही अपनी माटी और अपने लोगों से एकात्म होना है। अगर हमें अपनी धरती और
अपने लोगों से प्रेम हो जाए तो सारा कुछ गलत होता हुआ रूक जाएगा। सवाल यह है कि
क्या हम अपने देश से प्यार करते हैं। सवाल यह भी है कि क्या हम कुछ करने से पहले
यह सवाल करते हैं कि इससे मेरा देश कैसा बनेगा? 2014
ने हमें वह नजर दी है जब हम देश की सोचने लगे हैं।
युवा शक्ति के हाथों में स्वच्छता अभियान की झाड़ू बहुत प्रतीकात्मक
प्रयास है, किंतु इसके बड़े मायने हैं। प्रधानमंत्री द्वारा लगातार आकाशवाणी पर
देशवासियों से संवाद और उसमें हर बार किसी नए विषय पर बात बहुत प्रतीकात्मक है
किंतु इसके मायने हैं। यह देश तो संवाद ही चाहता था। किंतु नेतृत्व दस वर्षों तक
मौन रहा। बड़ी से बड़ी घटना पर मौन और अवश। आखिर यह देश चलता कैसे? लोग सत्ता से चाहते क्या हैं? वह उन्हें चैन से काम करने, जीने और आगे बढने का
वातावरण उपलब्ध कराए। 2014 के आखिरी दिन काम को प्रतिष्ठा देने वाले दिन हैं। ये
दिन अवसाद और काहिली के विदाई के भी दिन हैं। उत्साह और स्वाभिमान के संचार के दिन
हैं। आज लोगों को लगने लगा है कि कुछ बदल रहा है, बदल सकता है। इसके पहले के मंत्र
सुनें इस देश का कुछ नहीं हो सकता, कुछ नहीं बदलेगा, भगवान ही मालिक –ऐसा कहने वाले
लोग घट रहे हैं। नकारात्मकता का भाव घटा है। परिर्वतन को किस तरह स्वीकारा गया इसे समझना हो
तो नोबेल विजेता अर्थशास्त्री श्री अर्मत्य सेन की सुन लीजिए। वे कहते हैं-“मैं श्री मोदी का आलोचक हूं,लेकिन मुझको कहना
पड़ेगा कि उन्होंने जन-मन में यह आस्था पैदा कर दी है कि कुछ किया जा सकता है।
मेरे विचार से यह खासी बड़ी उपलब्धि है।
यह उनके लिए मेरी तरफ से एक प्रशस्ति है, लेकिन इससे धर्मनिरपेक्षता और अन्य
मुद्दों पर हमारा मतभेद खत्म नहीं हो जाता। ”
अफसोस यह नकारात्मकता राजनीति ने पैदा की थी।
नौकरशाही ने पैदा की थी। सेवकों के मालिक की तरह व्यवहार ने पैदा की थी। आज भी
हमें इस तंत्र में बहुत कुछ बदलने की जरूरत है। आने वाले सालों में हमें सोचना
होगा कि आखिर हम कैसे सरकार की सोच में आम लोगों के संवेदना भर सकते हैं? कैसे मालिक और शासक की तरह आचरण कर रही सरकारी
नौकरशाही को बदल सकते हैं?
कैसे इस मशीनरी में लगी जंग को साफ कर
सकते हैं? 2014 हमें सपने देकर जा रहा है। अब हमें इसमें
रंग भरने का काम करना है। उसने सपने जगाए हैं और देश ने अब अपने सपनों की तरफ दौड़
लगा दी है।
सरकारें
आज सुशासन की बात करने लगी हैं। संभव है कि वे बातों से आगे भी बढ़ें, क्योंकि देश आगे बढ़ चुका है, जनता आगे बढ़ चुकी है। कांग्रेस के ऐतिहासिक
पराभव को साधारण सूचना मत मानिए- यह राजनीतिक संस्कृति में भी बदलाव की भी सूचना
है। समाज अब बदला हुयी सरकार से बदले हुए तंत्र की भी अपेक्षा कर रहा है। सत्ता
में जो लोग आए हैं, वे सत्ता के स्वाभाविक अधिकारी नहीं है, उन्हें जनता ने यह
सत्ता अपनी घोर निराशा में सौंपी है। जाहिर तौर पर उनका दायित्व बहुत बढ़ गया है।
उनके सामने भारत की विशाल जनता के मन के अनुरूप आचरण का दबाव है। जातियों, वर्गों,
उपवर्गों और क्षेत्रीयताओं के नारों के बीच राष्ट्र की आत्मा को स्वर देने वाला
नेतृत्व अरसे बाद मिला है। वह संवाद को कृति में बदलने का आह्वान कर रहा है, अपने
पस्तहाल तंत्र को सक्रिय कर रहा है। काम के लिए प्रेरित कर रहा है। ऐसे में समाज
की निष्क्रिय प्रतिक्रिया से आगे बढ़ने की जरूरत है। समाज को तय करना होगा कि आखिर
वह कैसा देश देखना चाहते हैं? पूर्व राष्ट्रपति
डा. अब्दुल कलाम विजन-2020 की बात करते हैं। अब इसमें वक्त कम बचा है। जाते हुए
साल का संदेश है कि हम अपनी गति बढ़ाएं। ज्यादा तेजी से अपनी कमियों का परिष्कार
करते हुए देश की जरूरतों को पूरा करें। बाजार और मीडिया के शोर में वास्तविकताओं
का आकलन करें। छूट रहे लोगों और क्षेत्रों को भी साथ लें। एक ऐसा भारत बनाने की ओर
बढ़ें जिसमें ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा हकीकत
में बदलता हुआ दिखे। देश का समाज वास्तव में बहुत स्वावलंबी और कर्मठ समाज है।
सरकारी तंत्र और नौकरशाही की अकर्मण्यता के बावजूद यह देश धड़क रहा है और अपने
सपनों में रंग भरने के लिए आतुर है। लोगों की कर्मठता और लगातार अच्छा काम करने के
कारण ही दुनिया की मंदी का असर भारत में नहीं दिखता। सरकारी नीतियों की विफलता के
वावजूद देश ने अपनी विकास की गति बनाए रखी है। सन् 2015 की देहरी पर खड़े होकर हम
यह कह सकते हैं कि जाते हुए साल ने हमें इस लायक तो बना ही दिया है कि हम नए साल के
स्वागत में दिल से कह सकें-‘हैप्पी न्यू ईयर।‘
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता
एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)
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शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014
डेली न्यूज एक्टीविस्ट, लखनऊ में छपे लेख
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सोमवार, 22 दिसंबर 2014
करिश्माई नेता हैं वाजपेयी
जन्मदिन प्रसंगः २५ दिसंबर
-संजय द्विवेदी
अटलबिहारी वाजपेयी यानि एक ऐसा नाम जिसने भारतीय राजनीति को अपने
व्यक्तित्व और कृतित्व से इस तरह प्रभावित किया जिसकी मिसाल नहीं मिलती। एक साधारण परिवार में जन्मे इस राजनेता ने अपनी भाषण कला, भुवनमोहिनी मुस्कान, लेखन और विचारधारा के प्रति सातत्य का जो परिचय दिया वह आज की राजनीति में दुर्लभ है। सही मायने में वे पं.जवाहरलाल नेहरू के बाद भारत के सबसे करिश्माई नेता और प्रधानमंत्री साबित हुए।
एक बड़े परिवार का उत्तराधिकार पाकर कुर्सियां हासिल करना बहुत सरल है किंतु वाजपेयी की पृष्ठभूमि और उनका संघर्ष देखकर लगता है कि संकल्प और विचारधारा कैसे एक सामान्य परिवार से आए बालक में परिवर्तन का बीजारोपण करती है। शायद इसीलिए राजनैतिक विरासत न होने के बावजूद उनके पीछे एक ऐसा परिवार था जिसका नाम संघ परिवार है। जहां अटलजी राष्ट्रवाद की ऊर्जा से भरे एक ऐसे महापरिवार के नायक बने, जिसने उनमें इस देश का नायक बनने की क्षमताएं न सिर्फ महसूस की वरन अपने उस सपने को सच किया जिसमें देश का नेतृत्व करने की भावना थी। अटलजी के रूप में इस परिवार ने देश को एक ऐसा नायक दिया जो वास्तव में हिंदू संस्कृति का प्रणेता और पोषक बना। याद कीजिए अटल जी की कविता तन-मन हिंदू मेरा परिचय। वे अपनी कविताओं, लेखों ,भाषणों और जीवन से जो कुछ प्रकट करते रहे उसमें इस मातृ-भू की अर्चना के सिवा क्या है। वे सही मायने में भारतीयता के ऐसे अग्रदूत बने जिसने न सिर्फ सुशासन के मानकों को भारतीय राजनीति के संदर्भ में स्थापित किया वरन अपनी विचारधारा को आमजन के बीच स्थापित कर दिया।
समन्वयवादी राजनीति की शुरूआतः
सही मायने में अटलबिहारी वाजपेयी एक ऐसी सरकार के नायक बने जिसने भारतीय राजनीति में समन्वय की राजनीति की शुरूआत की। वह एक अर्थ में एक ऐसी राष्ट्रीय सरकार थी जिसमें विविध विचारों, क्षेत्रीय हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले तमाम लोग शामिल थे। दो दर्जन दलों के विचारों को एक मंत्र से साधना आसान नहीं था। किंतु अटल जी की राष्ट्रीय दृष्टि, उनकी साधना और बेदाग व्यक्तित्व ने सारा कुछ संभव कर दिया। वे सही मायने में भारतीयता और उसके औदार्य के उदाहरण बन गए। उनकी सरकार ने अस्थिरता के भंवर में फंसे देश को एक नई राजनीति को राह दिखाई। यह रास्ता मिली-जुली सरकारों की सफलता की मिसाल बन गया। भारत जैसे देशों में जहां मिलीजुली सरकारों की सफलता एक चुनौती थी, अटलजी ने साबित किया कि स्पष्ट विचारधारा,राजनीतिक चिंतन और साफ नजरिए से भी परिवर्तन लाए जा सकते हैं। विपक्ष भी उनकी कार्यकुशलता और व्यक्तित्व पर मुग्ध था। यह शायद उनके विशाल व्यक्तित्व के चलते संभव हो पाया, जिसमें सबको साथ लेकर चलने की भावना थी। देशप्रेम था, देश का विकास करने की इच्छाशक्ति थी। उनकी नीयत पर किसी कोई शक नहीं था। शायद इसीलिए उनकी राजनीतिक छवि एक ऐसे निर्मल राजनेता की बनी जिसके मन में विरोधियों के प्रति भी कोई दुराग्रह नहीं था।
आम जन का रखा ख्यालः
उनकी सरकार सुशासन के उदाहरण रचने वाली साबित हुई। जनसमर्थक नीतियों के साथ महंगाई पर नियंत्रण रखकर सरकार ने यह साबित किया कि देश यूं भी चलाया जा सकता है। सन् 1999 के राजग के चुनाव घोषणापत्र का आकलन करें तो पता चलता है कि उसने “सुशासन प्रदान करने की हमारी प्रतिबद्धता”जैसे विषय को उठाने के साथ कहा-“लोगों के सामने हमारी प्रथम प्रतिबद्धता एक ऐसी स्थायी,ईमानदार, पारदर्शी और कुशल सरकार देने की है, जो चहुंमुखी विकास करने में सक्षम हो। इसके लिए सरकार आवश्यक प्रशासनिक सुधारों के समयबद्ध कार्यक्रम शुरू करेगी, इन सुधारों में पुलिस और अन्य सिविल सेवाओं में किए जाने वाले सुधार शामिल हैं।” राजग ने देश के सामने ऐसे सुशासन का आदर्श रखा जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रीय पुनर्निर्माण, संघीय समरसता, आर्थिक आधुनिकीकरण, सामाजिक न्याय, शुचिता जैसे सवाल शामिल थे। आम जनता से जुड़ी सुविधाओं का व्यापक संवर्धन, आईटी क्रांति,सूचना क्रांति इससे जुड़ी उपलब्धियां हैं।
एक भारतीय प्रधानमंत्रीः
अटलबिहारी बाजपेयी सही मायने में एक ऐसे प्रधानमंत्री थे जो भारत को समझते थे।भारतीयता को समझते थे। राजनीति में उनकी खींची लकीर इतनी लंबी है जिसे पारकर पाना संभव नहीं दिखता। अटलजी सही मायने में एक ऐसी विरासत के उत्तराधिकारी हैं जिसने राष्ट्रवाद को सर्वोपरि माना। देश को सबसे बड़ा माना। देश के बारे में सोचा और अपना सर्वस्व देश के लिए अर्पित किया। उनकी समूची राजनीति राष्ट्रवाद के संकल्पों को समर्पित रही। वे भारत के प्रधानमंत्री बनने से पहले विदेश मंत्री भी रहे। उनकी यात्रा सही मायने में एक ऐसे नायक की यात्रा है जिसने विश्वमंच पर भारत और उसकी संस्कृति को स्थापित करने का प्रयास किया। मूलतः पत्रकार और संवेदनशील कवि रहे अटल जी के मन में पूरी विश्वमानवता के लिए एक संवेदना है। यही भारतीय तत्व है। इसके चलते ही उनके विदेश मंत्री रहते पड़ोसी देशों से रिश्तों को सुधारने के प्रयास हुए तो प्रधानमंत्री रहते भी उन्होंने इसके लिए प्रयास जारी रखे। भले ही कारगिल का धोखा मिला, पर उनका मन इन सबके विपरीत एक प्रांजलता से भरा रहा। बदले की भावना न तो उनके जीवन में है न राजनीति में। इसी के चलते वे अजातशत्रु कहे जाते हैं।
आज जबकि राष्ट्रजीवन में पश्चिमी और अमरीकी प्रभावों का साफ प्रभाव दिखने लगा है। रिटेल में एफडीआई के सवाल पर जिस तरह के हालात बने वे चिंता में डालते हैं। भारत के प्रधानमंत्री से लेकर बड़े पदों पर बैठे राजनेता जिस तरह अमरीकी और विदेशी कंपनियों के पक्ष में खड़े दिखे वह बात चिंता में डालती है। यह देखना रोचक होता कि अगर सदन में अटलजी होते तो इस सवाल पर क्या स्टैंड लेते। शायद उनकी बात को अनसुना करने का साहस समाज और राजनीति में दोनों में न होता। सही मायने में राजनीति में उनकी अनुपस्थिति इसलिए भी बेतरह याद की जाती है, क्योंकि उनके बाद मूल्यपरक राजनीति का अंत होता दिखता है। क्षरण तेज हो रहा है, आदर्श क्षरित हो रहे हैं। उसे बचाने की कोशिशें असफल होती दिख रही हैं। आज भी वे एक जीवंत इतिहास की तरह हमें प्रेरणा दे रहे हैं। वे एक ऐसे नायक हैं जिसने हमारे इसी कठिन समय में हमें प्रेरणा दी और हममें ऊर्जा भरी और स्वाभिमान के साथ साफ-सुथरी राजनीति का पाठ पढ़ाया। हमें देखना होगा कि यह परंपरा उनके उत्तराधिकार कैसे आगे बढाते हैं। उनकी दिखायी राह पर भाजपा और उसका संगठन कैसे आगे बढ़ता है।
अपने समूचे जीवन से अटलजी जो पाठ पढ़ाते हैं उसमें राजनीति कम और राष्ट्रीय चेतना ज्यादा है। सारा जीवन एक तपस्वी की तरह जीते हुए भी वे राजधर्म को निभाते हैं। सत्ता में रहकर भी वीतराग उनका सौंदर्य है। वे एक लंबी लकीर खींच गए हैं, इसे उनके चाहनेवालों को न सिर्फ बड़ा करना है बल्कि उसे दिल में भी उतारना होगा। उनके सपनों का भारत तभी बनेगा और सामान्य जनों की जिंदगी में उजाला फैलेगा। स्वतंत्र भारत के इस आखिरी करिश्माई नेता का व्यक्तित्व और कृतित्व सदियों तक याद किया जाएगा, वे धन्य हैं जिन्होंने अटल जी को देखा, सुना और उनके साथ काम किया है। ये यादें और उनके काम ही प्रेरणा बनें तो भारत को परमवैभव तक पहुंचने से रोका नहीं जा सकता। शायद इसीलिए उनको चाहनेवाले उनकी लंबी आयु की दुआ करते हैं और गाते हुए आगे बढ़ते हैं ‘चल रहे हैं चरण अगणित, ध्येय के पथ पर निरंतर’।
प्रो.संजय द्विवेदी,
पत्रकार एवं लेखक
ब्लाग में व्यक्त विचार निजी हैं। इसका किसी संगठन अथवा मेरे व्यवसाय से संबंध नहीं है।
धर्मांतरणः हंगामा क्यों है बरपा?
- संजय द्विवेदी
धर्मान्तरण के
मुद्दे पर मचे बवाल ने यह साफ कर दिया है कि इस मामले पर शोर करने वालों की नीयत
अच्छी नहीं है। किसी का धर्म बदलने का सवाल कैसे एक सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाया
जाता है और कैसे इसे मुद्दा बनाने वाले धर्मांतरण के खिलाफ कानून बनाने के विषय पर
तैयार नहीं होते, इसे देखना रोचक है। भारत जैसे देश में जहां बहुत सारे पंथों को मानने
वाले लोग रहते हैं यह विषय चर्चा के केंद्र में रहा है। खासकर ईसाई मिशनरियों और
मुस्लिम संगठनों की विस्तारवादी नीति के चलते यह मुद्दा हमेशा उठता आया है। लेकिन
जादू यह है कि धर्मांतरण के खिलाफ कानून बनाने के लिए अल्पसंख्यक संगठन और तथाकथित
धर्मनिरपेक्ष दल तैयार नहीं हैं। यहीं पर हमारे विचारों के दोहरेपन का पता चलता और
नीयत का भी। यानि हिंदू समाज के लोग धर्म बदलते रहें तो कोई समस्या नहीं किंतु कोई
अन्य धर्मावलंबी हिंदू
बन जाए तो पहाड़ सिर पर उठा लो। मतलब आप करें तो ‘लीला’ कोई अन्य करे तो ‘पाप’ ।
आप देखें तो धर्मांतरण की बढ़ती वृत्ति ने ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक
संघ परिवार को गिरिजनों और आदिवासियों के बीच जाकर काम करने की प्रेरणा का आधार भी
दिया है। आज ईसाई मिशनरियों की तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरित वनवासी
कल्याण आश्रम और सेवाभारती जैसे संगठनों के कार्यकर्ता आपको आदिवासियों, गिरिजनों
एवं वंचितों के बीच कार्य करते दिख जाएंगे। बात सिर्फ सेवा को लेकर लगी होड़ की
होती तो शायद इस पूरे चित्र में हिंसा को जगह नहीं मिलती । लेकिन ‘धर्म’ बदलने का जुनून और अपने धर्म बंधुओं की तादाद
बढ़ाने की होड़ ने ‘सेवा’ के इन सारे
उपक्रमों की व्यर्थता साबित कर दी है। हालांकि ईसाई मिशनों से जुड़े लोग इस बात से
इनकार करते हैं कि उनकी सेवाभावना के साथ जबरिया धर्मान्तरण का लोभ भी जुड़ा है।
किंतु विहिप और संघ परिवार इनके तर्कों को खारिज करता है। आज धर्मान्तरण की यह बहस
ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां सिर्फ तलवारें भांजी जा रही
हैं। तर्क तथा शब्द अपना महत्व खो चुके हैं। जिन राज्यों में व्यापक पैमाने पर
धर्मान्तरण हुआ है मसलन मिजोरम, अरुणाचल, मेंघालय, नागालैंड, छत्तीसगढ़ के ताजा हालात तथा
कश्मीर में मुस्लिम बहुसंख्या के नाते उत्पन्न परिस्थितियों ने हिंदू संगठनों को
इन बातों के लिए आधार मौजूद कराया है कि धर्म के साथ राष्ट्रांतरण की भी
परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। जाहिर है यह भयग्रंथि ‘हिंदू
मानस’ में एक भय का वातावरण बनाती है।
धर्मान्तरण की यह प्रक्रिया और इसके पूर्वापर पर नजर डालें तो इतिहास में तमाम
महापुरुषों ने अपना धर्म बदला था। उस समय लोग अपनी कुछ मान्यताओं, आस्थाओं
और मानदंडों के चलते धर्म परिवर्तन किया करते थे। वे किसी धर्म की शरण में जाते थे
या किसी नए पंथ या धर्म की स्थापना करते थे। लंबे विमर्शों, बहसों
और चिंतन के बाद यथास्थिति को तोड़ने की अनुगूंज इन कदमों में दिखती थी। गौतम
बुद्ध, महावीर द्वारा नए मार्गों की तलाश इसी कोशिश का
हिस्सा था वहां भी एक विद्रोह था। बाद में यह हस्तक्षेप हमें आर्य समाज, ब्रह्मा समाज, रामकृष्ण मिशन जैसे आंदोलनों में
दिखता है। धर्म के परंपरागत ढांचे को तोड़कर कुछ नया जोड़ने और रचने की प्रक्रिया
इससे जन्म लेती थी। कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक का बौद्ध धर्म स्वीकारना,
एक लालच या राजनीति से उपजा फैसला नहीं था। यह एक व्यक्ति के हृदय
और धर्म परिवर्तन की घटना है, उसके द्वारा की गई हिंसा की
ग्लानि से उपजा फैसला है। बाद के दिनों में बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर का बौद्ध
धर्म स्वीकारना एक लंबी विचार-प्रक्रिया से उपजा फैसला था। इसी प्रकार केशवचंद्र
सेन भी ईसाई धर्म में शामिल हो गए थे। उदाहरण इस बात के भी मिलते हैं कि शुरुआती
दौर के कई ईसाई धर्म प्रचारक ब्राम्हण पुजारी बन गए। कुछ पादरी ब्राह्मण पुजारियों
की तरह रहने लगे । इस तरह भारतीय समाज में धर्मातरण का यह लंबा दौर विचारों के
बदलाव के कारण होता रहा । सो यह टकराव का कारण नहीं बना । लेकिन सन 1981 में मीनाक्षीपुरम में 300 दलितों द्वारा हिंदू धर्म
छोड़कर इस्लाम ग्रहण करने की घटना ने एक बड़ा रूप ले लिए । सामंतों और बड़ी जातियों
के अत्याचार से संतप्त जनों की इस प्रतिक्रिया ने कथित हिंदूवादियों के कान खड़े
कर दिए। सही अर्थों में मीनाक्षीपुरम की घटना आजाद भारत में धर्मान्तरण की बहस को
एक नया रूप देने में सफल रही । इसने न सिर्फ हमारी सड़ांध मारती जाति-व्यवस्था के
खिलाफ रोष को अभिव्यक्त दी वरन हिंदू संगठनों के सामने यह चुनौती दी कि यदि
धार्मिक-जातीय कट्टरता के माहौल को कम न किया गया तो ऐसे विद्रोह स्थान-स्थान पर
खड़े हो सकते हैं। इसी समय के आसपास महाराष्ट्र में करीब 3 लाख
दलितों ने हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया । 26 जनवरी
1999 को तेजीपुर (उ.प्र.) में कई दलित काश्तकारों ने बौद्ध
धर्म अपना लिया । लेकिन इन घटनाओं को इसलिए संघ परिवार ने इतना तूल नहीं दिया,
क्योंकि वे बौद्धों को अलग नहीं मानते । लेकिन मिशनरियों द्वारा किए
जा रहे धर्मान्तरण की कुछेक घटनाओं ने उन्हें चौकस कर दिया । संघ परिवार ने धर्म
बदल चुके आदिवासियों को वापस स्वधर्म में लाने की मुहिम शुरू की, जिसमें स्व. दिलीप सिंह जूदेव जैसे नेता आगे आए। इस सबके साथ ईसाई मिशनों
की तरह संघ परिवार ने भी सेवा के काम शुरू किए। इससे बिहार के झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, गुजरात,
महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों में जमीनी संघर्ष की घटनाएं बढ़ी ।
जिसकी परिणति कई प्रदेशों में हिंसक संघर्ष रूप में सामने आई । इसका इस्तेमाल कर
पाक प्रेरित आतंकियों ने भी हिंदू-ईसाई वैमनस्य फैलाने के लिए कुछ सालों पूर्व
चर्चों में विस्फोट कराए थे। इन तत्वों की पहचान दीनदार अंजमुन के कार्यकर्ताओं के
रूप में हो चुकी है। पूर्वाचल के राज्यों में आईएसआई प्रेरित आतंकियों से चर्च के
रिश्ते भी प्रकाश में आए हैं। ऐसे एकाध उदाहरण भी देश के सद्भाव व सह अस्तित्व की
विरासत को चोट पहुंचाने के लिए काफी होते हैं। जाहिर है ऐसे संवेदनशील प्रश्नों पर
नारेबाजियों के बजाए ठंडे दिमाग से काम लेना चाहिए। लेकिन भारत जैसे विशाल देश में
जहां साक्षरता के हालात बदतर हैं, लोग भावनात्मक नारों के
प्रभाव में आसानी से आ जाते हैं। जरूरत इस बात की है कि हिंदू समाज धर्मान्तरण के
कारकों एवं कारणों का हल स्वयं में ही खोजे। धर्म परिवर्तन प्रत्येक व्यक्ति का
बुनियादी हक है। कोई भी व्यक्ति का यह हक उससे ले नहीं सकता, लेकिन इस प्रश्न से पीड़ित जनों को चाहिए कि वे लड़ाई हिंदू समाज में पसरी
अमानवीय जाति प्रथा और पाखंडपूर्ण बहुरूपिएपन के खिलाफ शुरू करें।
समाज को जोड़ने, उसमें समरसता घोलने का दायित्व बहुसंख्यक समाज और
उसके नेतृत्व का दावा करने वालों पर है। सामाजिक विषमता के दानव के खिलाफ यह जंग
जितनी तेज होती जाएगी। धर्मान्तरण जैसे प्रश्न जिनके मूल में अपमान ,तिरस्कार, उपेक्षा और शोषण है, स्वतः समाप्त करने के बजाए वंचितों के दुख-दर्द से भी वास्ता जोड़ना चाहिए।
इस सवाल पर बहुसंख्यक समाज को सकारात्मक रुख अपनाकर बतौर चुनौती इसे स्वीकारना भी
चाहिए। इसके दो ही मंत्र हैं-सेवा और सद्भाव ।
राज्यसभा और लोकसभा को रोककर ये सवाल हल नहीं होंगें। हमें उस मानसिकता को
भी देखना होगा जो पूरी दुनिया को एक रंग में रंगना चाहते हैं। क्यों उनमें विपरीत
पूजा पद्धतियों के प्रति स्वीकार्यता नहीं है। ये दुनिया इंसानों के रहने लायक
दुनिया बने। अगर हम विविधता और बहुलता का सम्मान नहीं करते तो ऐसे संकट हमारे सामने हमेशा खड़े
होंगें। धर्म के लिए खून बहाते लोग अपने धर्म बंधुओं के भी खून की होली खेल रहे
हैं। मानवता पर ऐसे विचार बोझ समान ही हैं। हमारी देश की परंपरा सबको आदर देने और
सभी पंथों को मान देने की रही है। यहां धर्म जीवन शैली के रूप में पारिभाषित है।
यह अधिनायकवादी वृत्तियों का वाहक नहीं है। हमारा धर्म उदात्त मानवीय संवेदना और
सहअस्तित्व पर आधारित है। इसे खून बहा रही जमातों, लालच के आधार पर या धोखे के
आधार धर्म बदलने के प्रयासों की प्रतिस्पर्धा में मत देखिए। हमारी अपनी पहचान और
स्वायत्ता दूसरों को ही नहीं, विरोधियों को भी आदर देने में है। यही भारतीयता है,
इसे आप कायरता कहते हैं तो कहते रहिए। क्योंकि आपकी बहादुरी के किस्सों ने सिर्फ
खून बहाया है, अब इसे रोकने की जरूरत है। भारतीय विचार सबको साथ लेकर चलने वाला
विचार है,वह किसी के खिलाफ कैसे हो सकता है? हम उन हथियारों से नहीं लड़ सकते, जो दुनिया में अशांति का कारण
बने हुए हैं। हमारे
समय के सबसे बड़े हिंदू नेता श्री अटलबिहारी वाजपेयी इसी हिंदू दर्शन को व्यक्त
करते हुए जो लिखते हैं, वह कविता उनके समर्थकों को जरूर पढ़नी चाहिए। क्योंकि
दूसरे विचारों से प्रेरित होकर अपना मूल विचार और स्वभाव छोड़ने की जरूरत कहां हैं?
श्रेष्ठ होने का
मतलब सभ्य होना भी है, शिष्ठ होना भी है। वह भाषा में भी, व्यवहार में भी और आचरण
में भी। बकौल अटल जी-
होकर स्वतन्त्र मैने कब चाहा है कर लूं सब को गुलाम
मैने तो सदा सिखाया है करना अपने मन को गुलाम।
गोपाल, राम के नामों पर कब मैने अत्याचार किया
कब दुनिया को हिन्दु करने घर घर मे नरसंहार किया।
कोई बतलाए काबुल मे जाकर कितनी मस्जिद तोडी
भूभाग नही शत शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय।
हिन्दु तन –मन, हिन्दु- जीवन रग- रग हिन्दु मेरा परिचय॥
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बुधवार, 17 दिसंबर 2014
विनय उपाध्याय को पं.बृजलाल द्विवेदी स्मृति अखिलभारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान
मीडिया विमर्श के
आयोजन में 7 फरवरी को होंगे अलंकृत
भोपाल,16 दिसंबर,2014। हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता को सम्मानित किए जाने के
लिए दिया जाने वाला पं. बृजलाल द्विवेदी अखिलभारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान
इस वर्ष ‘कला समय’ (भोपाल) के संपादक श्री विनय उपाध्याय को दिया जाएगा।श्री विनय उपाध्याय साहित्यिक पत्रकारिता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर होने के साथ-साथ
देश के जाने-माने संस्कृतिकर्मी एवं लेखक हैं। जनवरी,1998 से वे कला-संस्कृति पर
केंद्रित महत्वपूर्ण पत्रिका ‘कला समय’ का संपादन कर रहे
हैं।
पुरस्कार के निर्णायक
मंडल में सर्वश्री विश्वनाथ सचदेव, रमेश नैयर, डा. सच्चिदानंद जोशी, डा.सुभद्रा राठौर और जयप्रकाश
मानस शामिल हैं। इसके पूर्व यह सम्मान वीणा(इंदौर) के संपादक स्व. श्यामसुंदर
व्यास, दस्तावेज(गोरखपुर) के संपादक विश्वनाथ
प्रसाद तिवारी, कथादेश (दिल्ली) के संपादक हरिनारायण, अक्सर (जयपुर) के संपादक डा. हेतु भारद्वाज, सद्भावना दर्पण (रायपुर) के
संपादक गिरीश पंकज और व्यंग्य यात्रा (दिल्ली) के संपादक डा. प्रेम जनमेजय को दिया
जा चुका है। त्रैमासिक पत्रिका ‘मीडिया विमर्श’ द्वारा प्रारंभ किए गए इस अखिलभारतीय सम्मान के तहत साहित्यिक
पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले संपादक को ग्यारह हजार
रूपए, शाल, श्रीफल, प्रतीकचिन्ह और सम्मान पत्र से अलंकृत
किया जाता है। सम्मान कार्यक्रम 7, फरवरी, 2015 को गांधी भवन, भोपाल में सायं 5 बजे
आयोजित किया गया है। मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक संजय द्विवेदी ने
बताया कि आयोजन में अनेक साहित्कार, बुद्धिजीवी और
पत्रकार हिस्सा लेगें। इस अवसर पर ‘मीडिया और मूल्यबोध’ विषय पर व्याख्यान भी आयोजित किया गया है।
कौन हैं विनय उपाध्यायः
साहित्य,संस्कृति और कला पत्रकारिता में विगत 25 वर्षों से समान सक्रिय। दैनिक
भास्कर और नई दुनिया समाचार समूह में लम्बी सम्बद्धता के बाद इन दिनों दो
सांस्कृतिक पत्रिकाओं "कला समय" और "रंग संवाद" का सम्पादन और
अपनी रचनात्मक प्रतिबद्धता के लिए अनेक प्रादेशिक और राष्ट्रीय सम्मानो से
विभूषित। जनवरी 1998 में कला और विचार की द्वैमासिक हिंदी पत्रिका "कला समय" का सम्पादन आरम्भ।
साहित्य और कला जगत से जुडी अनेक विभूतियों और घटना-प्रसंगों पर दस्तावेज़ी अंकों का प्रकाशन। उनके द्वारा संपादित कलासमय पत्रिका माधवराव सप्रे समाचार पत्र और शोध संस्थान द्वारा रामेश्वर गुरु
पुरूस्कार से सम्मानित। भारत सहित विदेशों में भी शोध-अध्ययन के लिए कला समय
सन्दर्भ पत्रिका के बतौर मान्य। हिंदी साहित्य में
स्नातकोत्तर और कंठ संगीत में विशारद। देश भर की पत्र -पत्रिकाओं में सांस्कृतिक विषयों पर नियमित स्तम्भ और
समसामयिक कला मुद्दों पर आलेख और टिप्पणियों का प्रकाशन। दूदर्शन के लिए अनेक
वृत्तचित्रों का आलेख और पार्श्व स्वर तथा संगीत-नृत्य के
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय समारोहों के संचालन का सीधा प्रसारण। कई निजी प्रतिष्ठानो द्वारा निर्मित
दृश्य-श्रव्य प्रस्तुतियों का संचालन। बतौर कला समीक्षक देश के विभिन्न राज्यों की
सांस्कृतिक यात्राएं और अखबारों के लिए विशेष रिपोर्टिंग। कविता लेखन और संगीत में भी विशेष रूचि। प्रसार भारती द्वारा गणतंत्र दिवस के प्रतिष्ठित सर्व भाषा कविता सम्मलेन हेतु हिंदी के युवा कवि बतौर
बनारस में शिरकत। मधुकली वृन्द द्वारा जारी संगीत अलबमों में गायक स्वर। एक दर्जन से भी ज्यादा साहित्यिक -सांस्कृतिक संस्थाओं के मानद सदस्य।
इन दिनों आईसेक्ट युनिव्हर्सिटी से सम्बद्ध वनमाली सृजन पीठ के राज्य समन्वयक। एक
दशक पहले मॉरीशस का साहित्यिक प्रवास।
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शनिवार, 13 दिसंबर 2014
उन्हें भारत से नफरत क्यों है?
एक सार्थक परिवर्तन के दौर से गुजर रहे राष्ट्र
के रास्ते में मत आइए
-संजय द्विवेदी
यह समझना मुश्किल है कि
संस्कृत का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा से क्या लेना-देना है। किंतु संस्कृत
का विरोध इस नाम पर हो रहा है कि संघ परिवार उसे कुछ लोगों पर थोपना चाहता है। इसी
तरह धर्मांतरण की किसी घटना से भाजपा या उसकी दिल्ली में बैठी सरकार का क्या
रिश्ता हो सकता है? सरकार अगर धर्मांतरण के खिलाफ कड़े कानून की बात
करे तो भी हंगामा है। मीडिया ऐसी खबरों को सनसनी देने में माहिर है और बिना बात के
सवालों पर संसद और देश की जनता का दोनों का वक्त खराब करने में मीडिया की मास्टरी
है। निरंजन ज्योति कोई पहली और आखिरी नेता नहीं है जिनकी जुबान फिसली है। हमारे
देश में मुलायम सिंह, मायावती, लालू प्रसाद, आजम खां, ओवैसी से लेकर हर दल में ऐसे
नेताओं की एक लंबी श्रृखंला है जिनकी जबान फिसल-फिसल पड़ती है। किंतु निरंजन
ज्योति ने क्योंकि भगवा पहन रखा है और वे भाजपा से आती हैं इसलिए उनके पीछे जमाने
का पड़ जाना स्वाभाविक है। यही सेकुलर राजनीति है और यही भारत विरोध है।
देशतोड़कों से प्यार, देशभक्तों को दुत्कारः
आप देखें तो कुछ लोग हर उस
चीज के खिलाफ हैं जिसका रिश्ता भारत से जुड़ता हो। जो अरूंधती राय की बदजुबानियों
के साथ खडे हैं, जिन्हें कश्मीर के पाक प्रेरित अलगाववादियों से मंच साझा करने में
गुरेज नहीं है, जो देशतोड़क माओवादी आतंकवादियों के प्रति भी उदार हैं वही
संस्कृत, हिंदी, हिंदू समाज और भारतीयता के किसी भी प्रतीक के खिलाफ हैं। किसी भी
लोकतंत्र में रहते हुए ऐसी वैचारिक छूआछूत और असहिष्णुता की छूट नहीं दी जा सकती।
संस्कृत भाषा इस देश की भाषा है। उसकी जर्मन से क्या तुलना। हमारा समूचा साहित्य,
वांग्मय और दर्शन इसी भाषा में समाया हुया है। सही मायने में वह एक लोकप्रिय भाषा
भले न हो किंतु बेहद वैज्ञानिक और भारत को समझने की एकमात्र खिडकी जरूर है। भारत
की भाषाओं के खिलाफ इस प्रकार की सोच क्यों है? क्या
भारतीय भाषाएं अपनी ही जमीन पर अपमानित होने के लिए हैं। अंग्रेजी के खिलाफ आपकी
सोच इतनी आक्रामक क्यों नहीं है? क्यों एक ऐसे देश
का राज और अदालतें एक ऐसी भाषा में चलती हैं, जिसे
देश के ज्यादातर लोग नहीं समझते? किंतु अंग्रेजी
साम्राज्यवाद को बचाए और बनाए रखने के लिए सत्ताएं अंग्रेजी को पोषित कर रही हैं। अंग्रेजी
के खिलाफ जिनके बोल नहीं फूटते वे संस्कृत के खिलाफ और हिंदी के खिलाफ तलवारें
भांजने का कोई अवसर नहीं चूकते। आखिर यह किस तरह का भारत हम बना रहे हैं जहां अपनी
विरासतों के प्रति भी हममें संदेह जगाया जा रहा है। अयोध्या में रामजन्मभूमि से
लेकर तमाम ऐसे सवाल हैं जो बताते हैं कि हम दरअसल अपनी विरासतों, पुरखों और
मानविंदुओं पर भी अदालती फरमानों के इंतजार में हैं।
माटी के प्रति कम होता मोहः
अदालतें हमें बता रही हैं कि हमारा इतिहास क्या है। वे हमें बताएंगीं
कि बाबर कौन हैं और राम कौन हैं। क्या ही अच्छा होता कि हमारी राजनीति और समाज
इतना वयस्क होता कि वह स्वयं आकर समस्याओं के समाधान में सहायक बनता। आखिर क्यों
अयोध्या के हाशिम अंसारी जब रामलला पर चिंता जताते हैं तो कई खेमों की नींद हराम
हो जाती है। क्यों कुछ लोगों और दलों को अपनी राजनीति दुकान उजड़ने का खतरा दिखता
है। देश में समस्याएं बहुत हैं किंतु ज्यादातर हमने स्वयं पैदा की हैं। अपने देश
और उसकी माटी के प्रति कम होते प्यार, राष्ट्रीयता की क्षीण हो रही भावनाएं हमें
गलत मार्ग पर ले जाती हैं। यह साधारण नहीं है कि हमारे वतन में पैदा हो रही पौध
किसी धार्मिक अतिवादी संगठन के आह्वान पर किसी दूसरे देश जमीन पर जाकर जंग में
शामिल हो जाती है। यानी आप माने न मानें हमारा राष्ट्रवाद पराजित हो रहा है। वह
विचलित हो रहा है। अतिवादी विचार युवाओं को इतना आकर्षित कर रहे हैं कि वे अपनी
माटी को छोडकर कथित जेहाद में शामिल हो जाते हैं। ये हालात बताते कि हैं हमने
आजादी के बाद अपनी भारतीयता को, अपनी राष्ट्रीय चेतना को कमजोर किया है। आज हमारे
देश में वंदेमातरम् गाने न गाने को लेकर, रामजन्मभूमि को लेकर, संस्कृत को लेकर,
गौहत्या को लेकर, राष्ट्रभाषा हिंदी को लेकर, कश्मीर को लेकर, जातियों और पंथों को
लेकर अनेक विवाद हैं।
किसी मुद्दे पर तो एकमत हो जाइएः
किसी भी राष्ट्रीय सवाल पर पूरा देश एकमत नहीं
है। यह हमारी बहुत बड़ी कमजोरी है। क्या इसी तरह खंड-खंड होकर हम इस देश को अखंड
बनाएंगें। क्या टुकड़ों में बंटी सोच, बांटने की राजनीति हमें एक समर्थ देश के रूप
में स्थापित होने देगी ? क्या राजनीति का यह रूप हमारी राष्ट्रीय भावना
के लिए चुनौती नहीं है। आखिर हम कब समग्रता में सोचना और विविधता का सम्मान करना
सीखेगें। हमारी भाषाएं हमारी माताओं की तरह पूज्य हैं। किंतु हम भाषा की राजनीति
में ऐसे उलझे हैं कि अपनी माताओं को अपमानित करते हुए एक विदेशी पर पूरी तरह
अवलंबित हो गए हैं। इस चित्र में हाल-फिलहाल कोई बदलाव आने की संभावना भी नहीं
दिखती।
एक भारत बना हुआ है तो एक
नया भारत बनता हुआ दिखता है। देश की राजनीति और समाज जीवन में एक नया दौर प्रारंभ
हो गया है। उसे भटकाने के लिए, मुद्दों से अलग करने के लिए तमाम ताकतें नए सिरे से
लगी हैं। उन्हें एक भारत- समर्थ भारत पसंद नहीं है। वे आपस में लड़ता हुआ, टूटता
हुआ, कमजोर भारत चाहती हैं। वे चाहते हैं कि भारतीयता अपमानित हो और दुनिया हम पर
हंसे। किंतु उनके सपने थक रहे हैं, वे चूक रहे हैं। भारत से भारत का परिचय हो रहा
है। वह एक नए सपने की दौड़ लगा रहा है। वह मानवता को सुखी करने और दुनिया को
शांति-सद्भाव का पाठ पढ़ाने की अपनी विरासत की ओर देख रहा है। भारत को पता है वही
है जो सह-अस्तित्व के मायने जानता है। वह अकेला है जो जिसका मंत्र ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ है,
वही है जो कह सकता है जो कह सकता है कि ‘सर्वे
भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया’। वही है जो कहता है ‘मैं ही नहीं तू भी’। यह
तिरस्कार का नहीं स्वीकार का दर्शन है। पीड़ित मानवता को सुखी बनाने का दर्शन है।
इसलिए दुनिया के सामने भारतीय एक तेजोमय विकल्प बनकर उभर रहा है।
सच होंगें विवेकानंद के सपनेः
भारत का
समाज, उसकी संस्कृति और परिवार व्यवस्था आज दुनिया के सामने एक सार्थक जीवन के
विकल्प के रूप में दिखते हैं। अपनी विरासतों और अपने साहित्य पर गर्व करता यह समाज
अनेक कमजोरियां से घिरा है। वह विस्मृतियों के लोक में है। वह भूल चुका था वह क्या
है। आज फिर भारत खुद को याद कर रहा है, अपना पुर्नस्मरण कर रहा है। अपने वैभव को
पुनः पाने को आतुर है। ऐसे समय में विरोधी ताकतें हताशा में हैं। वे ऐसा होते हुए
देखना नहीं चाहतीं। उन्हें लग रहा है कि उनके सतत प्रयासों, षडयंत्रों के बावजूद
आखिर क्या हो रहा है। क्या महर्षि अरविंद, स्वामी विवेकानंद के वचन सत्य होने वाले
हैं? अगर हो जाएं तो आखिर आप कहां जाएंगें? किंतु घबराइए मत इस भारत में आप अपनी व्यापक
असहमतियों के बावजूद भी सुरक्षित हैं। यही विचार है जो विरोधी को समाप्त करने में
नहीं उसे साथ लेने के लिए, संवाद के लिए आतुर है। ऐसे समय में भारत से भारत का
परिचय हो रहा है तो होने दीजिए... बाधक मत बनिए। क्योंकि यह परिर्वतन तो होगा, आप
नहीं चाहेंगें तो भी होगा।
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सोमवार, 8 दिसंबर 2014
सामाजिक न्याय की ताकतों की लीलाभूमि पर आखिरी जंग
मोदी इफेक्ट से घबराए समाजवादियों की एकता कितनी
टिकाऊ होगी
-संजय द्विवेदी
मुलायम सिंह यादव के
नेतृत्व में पुराने जनता दल के साथियों का साथ आना बताता है कि भारतीय राजनीति किस
तरह ‘मोदी इफेक्ट’ से
मुकाबिल है। प्रधानमंत्री होने के बाद भी जारी नरेंद्र मोदी के विजय रथ को रोकने
के लिए हो रही यह कवायद बताती है कि समाजवादियों ने भविष्य के संकेत पढ़ लिए हैं
और एकजुट होने लगे हैं। कभी एक रहे ये साथी जानते हैं कि वे साथ नहीं आए तो खत्म
हो जाएंगें।
उन्हें एकजुट करने के लिए
बिहार, उप्र और हरियाणा के चुनावी परिणाम कारण बने हैं। उप्र और बिहार में जिस तरह
लोकसभा चुनावों में भाजपा की आंधी चली उसमें जनता परिवार के पैर उखड़ गए। मुलायम
अपने परिवार के अलावा कुछ हासिल न कर सके तो जेडीयू ही हालत भी खस्ता हो गयी। उत्तर
प्रदेश और बिहार से ऐसे परिणामों की आस खुद भाजपा को भी नहीं थी। इसके बाद हुए
हरियाणा के चुनाव परिणामों ने यह बता दिया कि माहौल क्या है और क्या होने जा रहा
है। जाहिर तौर पर जनता परिवार के बिखरे साथियों के लिए यह समय चुनौती और चेतावनी
दोनों का था। उन्हें लग गया कि राजनीति न सिर्फ बदल रही है बल्कि कई अर्थों में दो
ध्रुवीय भी हो सकती है। कांग्रेस-भाजपा के बीच मैदान बंट गया तो छोटे दलों के दिल
लद जाएंगें। किसी को कल्पना भी नहीं थी कि पिछले दो दशक से सामाजिक न्याय की
ताकतों की लीलाभूमि बने उप्र और बिहार के लोग इस तरह का फैसला सुनाएंगें। हरियाणा
जहां जातीय राजनीति ही अरसे से प्रभावी रही,पहली बार कमल खिला है। राजनीति की इस
चौसर ने बहुत अलग संकेत दिए हैं। महाराष्ट्र में अपनी साधारण और दूसरे दर्जे की
उपस्थिति से अलग भाजपा ने सबसे बड़ी पार्टी बनकर सबको चौंका दिया है। जबकि इन
राज्यों में भाजपा कभी बहुत ताकतवर नहीं रही। अकेले उप्र में उसे राज्य में अपने
दम पर सरकार बनाने का अवसर मिला था, वह भी रामजन्मभूमि आंदोलन के बाद। बिहार में
वह जनता दल की सहयोगी ही रही, बाद में उसने जेडीयू के साथ सरकार बनायी। देश के
बदलते राजनीतिक हालात में भाजपा एक बड़ा ध्रुव बनकर उभरी है। उसकी ताकत बढ़ी है और
एक बड़ा मास लीडर उसे मिला है। ऐसे कठिन समय में कांग्रेस जैसे दल जहां अलग तरह की चुनौतियों से जूझ रहे हैं तो छोटे दलों के
सामने अस्तित्व का ही संकट है।
उत्तर भारत के राज्यों में
जिस तरह अराजक स्थितियां हैं लोग विकास के सपनों के पीछे एकजुट हो रहे हैं। उप्र
और बिहार जैसे बड़े राज्य जो लोकसभा की ज्यादातर सीटें समेटे हुए हैं, में विकास
की कामना जगाकर मोदी एक लंबी पारी की मांग कर रहे हैं। नीतिश कुमार ने बिहार में
लालूप्रसाद यादव से हाथ मिलाकर अपनी सुशासन बाबू की छवि के विपरीत एक अलग राह पकड़
ली है। मुख्यमंत्री का पद छोड़कर अब वे पार्टी को फिर से खड़ी करना चाहते हैं।
किंतु जिन नारों और विकास के सपनों ने मूर्ति गढ़ी थी वह टूट रही है। लालू विरोधी
राजनीति नीतिश की प्राणवायु थी अब उस पर अकेला बीजेपी का दावा है। लालू विरोधी
राजनीति की शुरूआत नीतिश ने ही की थी भाजपा उस अभियान में सहयोगी बनी थी। आज हालात
बदल गए हैं नीतिश ने एक नया मार्ग पकड़ लिया है। उनकी छवि भी प्रभावित हो रही है।
मुलायम सिंह यादव की
चिताएं उप्र का अपना गढ़ बचाने की हैं। उनके पुत्र अखिलेश यादव जहां उप्र में
उम्मीदों का चेहरा बनकर उभरे थे और उन्हें जनता का अभूतपूर्व समर्थन भी मिला था,
अब उनकी छवि ढलान पर है। वे युवाओं के आईकान बन सकते थे किंतु अनेक कारणों से वे
एक दुर्बल शासक साबित हो रहे हैं और उनके दल के लोगों ने ही उन्हें सफल न होने
देने का संकल्प ले रखा है ऐसा अनुभव हो रहा है। अंतर्विरोधों और आपसी कलह से घिरी
उनकी सरकार को संभालने के लिए अक्सर नेताजी स्वयं मोर्चा संभालते हैं किंतु हालात काबू
में नहीं आ रहे हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश के विधानसभा ही यह तय करेगें कि जनता
परिवार का भविष्य क्या है। पिछले विधानसभा चुनावों भाजपा की हालात उत्तर प्रदेश में बहुत खराब थी।
किंतु लोकसभा में उसने श्रेष्ठ प्रदर्शन किया है। राज्य स्तर पर लोग सपा के विकल्प
के रूप में मायावती और उनकी पार्टी बसपा को देखते हैं। देखना है कि इस चुनाव में
क्या वह जगह भाजपा ले पाती है? अथवा मायावती अपनी
स्थिति में सुधार करते हुए एक विकल्प देने में सक्षम हो पाती हैं। नए बने जनता
परिवार के मोर्चे के सभी दल क्षेत्रीय दल हैं जिन्हें अपने-अपने राज्यों में अपनी
पतवार स्वयं खेनी है। अकेले बिहार में जेडीयू और राजद जैसी बड़ी पार्टियां साथ आ
रही हैं जहां उनके आपसी विरोध सामने आ सकते हैं। उपचुनावों में बिहार में साथ आने
का प्रयोग उनके पक्ष में जा चुका है। विधानसभा चुनावों में क्या यह दुहराया जा
सकेगा यह एक बड़ा सवाल है। मोर्चे में कांग्रेस की स्थिति क्या होगी या वह एक अलग
दल के रूप में चुनाव लड़ेगी यह एक बड़ा सवाल है। जहां तक समीकरणों का सवाल है
भाजपा भी बिहार में स्थानीय तौर पर पासवान-कुशवाहा को साथ लेकर एक समीकरण तो बना
ही रही है। कौन सा समीकरण भारी पड़ता है इसे देखना रोचक होगा।
भारतीय जनता पार्टी ने इस बीच अपने आपको विकास,
सुशासन और प्रगति के सपनों से जोड़कर एक नई यात्रा प्रारंभ की है। प्रधानमंत्री की
संवाद कला, अभियान निपुणता और संगठन की एकजुटता ने उसे एक व्यापक आधार मुहैया
कराया है। भाजपा इस अवसर का लाभ लेकर अपने सांगठनिक और वैचारिक विस्तार में लगी
है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी अपने प्रचारक-स्वयंसेवक प्रधानमंत्री की सफलता
सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय है। विदेश दौरों ने प्रधानमंत्री को एक विश्वनेता के
रूप में स्थापित किया है तो उनके आत्मविश्वास से पूरी दुनिया भारत को एक नए नजरिए
से देख रही है। ऐसे में अपने गढ़ों, मठों और जातीय गोलबंदी को बचाने के लिए
सामाजिक न्याय की ताकतों का एकजुट होना साधारण नहीं है। कभी कमंडल को मंडल ने मात
दी थी और उत्तर भारत का इलाका अलग तरह से प्रतिक्रिया देता नजर आया था। आज विकास
और सुशासन के सवाल की ध्वजा भाजपा के हाथ में है। ‘चलो
चलें मोदी के साथ’ उसका प्रिय नारा है। देश के युवाओं और समाज जीवन
के तमाम क्षेत्रों में मोदी ने उम्मीदों की एक लहर पैदा की है। अपनी सरकार के
आरंभिक महीनों में भी उनकी लोकप्रियता का आलम बरकरार है। वे संवाद करते हुए
सर्तकता बरत रहे हैं पर निरंतर संवाद कर रहे हैं। उनकी सरकार इच्छाशक्ति से भरी
हुयी दिखती है। उनकी आलोचनाओं का आकाश अभी बहुत विस्तृत नहीं है। एक बड़ा मोर्चा
बनाने की इच्छा से भी जनता परिवार खाली दिखता है, क्योंकि इस मोर्चे में कांग्रेस
और वाममोर्चा की पार्टियां शामिल नहीं दिखतीं। वहीं ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और
मायावती का साथ आना संभव नहीं दिख रहा है। इसके साथ ही लोकसभा में कुल 15 सांसदों
के साथ यह मोर्चा बहुत अवरोध खड़े करने की स्थिति में नहीं है। स्वार्थों में एक
होना और फिर बिखर जाने का अतीत इस जनता परिवार की खूबी रही है। नरेंद्र मोदी को यह
श्रेय तो देना पड़ेगा कि उन्होंने इस बिखरे जनता परिवार को एक कर दिया इसके परिणाम
क्या होंगें, इसे देखने के लिए थोड़ा इंतजार करना पडेगा। सही मायने में सामाजिक
न्याय की ताकतों की लीलाभूमि बने उप्र और बिहार विधानसभा के चुनाव परिणाम ही जनता
परिवार की राजनीति का भविष्य भी तय करेंगें। यह लड़ाई जनता परिवार की आखिरी जंग भी
साबित हो सकती है।
(लेखक राजनीतिक विश्वलेषक हैं)
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