सोमवार, 18 मार्च 2013
भोपाल में 23 और 24 मार्च को स्वामी विवेकानंद पर संगोष्ठी
प्रो.संजय द्विवेदी,
पत्रकार एवं लेखक
ब्लाग में व्यक्त विचार निजी हैं। इसका किसी संगठन अथवा मेरे व्यवसाय से संबंध नहीं है।
मंगलवार, 12 मार्च 2013
सन्यासी का संचार शास्त्र
-संजय द्विवेदी
स्वामी विवेकानंद ज्यादा बड़े सन्यासी थे या
उससे बड़े संचारक (कम्युनिकेटर) या फिर उससे बड़े प्रबंधक ? ये सवाल हैरत
में जरूर डालेगा पर उत्तर हैरत में डालनेवाला नहीं है क्योंकि वे एक नहीं,तीनों ही
क्षेत्रों में शिखर पर हैं। वे एक अच्छे कम्युनिकेटर हैं, प्रबंधक हैं और सन्यासी
तो वे हैं ही। भगवा कपड़ों में लिपटा एक सन्यासी अगर युवाओं का रोल माडल बन जाए तो
यह साधारण घटना नहीं है, किंतु विवेकानंद के माध्यम से भारत और विश्व ने यह होते
हुए देखा। आज के डेढ़ सौ साल पहले कोलकाता में जन्मे विवेकानंद और उनके विचार अगर
आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं तो समय के पार देखने की उनकी क्षमता को महसूस कीजिए।
एक बहुत छोटी सी जिंदगी पाकर भी उन्होंने जो कर दिखाया वह इस घरती पर तो चमत्कार
सरीखा ही था। उनकी डेढ़ सौंवी जयंती वर्ष पर देश भर में हो रहे आयोजन और उनमें
युवाओं का उत्साहपूर्वक सहभाग बताता है कि देश के नौजवान आज भी अपनी जड़ों से
जुड़े हैं और स्वामी विवेकानंद उनके वास्तविक हीरो हैं।
स्वामी विवेकानंद की बहुत छोटी जिंदगी का पाठ
बहुत बड़ा है। वे अपने समय के सवालों पर जिस प्रखरता से टिप्पणियां करते हैं वे
परंपरागत धार्मिक नेताओं से उन्हें अलग खड़ा कर देती हैं। वे समाज से भागे हुए
सन्यासी नहीं हैं। वे समाज में रच बस कर उसके सामने खड़े प्रश्नों से मुठभेड़ का
साहस दिखाते हैं। वे विश्वमंच पर सही मायने में भारत, उसके अध्यात्म, पुरूषार्थ और
वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को स्थापित करने वाले नायक हैं। वे एक गुलाम देश के
नागरिक हैं पर उनकी आत्मा,वाणी और कृति स्वतंत्र है। वे सोते हुए देश और उसके
नौजवानों को झकझोर कर जगाते हैं और नवजागरण का सूत्रपात करते हैं। धर्म को वे जीवन
से पलायन का रास्ता बनाने के बजाए राष्ट्रप्रेम, राष्ट्र के लोगों से प्रेम और
पूरी मानवता से प्रेम में बदल देते हैं।शायद इसीलिए वे कह पाए-“ व्यावहारिक
देशभक्ति सिर्फ एक भावना या मातृभूमि के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति मात्र नहीं है।
देशभक्ति का अर्थ है अपने साथी देशवासियों की सेवा करने का जज्बा।”
अपने जीवन,लेखन, व्याख्यानों में वे जिस
प्रकार की परिपक्वता दिखाते हैं, पूर्णता दिखाते हैं वह सीखने की चीज है। उनमें
अप्रतिम नेतृत्व क्षमता, कुशल प्रबंधन के गुर,परंपरा और आधुनिकता का तालमेल दिखता
है। उनमें परंपरा का सौंदर्य है और बदलते समय का स्वीकार भी है। वे आधुनिकता से
भागते नहीं, बल्कि उसका इस्तेमाल करते हुए नए समय में संवाद को ज्यादा प्रभावकारी
बना पाते हैं। स्वामी जी का लेखन और संवादकला उन्हें अपने समय में ही नहीं, समय के
पार भी एक नायक का दर्जा दिला देती है। आज के समय में जब संचार और प्रबंधन की
विधाएं एक अनुशासन के रूप में हमारे सामने हैं तब हमें पता चलता है कि स्वामी जी
ने कैसे अपने पूरे जीवन में इन दोनों विधाओं को साधने का काम किया। यह वह समय था
जब मीडिया का इतना कोलाहल न था फिर भी छोटी आयु पाकर भी वे न सिर्फ भारत वरन
दुनिया में भी जाने गए। अपने विचारों को लोगों तक पहुंचाया और उनकी स्वीकृति पाई।
क्या कम्युनिकेशन की ताकत और प्रबंधन को समझे बिना उस दौर में यह संभव था। स्वामी
जी के व्यक्तित्व और उनकी पूरी देहभाषा को समझने पर उनमें प्रगतिशीलता के गुण नजर
आते हैं। उनका अध्यात्म उन्हें कमजोर नहीं बनाता, बल्कि शक्ति देता है कि वे अपने
समय के प्रश्नों पर बात कर सकें। उनका एक ही वाक्य –“उठो!जागो ! और तब तक मत रूको जब तक लक्ष्य प्राप्त
नहीं हो जाता।” उनकी
संचार और संवादकला के प्रभाव को स्थापित करने के लिए पर्याप्त है। यह वाक्य हर
निराश व्यक्ति के लिए एक प्रभावकारी स्लोगन बन गया। इसे पढ़कर जाने कितने सोए,
निराश, हताश युवाओं में जीवन के प्रति एक उत्साह पैदा हो जाता है। जोश और उर्जा का
संचार होने लगता है। स्वामी जी ने अपने जीवन से भी हमें सिखाया। उनकी व्यवस्थित
प्रस्तुति, साफा बांधने की शैली जिसमें कुछ बाल बाहर झांकते हैं बताती है कि उनमें
एक सौंदर्यबोध भी है। वे स्वयं को भी एक तेजस्वी युवा के रूप में प्रस्तुत करते
हैं और उनके विचार भी उसी युवा चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे शास्त्रीय
प्रसंगों की भी ऐसी सरस व्याख्या करते हैं कि उनकी संचारकला स्वतः स्थापित हो जाती
है। अपने कर्म, जीवन, लेखन, भाषण और संपूर्ण प्रस्तुति में उनका एक आदर्श प्रबंधक
और कम्युनिकेटर का स्वरूप प्रकट होता है। किस बात को किस समय और कितने जोर से कहना
यह उन्हें पता है। अमरीका के विश्व धर्म सम्मेलन में वे अपने संबोधन से ही लोगों
को सम्मोहित कर लेते हैं। भारत राष्ट्र और उसके लोगों से उनका प्रेम उनके इस वाक्य
से प्रकट होता है-“ आपको
सिखाया गया है अतिथि देवो भव, पितृ देवो भव, मातृदेवो भव। पर मैं आपसे कहता हूं
दरिद्र देवो भव, अज्ञानी देवो भव, मूर्ख देवो भव।” यह बात बताती है कि कैसे वे अपनी संचार
कला से लोगों के बीच गरीब, असहाय और कमजोर लोगों के प्रति संवेदना का प्रसार करते
नजर आते हैं। समाज के कमजोर लोगों को भगवान समझकर उनकी सेवा का भाव विवेकानंद जी
ने लोगों के बीच भरना चाहा। वे साफ कहते हैं- “यदि तुम्हें भगवान की सेवा करनी हो तो, मनुष्य की
सेवा करो। भगवान ही रोगी मनुष्य, दरिद्र पुरूष के रूप में हमारे सामने खड़ा है।वह
नर वेश में नारायण है।” संचार की यह शक्ति कैसे धर्म को एक व्यापक सामाजिक
सरोकारों से जोड़ देती है यह स्वामी जी बताते हैं। सही मायने में विवेकानंद जी एक
ऐसे युगपुरूष के रूप में सामने आते हैं जिनकी बातें आज के समय में ज्यादा
प्रासंगिक हो गयी दिखती हैं। धर्म के सच्चे स्वरूप को स्थापित कर उन्होंने जड़ता
को तोड़ने और नए भारत के निर्माण पर जोर दिया। भारतीय समाज में आत्मविश्वास भरकर
उन्हें हिंदुत्व के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान दिया जिसमें सबका स्वीकार है और सभी
विचारों का आदर करने का भाव है। इसलिए वे कहते थे भारत का उदय अमराईयों से होगा। अमराइयां
का मायने था छोटी झोपड़ियां। वे भारतीय संदर्भ में सामाजिक न्याय के सबसे प्रखर
प्रवक्ता हैं। वे दिखावटी संवेदना के खिलाफ थे और इसलिए स्वामी जी को जीवन में
उतारना एक कठिन संकल्प है। आज जबकि कुपोषण,पर्यावरण के सवालों पर बात हो रही है। स्वामी
जी इन मुद्दों पर बहुत सधी भाषा में अपनी बात कर चुके हैं। वे बेहतर स्वास्थ्य को
एक नियामत मानते हैं। इसीलिए वे कह पाए कि गीता पढ़ने से अच्छा है, फुटबाल खेलो।
एक स्वस्थ शरीर के बिना भारत सबल न होगा यह उनकी मान्यता थी। मात्र 39 साल की आयु
में वे हमसे विदा हो गए किंतु वे कितने मोर्चों पर कितनी बातें कह और कर गए हैं कि
वे हमें आश्चर्य में डालती हैं। एक साधारण इंसान कैसे अपने आपको विवेकानंद के रूप
में बदलता है। इसमें एक प्रेरणा भी है और प्रोत्साहन भी। आज की युवा शक्ति उनसे
प्रेरणा ले सकती है। स्वामी विवेकानंद ने सही मायने में भारतीय समाज को एक
आत्मविश्वास दिया, शक्ति दी और उसके महत्व का उसे पुर्नस्मरण कराया। सोते हुए भारत
को उन्होंने झकझोरकर जगाया और अपने समूचे जीवन से सिखाया कि किस तरह भारतीयता को
पूरे विश्वमंच पर स्थापित किया जा सकता है। एक बेहतर कम्युनिकेटर, एक प्रबंधन
गुरू, एक आध्यात्मिक गुरू, वेदांतों का भाष्य करने वाला सन्यासी, धार्मिकता और
आधुनिकता को साधने वाला साधक, अंतिम व्यक्ति की पीड़ा और उसके संघर्षों में उसके
साथ खड़ा सेवक, देशप्रेमी, कुशल संगठनकर्ता, लेखक एवं संपादक, एक आदर्श शिष्य जैसी
न कितनी छवियां स्वामी विवेकानंद से जुड़ी हैं। किंतु हर छवि में वे अव्वल नजर आते
हैं। उनकी डेढ़ सौवीं जयंती का साल मनाते हुए देश में विवेकानंद के विचारों के
साथ-साथ जीवन में भी उनकी उपस्थिति बने तो यही भारत मां के माथे पर सौभाग्य का
टीका साबित होगी।
( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में
जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)
प्रो.संजय द्विवेदी,
पत्रकार एवं लेखक
ब्लाग में व्यक्त विचार निजी हैं। इसका किसी संगठन अथवा मेरे व्यवसाय से संबंध नहीं है।
रविवार, 10 मार्च 2013
साहित्य मानव मन की सबसे पवित्र भाषाः विजयबहादुर सिंह
पं.बृजलाल द्विवेदी सम्मान से
नवाजे गए गिरीश पंकज
भोपाल। प्रख्यात कवि, आलोचक और लेखक विजयबहादुर सिंह का कहना है कि भारत में धर्म और राजनीति कोई दो बातें
नहीं हैं। अन्यायी की पहचान और उससे ‘लोक’ की मुक्ति या त्राण दिलाने की सारी कोशिशें ही
धार्मिक कोशिशें रही हैं। वे यहां पं.बृजलाल द्विवेदी स्मृति अखिलभारतीय साहित्यिक
पत्रकारिता सम्मान समारोह में मुख्यवक्ता की आसंदी से बोल रहे थे। कार्यक्रम का
आयोजन भोपाल के रवींद्र भवन में ‘मीडिया विमर्श’ पत्रिका द्वारा किया गया था।
राजनीति हो चुकी है लोकविमुखः
अपने वक्तव्य में उन्होंने
लोकतंत्र के रोज-रोज वीआईपी और वीवीआईपी तंत्र में बदलने और गांधी द्वारा
निर्देशित दरिद्रनारायणों के हितों को हाशिए लगाए जाने की स्थितियों पर गहरी चिंता
व्यक्त की। साथ ही भारत के सांस्कृतिक इतिहास,तिरंगे के प्रतीक रंगों और बीच में
प्रतिष्ठित चक्र की व्याख्या करते हुए उन्होंने याद दिलाया कि साहित्य का काम
सभ्यता के अंधेरों में मशाल की तरह जलना है। रामायण, महाभारत- भारत के लोगों के
पास ऐसी ही कभी न बुझने वाली और प्रत्येक कठिन अंधेरों में अपनी रोशनी फेंकने वाली
मशालें हैं। श्री सिंह का कहना था कि भारत की सत्ता राजनीति लोकविमुख हो चुकी है।
विश्व पूंजीवाद और उत्तर साम्राज्यवाद अपने पांव पसार चुके हैं। वे मनुष्य को
ग्राहक के रूप में बदलने पर आमादा हैं।
साहित्यिक पत्रकारिता के सामने इन ताकतों से लड़ने की गहरी चुनौतियां हैं।
उन्होंने कहा कि साहित्य मानव मन की सबसे
पवित्र भाषा है।साहित्य ही सबसे अधिक दैवी और ताकतवर भाषा है। उन्होंने उम्मीद
जतायी कि भारत की साहित्यिक पत्रकारिता इसके तेज और ताप की रक्षा प्रत्येक स्थिति
में कर सकेगी।
सामाजिक संवाद में मर्यादाएं जरूरीः
कार्यक्रम के मुख्यअतिथि माखनलाल चतुर्वेदी
राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति प्रो.बृजकिशोर कुठियाला ने कहा कि
पत्रकारिता सामाजिक संवाद का ही एक रूप है। सामाजिक संवाद में अगर मर्यादाएं न होंगी
तो उसका चेहरा कितना विकृत हो सकता है, इसे समझा जा सकता है। इसके लिए समाजशास्त्र
और मनोविज्ञान को समझे बिना पत्रकारिता बेमानी हो जाएगी। पत्रकारिता के धर्म को तय
करते समय यह जरूरी है कि हम यह सोचें की पत्रकारिता का कलेवर नकारात्मक रहे या
समाज को जोड़ने और विकास की ओर ले जाने वाला हो। पत्रकार और पत्रकारिता की
नकारात्मक दृष्टि के पीछे इसकी धर्मविहीनता ही है। उनका कहना था कि यदि भारतीय
समाज में संवाद का निर्धारण विदेशी पूंजीपतियों को करना है तो भविष्य का भारतीय
समाज अपने हितों की रक्षा करेगा या विदेशी शक्तियों के योजनाओं के पालन में लगेगा,
यह एक बड़ा सवाल मीडिया के सामने खड़ा है। प्रो. कुठियाला ने कहा कि जब मीडिया या
मानव का संवाद व्यापार बन जाए और कुछ गिने-चुने लोग ही तय करें कि वृहत्तर समाज को
क्या सुनना, देखना, पढ़ना, करना और सोचना है तो यह अप्राकृतिक और अमानवीय है। हमें
इस खतरे को पहचान कर इसका भी तोड़ खोजना होगा, जिसमें सोशल मीडिया कुछ हद तक कारगर
साबित हो सकता है।
बदली नहीं हैं मनुष्यता की चिंताएं-
समारोह के अध्यक्ष प्रख्यात समाजवादी लोककर्मी रघु ठाकुर ने भारतीय
पत्रकारिता के सामने उपस्थित चुनौतियों का जिक्र करते हुए कहा कि भले ही अब हालात
पहले जैसे न रहे हों किंतु मानव समाज और मनुष्यता की चिंताएं कमोबेश वही हैं। इसके
लिए भविष्य की पत्रकारिता को अपने हथियारों को अधिक पैना और जरूरत से ज्यादा
समझदार बनाना होगा। घुटने टेकना और समझौते करना पत्रकारिता का फर्ज नहीं है।
उन्होंने याद दिलाया कि हम अंततः एक लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय समाज हैं। इसमें
बहुत सारी राष्ट्रीयताएं अपनी आजादी के लिए हाथ-पांव पसार रही हैं। पत्रकारों को
इन सब जगहों की ओर अपनी सजगता और कर्मठता का इम्तहान देना होगा।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि हरिभूमि के प्रबंध
संपादक डा. हिमांशु द्विवेदी ने कहा
कि जिस दौर में भारत की परिवार परंपरा खतरे में हो,रिश्तों के नकलीपन उजागर हो रहे
हों, उस समय में अपने पूर्वजों की स्मृति में ऐसा बड़ा आयोजन जड़ों से जोड़ने का
प्रयास है। साहित्यिक पत्रकारिता ने निश्चय ही हिंदी की सेवा और गंभीर विमर्शों के
क्षेत्र में बड़ा काम किया है। ऐसे में इस सम्मान की सार्थकता और प्रासंगिकता बहुत
बढ़ जाती है।
समारोह में सद्भावना दर्पण(रायपुर) के संपादक गिरीश पंकज को 11 हजार रूपए की
सम्मान राशि, शाल, श्रीफल, मानपत्र और प्रतीक चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। इस
अवसर पर श्री पंकज ने कहा कि अपनी पत्रकारिता के माध्यम से वे भाषाई सद्भभावना को
फैलाने का काम कर रहे हैं।
कार्यक्रम में सर्वश्री रमेश दवे, कमल दीक्षित, सुबोध
श्रीवास्तव, महेंद्र गगन, दिनकर सबनीस, हेमंत मुक्तिबोध, नरेंद्र जैन, दीपक
तिवारी, गिरीश उपाध्याय, मधुकर द्विवेदी, अनिल सौमित्र,प्रकाश साकल्ले सहित अनेक
साहित्यकार, पत्रकार,लेखक एवं नगर के विविध क्षेत्रों से जुड़े लोग और छात्र बड़ी
संख्या में मौजूद थे। स्वागत भाषण संजय द्विवेदी ने और आभार प्रदर्शन मीडिया
विमर्श के संपादक डा.श्रीकांत सिंह ने किया। कार्यक्रम का संचालन डा.सुभद्रा राठौर
ने किया।
गूंजा कबीर रागः कार्यक्रम के दूसरे सत्र में पूरा रवींद्र भवन कबीर
और सूफी राग में नहा उठा। अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति में पद्श्री स्वामी जीसीडी भारती ( भारती बंधु) ने समूचे श्रोता वर्ग को सूफीयाना
माहौल में रंग दिया। कार्यक्रम के प्रारंभ में इस सत्र के मुख्यअतिथि पूर्व सांसद कैलाश नारायण सारंग ने भारती बंधु और सभी
साथी कलाकारों का शाल-श्रीफल देकर अभिनंदन किया।
प्रो.संजय द्विवेदी,
पत्रकार एवं लेखक
ब्लाग में व्यक्त विचार निजी हैं। इसका किसी संगठन अथवा मेरे व्यवसाय से संबंध नहीं है।
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