गुरुवार, 8 जनवरी 2026

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्षों की कहानी

                                                 ‘तत्वमसि’ में है प्रचारकों की जिंदगी का बयान

-प्रो.संजय द्विवेदी



 देश में हुए सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रति सामान्यजन की जिज्ञासा बढ़ा दी है। इस बीच अपनी यात्रा के 100 साल संघ ने पूरे कर लिए हैं। इसलिए संघ की संपर्क गतिविधियां भी सामान्य दिनों से ज्यादा हैं। ऐसे समय में संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्रीधर पराड़कर का उपन्यास ‘तत्वमसि’ बड़ी सरलता से आरएसएस के बारे में बताता है। यह उपन्यास एक आत्मकथात्मक उपन्यास भी कहा जा रहा है, जिसके केंद्र में खुद लेखक और उसके अनुभव हैं। बावजूद इसके एक प्रचारक की जिंदगी के बहाने संघ को समझाने में यह उपन्यास पूरी तरह सफल है।

     कहानियों से चीजों को बताना आसान होता है, विचार कई बार भ्रमित भी करते हैं और उन्हें समझना सबके बस की बात नहीं। उसे वही ग्रहण कर सकता है जिसकी उस विचार विशेष में रुचि हो। शायद इसीलिए पूज्य सरसंघचालक डा. मोहन भागवत इस बात को रेखांकित करते रहे हैं कि “संघ को संघ के भीतर आकर ही समझा जा सकता है।” अपनी स्थापना के समय से ही संघ कुछ शक्तियों के निशाने पर रहा है। खासकर आजाद भारत में उसे इसके दंश कई बार भोगने पड़े। श्रीधर पराड़कर का यह उपन्यास उनके अर्जित अनुभवों का बयान भी है। इसलिए इस कृति की विश्वसनीयता बढ़ जाती है। सही मायनों में यह भोगा हुआ सत्य है, जिसकी अनुभूति इसे पढ़ते समय सहज ही होती है। 

     हम जानते हैं कि श्रीधर पराड़कर, संघ प्रेरित अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री रहे हैं और लंबे समय से सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय हैं। एक लेखक,चिंतक,विचारक और संगठनकर्ता के नाते वे राष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिलब्ध हैं। ऐसे सरोकारी व्यक्ति का लेखन निश्चित ही बहुत सारे सवालों के जवाब लेकर आता है। किसी भी उपन्यास या कहानी की सबसे बड़ी सफलता है उसकी रोचकता। कहानी को सुनने-पढ़ने का मन होना। कथारस में बहते चले जाना। विचार और संगठन जैसी बोझिल समझी जाने वाली कथा को भी पराड़करजी ने जिस अंदाज में व्यक्त किया है उसने पुस्तक की पठनीयता बनाए रखी है। यह किताब न सिर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार तत्व, प्रचारकों की जीवन शैली, संघ के समावेशी चरित्र का बयान करती है बल्कि किस तरह वह समाज परिवर्तन को व्यक्ति परिर्वतन के माध्यम से संभव कर रहा है इसे भी बताती है। 

   उपन्यास के मुख्य पात्र परितोष बाबू संघ के प्रचारक हैं। प्रचारक परंपरा के बारे में समाज में न्यूनतम जानकारियां हैं। इस किताब में ‘प्रचारक परंपरा’ जो सामान्य वस्त्रों में रहकर भी ‘साधु परंपरा’ का पालन करती है का विषद वर्णन है। समाज जीवन में काम करते हुए आने वाली कठिनाइयों से लेकर,समाज के प्रश्नों का उत्तर भी प्रचारक खोजते हैं। भाषा की रवानी और कथा शैली ऐसी कि संगठन शास्त्र जैसे विषयों को किस्सागोई के साथ कहने में लेखक सफल रहे हैं। पत्रकार अनंत विजय ने किताब के फ्लैप पर ठीक ही लिखा है कि-“मेरे जानते हिंदी के किसी लेखक ने किसी संगठन को केंद्र में रखकर इस तरह का उपन्यास नहीं लिखा है। यह अभिनव प्रयोग है, जिसके मोहजाल में पाठक का पड़ना तय है।”

    पुस्तक के आरंभ में ही अपनी रेलयात्रा के माध्यम से परितोष बाबू न सिर्फ अपना स्वभाव,विचार रख देते हैं बल्कि समाज को लेकर अपनी सोच को भी प्रकट करते हैं। पहले दृश्य से बांध लेना इसे ही कहते हैं। यह उपन्यास एक कर्मनिष्ठ प्रचारक की जिंदगी से गुजरत हुए समाज के अनेक प्रश्नों के उत्तर भी देता चलता है। इसमें जो पात्र हैं वे बहुत सुनियोजित तरीके से कथा के उद्देश्य को पूरा करने में सहयोग करते हैं। विभिन्न पंथों और विचारों से जुड़े पात्रों का संवाद भी परितोष बाबू से होता है। यहां यह भी प्रकट होता है कि वे व्यक्ति से व्यक्ति का संवाद पसंद करते हैं। मुस्लिम युवा अफरोज से संवाद का अवसर आता है तो वे अपने सहयोगी से कहते हैं,-“ उन्हें बुलाना नहीं हम उनसे मिलने उनके घर जाएंगें।” इससे पता चलता है कि संघ की कार्यपद्धति क्या है। जहां वह व्यक्ति से नहीं बल्कि परिवार से जुड़ता है ताकि उनसे सच्चा जुड़ाव हो सके। उनके सुख-दुख अपने हो जाएं।

     यह उपन्यास इस अर्थ में विशिष्ठ है कि यह अपने समय और उसके सवालों से जूझता  है। उसके ठोस और वाजिब हल खोजने की कोशिशें भी करता है। संवाद के माध्यम से यह उपन्यास जो कहता है उसे बहुत बड़े वक्तत्वों से नहीं समझाया जा सकता। प्रो. संजय कपूर, विदेशी मूल की युवती नोरा, महेश बाबू, अफरोज,सदानंद, अनिता और स्नेहल जैसे पात्रों के बहाने जो ताना-बाना बुना गया है वह अप्रतिम है। सदानंद,अमित और स्नेहल से हुए संवाद में परितोष बाबू जिस तरह संघ से जुड़े सवालों के उत्तर देते हैं,वैसे ही वे समाज और परिवार के मुद्दों पर राय रखते हैं। वे एक ऐसे बुर्जग की तरह पेश आते हैं जिस पर सबकी आस्था है। भारतीय परिवारों में बुर्जगों की भूमिका क्या होनी चाहिए, क्या है इसे भी परितोष बाबू की छवि में देखा जा सकता है। परितोष बाबू जैसे लोग जिन्होंने अपना परिवार नहीं बनाया, उसकी मनोभूमि कैसे तैयार होती है। कैसे वे सब कुछ त्यागकर अपने समाज और देश की बेहतरी के स्वयं को आत्मार्पित कर देते हैं। यह सीखने वाली बात है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में बहुत से बने हुए भ्रमों, दुष्प्रचारों को यह उपन्यास एक जवाब है। भगवा ध्वज को गुरू मानना और सरसंघचालक परंपरा जैसे विषय भी सहज संवाद से सरल लगने लगते हैं।

   समकालीन कथासाहित्य में प्रायः एक ही तरह की कहानियां और उपन्यास पढ़कर जिस तरह के मनोविकार और अवसाद उपजते हैं, उसके बीच में यह उपन्यास एक ठंडी हवा के झोंके की तरह है। यह पाठकों को एक संगठन और उसके प्रचारक की कथा तो सुनाता ही है, नए भारत के निर्माण में जुटे राष्ट्रप्रेमियों से भी परिचित कराता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भारतीय समाज के पुनर्गठन की वह प्रयोगशाला है, जो विचार, सेवा और अनुशासन के आधार पर एक सांस्कृतिक राष्ट्र का निर्माण कर रही है। 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की अनोखी भारतीय दृष्टि से उपजा यह संगठन आज अपनी शताब्दी मना रहा है। यह केवल संगठन विस्तार की नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक पुनरुत्थान की एक अनवरत यात्रा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सही निगाहों से देखना और उसका उचित मूल्यांकन किया जाना अभी शेष है, यह उपन्यास उस दिशा में एक सार्थक प्रयास है। 



बुधवार, 7 जनवरी 2026

कोई अच्छा है तो अच्छा क्यों है?

 

लेखक -प्रो. संजय द्विवेदी


चित्र परिचय- इंद्रेश कुमार

    करीब दो दशक पहले की बात है श्री इंद्रेश कुमार से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मेरी मुलाकात हुयी थी। आरएसएस के उन दिनों वे राष्ट्रीय पदाधिकारी थे, जयपुर उनका केंद्र था। दैनिक हरिभूमि का स्थानीय संपादक होने के नाते मैं उनका इंटरव्यू करने पहुंचा था। अपने बेहद निष्पाप चेहरे और सुंदर व्यक्तित्व से उन्होंने मुझे प्रभावित किया। बाद में मुझे पता चला कि वे मुसलमानों को आरएसएस से जोड़ने के काम में लगे हैं। रायपुर में भी उनके तमाम चाहने वाले अल्पसंख्यक वर्ग में भी मौजूद थे। उनसे थोड़े ही समय के बाद आरएसएस की प्रतिनिधि सभा में रायपुर में फिर मुलाकात हुयी। वे मुझे पहचान गए। उनकी स्मरण शक्ति पर थोड़ा आश्चर्य भी हुआ कि वे सालों पहले हुयी मुलाकातों और मेरे जैसे साधारण आदमी को भी याद रखते हैं। इस नायाब आदमी पर एक मौजूं शेर है, जो उनकी शख्सियत पर फिट बैठता है-

मसला यह भी इस दुनिया में

कोई अच्छा है तो अच्छा क्यों है।

   सही मायनों में यह व्यक्तित्व एक ऐसा अभियान में लगा है जो कई बार विफल हो चुका है। कट्टरपंथी ताकतें बहुत आसानी से मुस्लिम समाज को भ्रमित करने में कामयाब होती रही हैं। ऐसे कठिन समय में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक इंद्रेश जी हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करते हैं। वह मुसलमानों को राष्ट्रवाद की राह पर डालकर सदियों से उलझे रिश्तों को ठीक करने की बात करते हैं। क्योंकि आज नहीं अगर दस साल बाद भी इंद्रेश कुमार अपने इरादों में सफल हो जाते हैं तो भारतीय राजनीति में जाति और धर्म की राजनीति करने वाले नेताओं की दुकान बंद हो जाएगी। वे एक ऐसा आदमी हैं जो सदियों से जमी बर्फ को पिघलाने की कोशिशें कर रहे हैं।

      अब उन इंद्रेश कुमार की भी सोचिए जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन में काम करते रहे हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य हिंदू समाज का संगठन है। ऐसे संगठन में रहते हुए मुस्लिम समाज से संवाद बनाने की कोशिश क्या उनके अपने संगठन (आरएसएस) में भी तुरंत स्वीकार्य हो गयी होंगी। जाहिर तौर पर इंद्रेश कुमार की लड़ाई अपनों से भी रही होगी और बाहर खड़े राजनीतिक षडयंत्रकारियों से भी है। वे अपनों के बीच भी अपनी सफाई देते रहे हैं कि वे आखिर मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास क्यों कर रहे हैं,  जबकि संघ का मूल काम हिंदू समाज का संगठन है। किंतु इंद्रेश कुमार की कोशिशें रंग लाने लगी हैं। वे एक ऐसे काम को अंजाम दे रहे हैं जिसकी जड़ें हिंदुस्तान के इतिहास में बहुत भयावह और रक्तरंजित हैं। मुसलमानों के बीच कायम भयग्रंथि और कुठांओं को निकालकर उन्हें 1947 के बंटवारे को जख्मों से अलग करना भी आसान काम नहीं है। महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद जैसे महानायकों की मौजूदगी के बावजूद हम देश का बंटवारा नहीं रोक पाए। उस आग में आज भी कश्मीर जैसे इलाके सुलग रहे हैं।

     तमाम हिंदुस्तान में हिंदू-मुस्लिम रिश्ते अविश्वास की आग में जल रहे हैं। ऐसे कठिन समय में इंद्रेश कुमार क्या इतिहास की धारा की मोड़ देना चाहते हैं और उन्हें यह तब क्यों लगना चाहिए कि यह काम इतना आसान है। देश को पता है कि इंद्रेश कुमार, आरएसएस के ऐसे नेता हैं जो मुसलमानों और हिंदू समाज के बीच संवाद के सेतु बने हैं। वे लगातार मुसलमानों के बीच काम करते हुए देश की एकता को मजबूत करने का काम कर रहे हैं। हिंदू- मुस्लिम एकता का यह राष्ट्रवादी दूत इसीलिए एक समय राजनीतिक षडयंत्रों का शिकार भी हुआ। संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दल पुलिस का इस्तेमाल करते रहे हैं, किंतु राजनीतिक दल इस स्तर पर गिरकर एक राष्ट्रवादी व्यक्तित्व पर कलंक लगाने का काम करेंगें, यह देखना भी शर्मनाक था। इससे इतना तो साफ है कि कुछ ताकतें देश में ऐसी जरूर हैं जो हिंदू-मुस्लिम एकता की दुश्मन हैं। उनकी राजनीतिक रोटियां सिकनी बंद न हों, इसलिए दो समुदायों को लड़ाते रहने में ही इनकी मुक्ति है। शायद इसीलिए इंद्रेश कुमार निशाने पर थे क्योंकि वे जो काम कर रहे हैं वह इस देश की विभाजनकारी और वोटबैंक की राजनीति के अनूकूल नहीं था। लेकिन समय ने उन्हें बेदाग साबित किया।

   हमें यह समझने की जरूरत है कि आखिर वे कौन से लोग हैं जो हिंदू-मुस्लिम समाज की दोस्ती में बाधक हैं। वे कौन से लोग हैं जिन्हें भय के व्यापार में आनंद आता है। हिंदुस्तान के 20 करोड़ मुसलमानों को देश की मुख्यधारा में लाने की यह कोशिश अगर विफल होती है तो शायद फिर कोई इंद्रेश कुमार हमें ढूंढना मुश्किल होगा । कुछ लोग इंद्रेश कुमार जैसे लोगों के इरादे पर शक करके हम वही काम कर रहे हैं जो मुहम्मद अली जिन्ना और उनकी मुस्लिम लीग ने किया था जिन्होंनें महात्मा गांधी को एक हिंदू धार्मिक संत और कांग्रेस को हिंदू पार्टी कहकर लांछित किया था। राष्ट्र जीवन में ऐसे प्रसंगों की बहुत अहमियत नहीं है।
इस देश को यह कहने का साहस पालना ही होगा कि हमें एक नहीं हजारों इंद्रेश कुमार चाहिए जो एक हिंदू संगठन में काम करते हुए भी मुस्लिम समाज के बारे में सकारात्मक सोच रखते हों।

     मुस्लिम समाज के संकट वस्तुतः भारतीय राजनीति और समाज के ही संकट हैं। उनकी चुनौतियां कम या ज्यादा गंभीर हो सकती हैंपर वे शेष भारतीय समाज के संकटों से जरा भी अलग नहीं है। सही अर्थों में पूरी भारतीय राजनीति का चरित्र ही कमोबेश भावनात्मक एवं तात्कालिक महत्व के मुद्दों के इर्द-गर्द नचाता रहा है। आम जनता का दर्दउनकी आकांक्षाएं और बेहतरी कभी भारतीय राजनीति के विमर्श के केंद्र में नहीं रही। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की राजनीति का यह सामूहिक चरित्र हैअतएव इसे हिंदूमुस्लिम या दलित राजनीति के परिप्रेक्ष्य में देखने को कोई अर्थ नहीं है और शायद इसलिए ‘जनता का एजेंडा’ किसी की राजनीति का एजेंडा नहीं है। मुस्लिम नेताओं पर यह आरोप तो आसानी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने कौम को आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़ा बनाए रखालेकिन क्या यही बात अन्य वर्गों की राजनीति कर रहे लोगों तथा मुख्यधारा की राजनीति करने वालों पर लागू नहीं होती ? बेरोजगारीअशिक्षाअंधविश्वासगंदगीपेयजल ये समूचे भारतीय समाज के संकट हैं और यह भी सही है कि हमारी राजनीति के ये मुद्दे नहीं है। जीवन के प्रश्नों की राजनीति से इतनी दूरी वस्तुतः एक लोकतांत्रिक परिवेश में आश्चर्यजनक ही है। देश की मुस्लिम राजनीति का एजेंडा भी हमारी मुख्यधारा की राजनीति से ही परिचालित होता है। जाहिर है मूल प्रश्नों से भटकाव और भावनात्मक मुद्दों के इर्द-गिर्द समूची राजनीति का ताना बुना जाता है। इंद्रेश जी जैसे लोग समाज की सामूहिक चिंताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। पंथिक राजनीतिक के बजाए राष्ट्र प्रथम का भाव भरने का प्रयास कर रहे हैं।

      आप देखें तो हिंदुस्तान के हर मुसलमान नेता को एक ढोंग रचना पड़ता है। एक तरफ तो वह स्वयं को अपने समाज के बीच अपनी कौम और उसके प्रतीकों का रक्षक बताता हैवहीं दूसरी ओर उसे अपने राजनीतिक मंच (पार्टी) पर भारतीय राष्ट्र- राज्य के साथ अपनी प्रतिबद्धता का स्वांग रचना पड़ता है। समूचे भारतीय समाज की स्वीकृति पाने के लिए सही अर्थों में मुस्लिम राजनीति को अभी एक लंबा दौर पार करना है। आज की राजनीति में तो ऐसा संभव नहीं दिखता। भारतीय समाज में ही नहींहर समाज में सुधारवादियों और परंपरावादियों का संघर्ष चलता रहा है। मुस्लिम समाज में भी ऐसी बहसें चलती रही हैं। इस्लाम के भीतर एक ऐसा तबका पैदा हुआजिसे लगता था कि हिंदुत्व के चलते इस्लाम भ्रष्ट और अपवित्र होता जा रहा है। वहीं मीर तकी मीरनजीर अकबरवादीअब्दुर्रहीम खानखानारसखान की भी परंपरा देखने को मिलती है। हिंदुस्तान का आखिरी बादशाह बहादुरशाह जफर एक शायर था और उसे सारे भारतीय समाज में आदर प्राप्त था। एक तरफ औरंगजेब था तो दूसरी तरफ उसका बड़ा भाई दारा शिकोह भी थाजिसनें ‘उपनिषद्’ का फारसी में अनुवाद किया। इसलिए यह सोचना कि आज कट्टरता बढ़ी हैसंवाद के अवसर घटे हैं-गलत है। आक्रामकता अकबर के समय में भी थीआज भी है।

     यहां यह बात रेखांकित किए जाने योग्य है कि अल्पसंख्यक अपनी परंपरा एवं विरासत के प्रति बड़े चैतन्य होते हैं। वे चाहते हैं कि कम होने के नाते कहीं उनकी उपेक्षा न हो जाए । यह भयग्रंथि उन्हें एकजुट भी रखती है। अतएव वे भावनात्मक नारेबाजियों से जल्दी प्रभावित होते हैं। सो उनके बीच राजनीति प्रायः इन्हीं आधारों पर होती है। यह अकारण नहीं था कि नमाज न पढ़ने वाले मोहम्मद अली जिन्नाजो नेहरू से भी ज्यादा अंग्रेज थेमुस्लिमों के बीच आधार बनाने के लिए कट्टर हो गए ।  मुस्लिम राजनीति वास्तव में आज एक खासे द्वंद में हैंजहां उसके पास नेतृत्व का संकट है । मुस्लिम समाज में अब राजनीति के अलावा सामाजिकआर्थिकसमाज सुधारशिक्षा जैसे सवालों पर बातचीत शुरु हो गई है । सतह पर दिख रहा मुस्लिम राजनीति का यह ठंडापन एक परिपक्वता का अहसास कराता है । मुस्लिम समाज में वैचारिक बदलाव की यह हवा जितनी तेज होगीसमाज उतना ही प्रगति करता दिखेगा। एक सांस्कृतिक आवाजाहीसांस्कृतिक सहजीविता ही इस संकट का अंत है । जाहिर है इसके लिए नेतृत्व का पढ़ालिखा और समझदार होना जरुरी है । नए जमाने की हवा से ताल मिलाकर यदि देश का मुस्लिम अपने ही बनाए अंधेरों को चीरकर आगे आ रहा है तो भविष्य उसका स्वागत ही करेगा । वैसे भी धार्मिक और जज्बाती सवालों पर लोगों को भड़काना तथा इस्तेमाल करना आसान होता है । गरीब और आम मुसलमान ही राजनीतिक षडयंत्रों में पिसता तथा तबाह होता हैजबकि उनका इस्तेमाल कर लोग ऊंची कुर्सियां प्राप्त कर लेते हैं और उन्हें भूल जाता हैं । अभिजात्य और जमाने की दौड़ में आगे आ गए मुस्लिम नेता दरअसल अपने कौम की खिदमत और उसे रास्ता बताने के बजाए उन्हें उसी बदहाली में रहने देना चाहते हैं ।इस संदर्भ में प्रख्यात शायर अकबर इलाहाबादी का यह शेर हमारी मुस्लिम राजनीति के ही नहींसमूची भारतीय राजनीति के चरित्र को बेनकाब करता है-

इस्लाम की अजमत का क्या जिक्र करुं हमदम

काउंसिल में बहुत सैय्यदमस्जिद में फकत जुम्मन

भारतीय समाज में इंद्रेश कुमार जैसे लोग इसलिए एक नया उजाला लेकर आ रहे हैं। संवाद के माध्यम से नया भारत बना रहे हैं।

   दूसरी ओर भाजपा भी आगे बढ़कर मुस्लिम समाज से संवाद कर रही है तो मुस्लिम नेतृत्व को भी भरोसा रखते हुए उनकी बात सुननी चाहिए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हौव्वा खड़ा कर आरएसएस के लिए प्रलाप किया जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि संघ मुस्लिम विरोधी है। जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है। आरएसएस के नेताओं ने राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के सहयोग से मुस्लिम समाज से संवाद प्रारंभ किया है। आपातकाल के समय जमाते इस्लामी और आरएसएस के नेता कई जेलों में एक साथ थे। उनके बीच बेहतर रिश्ते भी विकसित हुए थे। इसलिए मुस्लिम वोटों की ठेकेदारी करने के बजाए मुस्लिम समाज को स्वतंत्र रूप से सोचने और अपने फैसले करने का अवसर देना चाहिए। भाजपा भी अब राजनीतिक रूप से अछूत नहीं है। उसकी अटलजी के नेतृत्व वाली सरकार में उमर अब्दुला से लेकर सभी तथाकथित सेकुलर दलों के लोग मंत्री रह चुके हैं। अटलजी से लेकर नरेंद्र मोदी जी तक  की सरकारों में क्या उनके चरित्र में कहीं अल्पसंख्यक विरोधी रवैया ध्वनित होता हैसच्चाई तो यह है कि वाजपेयी सरकार ने न सिर्फ डा. एपीजे कलाम को देश के राष्ट्रपति पद पर प्रतिष्ठित किया वरन बाद के राष्ट्रपति चुनाव में एक ईसाई आदिवासी पीए संगमा को अपना समर्थन दिया था। सही तो यह है कि भाजपा और नरेंद्र मोदी के विरूद्ध अभियान चलाने वाले मुस्लिम वोटों के सौदागर हिंदु-मुस्लिम रिश्तों में सहजता के विरोधी हैं।

 इंद्रेश कुमार को हमारे समय का ऐसा नायक कहा जा सकता है जो वैश्विक तौर पर बन गयी इस्लाम की छवि को बदलने के लिए भारतीय मुसलमानों का नेतृत्व कर रहे हैं। वे मानवता के अग्रदूत हैं जहां सब राष्ट्र प्रथम की भावना रखकर देश के नवनिर्माण में लगे हैं। वे यह मानते हैं कि देश सबके योगदान और सबकी प्रगति से ही विश्वगुरु बनेगा। अपनी-अपनी भूमिका सबको निभानी होगी। राष्ट्रीय मुस्लिम मंच उनकी साधना का प्रतिफल है। एक नया सवेरा आएगा, ऐसा भरोसा उनकी संकल्पशक्ति से होता है। वे शतायु हों और एक समर्थ, समरस और आत्मीयता से भरा भारत अपनी आँखों से देखें,यही प्रार्थना है।



सामाजिक समरसता से बनेगी सुंदर दुनिया

                                                                     -प्रो. संजय द्विवेदी



    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भारतीय समाज के पुनर्गठन की वह प्रयोगशाला है, जो विचार, सेवा और अनुशासन के आधार पर एक सांस्कृतिक राष्ट्र का निर्माण कर रही है। 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की अनोखी भारतीय दृष्टि से उपजा यह संगठन आज अपनी शताब्दी मना रहा है। यह केवल संगठन विस्तार की नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक पुनरुत्थान की एक अनवरत यात्रा है।

     सौ वर्षों की इस साधना में संघ और इसके स्वयंसेवकों ने देश की चेतना को जाग्रत किया है। उन्होंने दिखाया कि न तो किसी सरकारी सहयोग की आवश्यकता होती है और न ही प्रचार के माध्यम से प्रसिद्धि की। यदि लक्ष्य पवित्र हो, मार्ग अनुशासित हो और कार्यकर्ता समर्पित हों। सेवा संघ का मूल है और सामाजिक समरसता उसका लक्ष्य। एक समरस समाज ही अपने सपनों में रंग भर सकता है और इससे ही सुंदर समाज का सृजन संभव है। गैरबराबरी को खत्म करते हुए मन में सुंदर समरस भावों का सृजन राष्ट्र प्रथम की भावना से ही संभव है।

सेवा: राष्ट्र के हृदय को स्पर्श करती संवेदना-

संघ के स्वयंसेवकों की सेवा-भावना समाज के सबसे वंचित वर्गों तक पहुंचती है। गिरिजनों और वनवासियों से लेकर महानगरों की झुग्गी बस्तियों तक, संघ प्रेरित संगठन जैसे सेवा भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, एकल विद्यालय, राष्ट्र सेविका समिति और आरोग्य भारती अखंड सेवा के भाव से कार्यरत हैं। इन संस्थाओं का उद्देश्य केवल राहत पहुंचाना नहीं, बल्कि लोगों को आत्मनिर्भर, शिक्षित और संस्कारित बनाना है। सेवा, संघ के लिए कर्मकांड नहीं, जीवनधर्म है। जो मानवता को जोड़ता है, पोषित करता है और राष्ट्र के लिए भावनात्मक एकता निर्मित करता है।संघ जैसा समावेशी, उदार और लचीला संगठन ढूंढने से नहीं मिलेगा। अपने में परिवर्तन करने, आत्मसमीक्षा करने और अपना दायरा बढ़ाते जाने के लिए संघ ख्यात रहा है। जिस तरह संघ ने समाज जीवन के सब क्षेत्रों, सब वर्गों में, सभी विचारवंतों में, सभी सामाजिक और भौगोलिक क्षेत्रों में अपनी सेवा भावना से जगह बनाई है, वह उसकी सोच को प्रकट करता है। इस अर्थ में संघ कहीं से जड़वादी संगठन नहीं है, जिसके कारण सांप्रदायिक और दायराबंद सोच पनपती है। राष्ट्रीय मुस्लिम मंच, राष्ट्रीय सिख संगत, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, एकल विद्यालय जैसे संगठनों के माध्यम से संघ ने यह स्थापित किया कि समाज को जोड़ना और सेवा के माध्यम से भारत को बदलना ही उसका लक्ष्य है। सभी सरसंघचालकों ने स्वयंसेवकों में यह भाव भरने का प्रयास किया और यह सूक्ति ही उनका ध्येय वाक्य बन गयी- नर सेवा नारायण सेवा।

    अनुसूचित जाति और जनजाति समाज के बीच अपने वनवासी कल्याण आश्रमसेवा भारती जैसे संगठनों के माध्यम से संघ ने जो मैदानी और जमीनी काम किया है उसका मुकाबला सिर्फ जबानी जमा खर्च से सामाजिक परिवर्तन कर दावा करने वाले लोग नहीं कर सकते। संघ में सेवा एक संस्कार हैमुख्य कर्तव्य है। यहां सेवा कार्य का प्रचार नहींएक आत्मीय परिवार का सृजन महत्व का है। अनेक अवसरों पर कुछ फल और कम्बल बांटकर अखबारों में चित्र छपवाने वाली राजनीति इसको नहीं समझ सकती। समाज में व्याप्त भेदभाव, छूआछूत, को मिटाने के लिए संत रविदास ने अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनके आदर्शों और कर्मों से सामाजिक एकता की मिसाल हमें देखने को मिलती है लेकिन वर्तमान दौर में इस सामाजिक विषमता को मिटाने के सरकारी प्रयास असफल ही कहे जा सकते हैं। कहीं-कहीं आशा की किरण समाज क्षेत्र में कार्यरत सेवा भारती जैसे संस्थानों के प्रकल्पों में दृष्टिगोचर होती है।

    भारत गावों में बसता है, गांवों में आज भी सामाजिक कुरीतियां कम नहीं हुयी हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने छुआछूत को मिटाने का नारा दिया, उनका जीवन भी सामाजिक समरसता की मिसाल है। गांधी जी ने स्वाधीनता आंदोलन में जितने भी प्रकल्प तय किए, उनका ध्येय भारत की सामाजिक विषमता को पाटना था। वे चाहते थे कि समाज में ऊंच-नीच, भेदभाव, लिंग अनुपात और आर्थिक सम्पन्नता,विपन्नता की खांई खत्म हो और भारत एक लय, एक स्वर, एक समानता और एक अखंडता के साथ मंडलाकार प्रवृत्ति में विश्व का नेतृत्व करे। कुछ ऐसी ही परिकल्पना पं. दीनदयाल उपाध्याय ने भी की। यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सामाजिक एकता के इसी प्रकल्प को आगे बढ़ा रहे हैं। आजादी के लगभग अस्सी वर्षों के बाद भी भारत से गरीबी हटी नहीं है और सामाजिक विषमता दूर नहीं हो सकी है। इस विषमता से समाज में लड़ाई-झगड़े, वैमनस्यता और ऊंच-नीच की प्रवृत्ति बढ़ी है। इस समस्या को भारत में मिटाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ आगे आया और सेवा के अनेक प्रकल्प शुरू किए। उनके इन सेवा प्रकल्पों का उद्देश्य भेदभाव से मुक्त, स्वाभिमानी-समरस और आत्मनिर्भर समाज बनाना था। सेवा भारती, संघ का एक ऐसा ही संगठन है जो शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक जागरण एवं कौशल विकास के लगभग हजारों केंद्रों के द्वारा प्रकल्प चला रहा है। सेवा भारती इस मुहिम में तीन दशक से जुटा हुआ है। वर्ष 2017 में सेवा भारती का रजत जयंती वर्ष था। इस वर्ष में सेवा भारती अपने प्रकल्पों का आत्मावलोकन किया और नए प्रकल्पों पर विचार करते हुए नए प्रकल्प प्रारंभ किए। रजत जयंती वर्ष पर सेवा भारती भोपाल के लाल परेड मैदान पर ऐसे हजारों श्रम साधकों का संगम भी आयोजित किया। इस संगम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत स्वयं उपस्थित रहे। इस आयोजन में श्रमिकों और गरीब व पिछड़े वर्गों के लिए जीवन समर्पित करने वाले साधकों का सम्मान भी किया गया।

  आरएसएस निरंतर समाज के पिछड़े वर्गों की ओर देखता रहा है और विविध प्रकल्पों के जरिए उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास कर रहा है। यह सच है कि संत रविदास एक ऐसे संत थे जिन्होंने जीवन भर श्रम की साधना की। श्रम को प्रतिष्ठा करने वाले इस महान संत के शिष्यों में काशी नरेश व भक्त मीराबाई भी रहीं। अपने धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा एवं विश्वास के कारण संत रविदास जी ने दिल्ली के शासक सिकंदर लोधी को भी कह दिया था कि मैं प्राण त्याग दूंगा पर अपना धर्म नहीं छोडूंगा। हमारे अनेक संतों की तरह संत रविदास जी ने भी जन्म के आधार पर ऊंच-नीच को नकार दिया था। भोपाल में श्रम साधक समागम उन्हीं संत रविदास जी की जयंती पर आयोजित किया गया था।

     उम्मीद की जानी चाहिए कि संत रविदास की दृष्टि समाज के अंतिम छोर तक पहुंचेगी और जाति, पंथ के आधार पर भेदभाव को मिटाने में कारगर हो सकेगी। यह साधारण नहीं है कि मध्यप्रदेश आरंभ से ही संघ की एक प्रयोगशाला रहा है, जहां उसने सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक क्षेत्रों में विविध प्रयोग किए हैं। बैतूल एक ऐसा जिला है, जहां पर सैकड़ों गांवों को केंद्र बनाकर ग्रामीण विकास का एक नया अध्याय लिखने की पहल हुयी है। संघ के सरसंचालक मोहन भागवत ने ग्रामीण विकास के इन प्रकल्पों को सराहा था। इसके तहत बैतूल जिले में नशामुक्ति, आर्थिक-सामाजिक विकास, पर्यावरण जैसे विषयों पर हो रहे ये काम निश्चय ही बदलते भारत की बानगी पेश करते हैं।

   मध्यप्रदेश एवं देश के तमाम राज्यों में सरकारी स्तर पर भी कई योजनाएं श्रमिक और निचले तबके के  उत्थान के लिए बनती रही हैं। उन योजनाओं से इन वर्गों में कोई आमूलचूल बदलाव हुआ हो ऐसा कम ही दिखाई देता है। आजादी के सत्तर वर्षों में यदि सरकारी योजनाएं आम आदमी तक पहुंच पाती तो संत रविदास,राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, बाबा साहेब आंबेडकर और पं. दीनदयाल उपाध्याय के सपने सच हो जाते। किंतु अफसोस है कि बदलाव की यह गति उतनी तेज नहीं रही जितनी होनी चाहिए। सरकारें आज भी उन्हीं के लिए योजना बना रही हैं और हर बजट में अधिक वित्त का प्रावधान करती हैं किंतु धरातल पर सूरतेहाल नहीं बदलते। यही कारण है कि सामाजिक विषमता अमरबेल की तरह पनप रही है। इस वर्ग के जो व्यक्ति समाज का नेतृत्व करते हैं, वह भी आगे आ जाने पर पीछे मुड़कर नहीं देखते हैं। बाद में अपने लोग ही उन्हें बेगाने लगने लगते हैं। सरकारी स्तर पर इस सामाजिक विषमता को पाटना नामुमकिन लगता है। इसमें समाज और सामाजिक संगठनों की सहभागिता जरूरी है। इसी ध्येय को आत्मसात कर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सामाजिक विषमता को दूर करने का बीड़ा उठाया है और सेवा प्रकल्पों में श्रम साधकों के माध्यम से सामाजिक साधना का काम निरंतर किया जा रहा है। भोपाल के इस महती आयोजन में शामिल होने वाले लोग दरअसल वे हैं जो दैनिक रोजी-रोजी कमाने के लिए रोज अपना पसीना बहाते हैं। इन वर्गों से संवाद और उनकी एकजुटता के बहाने संघ एक बड़ी सामाजिक पहल कर रहा है, इसमें दो राय नहीं है।

जातिभेद से मुक्ति जरूरी-

   सामाजिक समरसता के बिना कोई भी राष्ट्र अग्रणी नहीं बन सकता। गुरु घासीदास कहते हैं- मनखे-मनखे एक हैं। किंतु जातिवाद ने इस भेद को गहरा किया है। तमाम प्रयासों के बाद भी आज भी हम इस रोग से मुक्त नहीं हो सके हैं। भेदभाव ने हमारे समाज को विभाजित कर रखा है, जिसके चलते दुनिया में हमारी छवि ऐसी बनाई जाती है कि हम अपने ही लोगों से मानवीय व्यवहार नहीं करते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहते थे- अस्पृश्यता ईश्वर और मानवता के प्रति अपराध है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे पू. बालासाहब देवरस ने इस संकट को रेखांकित करते हुए बसंत व्याख्यानमाला में कहा था कि- अगर छूआछूत गलत नहीं है दुनिया में कुछ भी गलत नहीं है, इसे मूल से नष्ट कर देना चाहिए। ऐसे में हमें यह समझना होगा कि जो कुछ भी सैकड़ों सालों से परंपरा के नाम पर चल रहा है वह हमारा धर्म नहीं है। इतिहास में हुए इन पृष्ठों का कोई भी सभ्य समाज समर्थन नहीं कर सकता। जबकि हमारे धर्म ग्रंथ और शास्त्र इससे अलग हैं। हमारे ऋषि और ग्रंथों के रचयिता सभी वर्गों से हैं। भगवान बाल्मीकि और वेद व्यास इसी परंपरा से आते हैं। यानि यह भेद शास्त्र आधारित नहीं है। यह विकृति है। इससे मुक्ति जरूरी है।हमें इसके सचेतन प्रयास करते हुए अपने आचरण, व्यवहार और वाणी से समरसता का अग्रदूत बनना होगा। सभी समाजों और वर्गों से संवाद और सहकार बनाकर हम एक आदर्श समाज की रचना में सहयोगी हो सकते हैं। इससे समाज का सशक्तिकरण भी होगा। समानता का व्यवहार, वाणी संयम, परस्पर सहयोग, संवेदनशीलता से हम दूरियों को घटा सकते हैं और भ्रम के जाले साफ कर सकते हैं। साथ ही अपने गांव, नगर के मंदिर, जलश्रोत, श्मशान सबके लिए समान रूप से खुल होने ही चाहिए। इसमें कोई भी भेद नहीं होना चाहिए।

वैचारिक आंदोलन से बदलेगा समाज-

     राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन है। उसने दिखाया है कि संगठन, विचार और समर्पण के बल पर समाज को बदला जा सकता है, और राष्ट्र का नव निर्माण संभव है। संघ की यात्रा सेवा से समरसता तक, अनुशासन से राष्ट्रधर्म तक और शाखा से संसद तक हर पड़ाव पर भारत की आत्मा को जागृत करती है। वह भारत को केवल एक राजनीतिक राष्ट्र नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक चेतना के रूप में स्थापित करना चाहता है। संघ के कार्य को कोई चाहे जितना विरोध करे, किंतु उसकी राष्ट्रनिष्ठा, सेवा भावना और समर्पण को नकारा नहीं जा सकता। यही कारण है कि विरोधी भी व्यक्तिगत रूप से संघ के कार्यों की प्रशंसा करते हैं, और कहीं-न-कहीं उससे प्रेरित भी होते हैं। संघ की शताब्दी यात्रा भारत की उस यात्रा का प्रतीक है, जो हजारों वर्षों की सभ्यता, संस्कृति और साधना का प्रतिफल है। यह यात्रा निरंतर चल रही है-भारत के निर्माण, उत्थान और पुनः विश्वगुरु बनने की दिशा में। इसमें सामाजिक समरसता और सेवा का मंत्र सबसे प्रमुख है। संघ के स्वयंसेवक शताब्दी वर्ष में एक समरस, सशक्त समाज के सृजन को स्थायित्व देने में जुटे हैं ताकि भारतविरोधी शक्तियां हमें बांटकर अपने कुचक्रों में सफल न हो सकें। एक समरस समाज सभी संकटों का हल है यही समझकर हमें निरंतर आगे बढ़ना है। संघ के सामाजिक सेवा प्रकल्पों को अपेक्षित सहयोग और समय देना भी जरूरी है। समाज की सामूहिक शक्ति से जल्दी और ज्यादा बेहतर परिणाम पाए जा सकते हैं, इसमें दो राय नहीं है।

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

नए साल में क्या हों भारत के सपने?

 

डिग्रीधारी बेरोजगार हैं देश की सबसे बड़ी चुनौती

-प्रो.संजय द्विवेदी



 किसी राष्ट्र जीवन के प्रवाह में साल का बदलना कैलेंडर बदलने से ज्यादा कुछ नहीं होता। किंतु नए साल पर हम व्यक्ति और समाज के तौर कुछ संकल्प लेते ही हैं। नया साल हमें विहंगावलोकन का अवसर देता है और आगे क्या करना है इसका मार्ग भी दिखाता है। 2026 ऐसा ही एक साल है, जिसने हमें यह अवसर दिया है कि हम अपनी चुनौतियों को पहचानें और सपनों में रंग भरने के लिए आगे आएं। युवा देश होने के नाते अगर यह अवसरों का जनतंत्र है तो आकांक्षाओं का समुद्र भी लहलहा रहा है। लोग आगे बढ़ना चाहते हैं और अच्छी जिंदगी जीना चाहते हैं। यह संकट किसी भी समाज के संकट हो सकते हैं किंतु भारत को इससे जूझकर ही आगे बढ़ने का मार्ग मिलेगा।

रोजगार सृजन की गुणवत्ता-  भारत की युवा आबादी के सपने बहुत बड़े हैं। वे अच्छा रोजगार चाहते हैं।अस्थायी कम वेतन वाली नौकरियां समाज में असंतोष का ही कारण बनती हैं। गिग इकोनामी, कान्ट्रैक्ट वर्क और आटोमेशन के दौर में युवाओं का संकट गहरा किया है। देश में शिक्षा केंद्र बढ़ें हैं किंतु मुद्दा यह है कि क्या युवाओं को वहां शिक्षा मिल रही है। वे कौशल से युक्त हो रहे हैं या सिर्फ डिग्री उनके लिए बोझ बन रही है। उद्योगों के लिए तैयार युवा कहां हैं। शिक्षा प्रणाली यह विवशता अभी खत्म होती नहीं दिखती। पाठ्यक्रम, प्रशिक्षण और उद्योग के बीच लंबी प्रतीक्षा आज भी बनी हुई है। ऐसे में डिग्रीधारी बेरोजगार इस देश की सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं। बने रहेंगें।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता से उपजे संकट-

एआई, मशीन लर्निंग और आटोमेशन हमारे जैसे बहुत बड़ी आबादी वाले समाज के लिए संकट भी है और अवसर भी।  तकनीक से बढ़ती उत्पादकता और सक्षम मशीनें अंततः मनुष्य को हाशिए पर लगा रही हैं। बहुत सारा वर्कफोर्स बेमानी होने के आसार हैं। पारंपरिक कामों और नौकरियों पर खतरे के गहरे बादल हैं। कई जगह ये प्रारंभ भी हो गया है। इस साल हमें यह तय करना होगा कि हम सारा कुछ बाजार की शक्तियों के हवाले कर देंगे या अपेक्षित संवेदना के साथ मानवीय आवश्यक्ता के साथ संतुलन बनाएंगें।

कृषि संकट और ग्रामीण भारत-

 पिछले अनेक सालों में नगर केंद्रित विकास के प्रयोगों ने हमारे शहरों को नरक और गांवों को खाली कर दिया। गांधी का ग्राम स्वराज्य का स्वप्न हाशिए पर लगा दिया गया। भारत माता ग्रामवासिनी सिर्फ गीतों का स्वर रह गया। उजड़ते गांवों ने ऐसी कथा लिखी है जिससे कहकर- सुनकर दर्द बढ़ता ही है। बावजूद इसके हमारी आधी से अधिक आबादी की निर्भरता आज भी खेती पर है। जलवायु परिर्वतन, बढ़ती लागत, न्यूनतम समर्थन मूल्य की अनिश्चितता और बाजार की अस्थिरता ने किसानों को गहरे संकट में डाल रखा है। खेती की उपज के मूल्य का अंतर किसान और बाजार के बीच कितना है,यह देखना जरूरी है। कृषि सुधार के अनेक प्रयासों के बाद भी खेती लाभ का व्यवसाय नहीं बन पा रही है। ऐसे में नई पीढ़ी खेती करने से दूर जा रही है और किसानों की जेब और आत्मसम्मान दोनों संकट में हैं।

   इसके साथ ही जल संकट और पर्यावरण का सवाल हमारी बड़ी चुनौती है। महानगरों की फिजाओं में घुलता जहर हमने देखा है। इससे हमारी राष्ट्रीय राजधानी भी मुक्त नहीं है।कई राज्य गंभीर भूजल संकट से जूझ रहे हैं। अनियमित मानसून, प्रदूषण और अंधाधुंध शहरीकरण ने पर्यावरण संतुलन को चौपट कर दिया है। जल,जंगल और जमीन के सवाल हमें देर तक और दूर तक परेशान करते रहेंगें। इसके चलते समाज में गहरा असंतोष पैदा हो  रहा है। नए साल में इन सवालों को संबोधित करने की जरूरत है।

स्वास्थ्य व्यवस्था का संकट-

कोविड संकट ने हमें आईना दिखाया था कि हमारी स्वास्थ्य सुविधाओं का हाल क्या है। उससे उबर कर हमने बहुत कुछ सीखा और खुद को कई मामलों में आत्मनिर्भर बनाया। स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर शहर और गांव का खांई और भी गहरी होती जा रही है। आयुष्मान योजना जैसे प्रकल्प भी लगता है कि निजी क्षेत्र की लूट का कारण बन गए हैं। आयुष्मान और बीमा धारकों की हैसियत को देखकर इलाज करने वाले अस्पताल भी खड़े हो गए हैं। रोग के बजाए मरीज तलाशे जा रहे हैं। स्वास्थ्य सुविधा देने वाले कुछ लोग कई मायने में अमानवीयता की हदें पार कर रहे हैं। निजी सेवाएं महंगी होते जाने से सरकारी तंत्र पर दबाव बहुत बढ़ गया है। सरकारी अस्पतालों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है किंतु सर्वाधिक मरीज उन्हीं के पास हैं। ऐसे में भारत का मध्यवर्ग गहरे संकट का शिकार है। उसकी सुनने वाला कोई नहीं है। महंगाई, शिक्षा-स्वास्थ्य खर्च, ईएमआई, अस्थाई नौकरियां, करों का बोझ मध्यवर्ग के लिए चुनौती है। इससे सामाजिक अस्थिरता और उपभोक्ता अर्थव्यवस्था का संकट संभव है।

राज्यों की वित्तीय चुनौतियां-

लोकलुभावन वायदों को पूरा करने में राज्यों ने अपनी आर्थिक स्थिति चौपट कर ली है। संघीय ढांचा संतुलन और सहयोग की धुरी पर टिका हुआ है किंतु हालात संकटपूर्ण हैं।राज्यों के खस्ताहाल आर्थिक तंत्र, कर वितरण और योजनाओं  के क्रियान्यवन से जुड़े संकटों को नए साल में हल करने की जरूरत है। इसके साथ ही भारत की जटिल भौगोलिक संरचना में वह हर तरफ विरोधी विचार के देशों से घिरा है। पाकिस्तान और चीन के बाद अब बांग्लादेश की शांत सीमा से भी संकट बढ़ रहा है। ऐसे में सुरक्षा चुनौतियां बहुत गंभीर हैं। ऐसे में गहरे रणनीतिक संतुलन, कूटनीति और धैर्य की जरूरत दिखती है। नए  साल में हमें इन संकटों से दो-चार होना पड़ेगा।

सूचना का शोर और भरोसे का संकट-

मीडिया को चौथा स्तंभ कहकर लोक ने समादृत किया है। किंतु वह गहरे सूचना शोर से जूझ रहा है जहां भरोसे का संकट गहरा हुआ है। फेक न्यूज, प्रौपेगेंडा, एल्गोरिदमिक एजेंडा और टीआरपी संस्कृति ने समूची मीडिया की नैतिकता और समझदारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।2026 का साल मीडिया के लिए खुद के आत्ममूल्यांकन और आत्मपरिष्कार का साल भी है। इसके साथ ही सोशल मीडिया ने नए संकट खड़े किए हैं। मुख्यधारा का मीडिया भी इससे आक्रांत है। सोशल मीडिया संवाद के बजाए विवाद का मंच बना हुआ है। सामाजिक समरसता और सद्भाव से परे हटकर दी जा रही सूचना और कथाएं हमारे लिए विचार का विषय हैं। इससे हमारी स्वाभाविक सद्भावना खतरे में हैं।

   इन संकटों के बीच भी हम तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं। हमें अपने संकटों के हल खुद खोजने होंगें। नया साल वह अवसर है कि हम आत्ममूल्यांकन कर सही दिशा में सामूहिक प्रयत्नों का सिलसिला आगे बढ़ाएं। 2026 हमारे लिए सिर्फ आर्थिक वृद्धि का साल नहीं बल्कि हमारे राष्ट्रीय विवेक, सामाजिक संतुलन और संवेदनशीलता की परीक्षा भी है। अनेक गंभीर चुनौतियों के बाद भी हम नीति,नीयत और ताकतवर नेतृत्व से अपने संकटों का हल कर सकते हैं। आइए अपने भागीरथ हम स्वयं बनें और विकास के साथ करुणा को साधकर एक बार पुनः भारतबोध की यात्रा पर प्रयाण करें।



 

मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स; बाबू जी! धीरे चलना,संभलना जरा

 


   इन दिनों सोशल मीडिया सिर्फ मनोरंजन या समय बिताने का साधन नहीं रह गया है। सही मायनों में यह शक्तिशाली डिजिटल आंदोलन है, जिसने आम लोगों को अभिव्यक्ति का मंच दिया है। छोटे गाँवों और कस्बों के युवा भी वैश्विक दर्शकों तक पहुँच रहे हैं। एक साधारण-सा मोबाइल फोन अब दुनिया से संवाद का प्रभावशाली माध्यम है। इस परिप्रेक्ष्य में सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स केवल तकनीकी क्रिएटर नहीं हैं, बल्कि वे डिजिटल युग के नेता, कथाकार और समाज के प्रेरक बन गए हैं। उनकी एक पोस्ट सोच बदल सकती है, एक वीडियो नया रुझान बना सकता है और एक अभियान समाज के भीतर सकारात्मक परिवर्तन की प्रक्रिया को प्रारंभ कर सकता है। यह दुधारी तलवार है, अचानक हम प्रसिद्धि के शिखर पर होते हैं और एक दिन हमारी एक लापरवाही हमें जमीन पर गिरा देती है। हमारा सब कुछ नष्ट हो जाता है। इसलिए इस राह के खतरे भी क्रिएटर्स से समझने होंगे।

    सोशल मीडिया की बढ़ी शक्ति के कारण आज हर व्यक्ति यहां दिखना चाहता है। बावजूद इसके हर शक्ति के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी जुड़ जाती है। करोड़ों लोगों तक पहुँचने वाला प्रत्येक शब्द, प्रत्येक विचार और प्रत्येक दृश्य अपने आप में एक संदेश है। इसलिए यह आवश्यक है कि ट्रोलिंग, फेक न्यूज़ और नकारात्मकता के शोर के बीच सच, संवेदनशीलता और सकारात्मकता की आवाज़ बुलंद हो। कंटेंट का लक्ष्य केवल वायरल होना नहीं, बल्कि मूल्यवान होना भी है। लोकप्रियता से अधिक जरूरी यह है कि सामग्री समाज को बेहतर बनाए, नागरिक विवेक को विकसित करे और संवाद की संस्कृति को मजबूत करे।

    पारंपरिक मीडिया की बंधी-बंधाई और एकरस शैली से अलग हटकर जब भारतीय नागरिक इस पर विचरण करने लगे तो लगा कि रचनात्मकता और सृजनात्मकता का यहां विस्फोट हो रहा है। दृश्य, विचार, कमेंट्स और निजी सृजनात्मकता के अनुभव जब यहां तैरने शुरू हुए तो लोकतंत्र के पहरुओं और सरकारों का भी इसका अहसास हुआ। आज वे सब भी अपनी सामाजिकता के विस्तार के लिए सोशल मीडिया पर आ चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं भी कहा कि सोशल मीडिया नहीं होता तो हिंदुस्तान की क्रियेटिविटी का पता ही नहीं चलता।” सोशल मीडिया अपने स्वभाव में ही बेहद लोकतांत्रिक है। जाति, धर्म, भाषा, लिंग और रंग की सीमाएं तोड़कर इसने न सिर्फ पारंपरिक मीडिया को चुनौती दी है वरन् यह सही मायने में आम आदमी का माध्यम बन गया है। इसने संवाद को निंरतर, समय से पार और लगातार बना दिया है। इसने न सिर्फ आपकी निजता को स्थापित किया है, वरन एकांत को भी भर दिया है।

   यह देखना सुखद है कि युवा क्रिएटर्स महानगरों से आगे निकलकर आंचलिक भाषाओं, ग्रामीण कथाओं और लोक संस्कृति को विश्व के सामने ला रहे हैं। यह भारत की जीवंत आत्मा है, जो अब डिजिटल माध्यमों के द्वारा वैश्विक स्तर पर स्वयं को व्यक्त कर रही है। डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और वोकल फॉर लोकल जैसी योजनाओं की सफलता काफी हद तक इसी पर निर्भर करती है कि सोशल मीडिया की यह नई पीढ़ी इन्हें किस सहजता और स्पष्टता के साथ आम जनता तक पहुँचाती है। सोशल मीडिया अब शिक्षा, उद्यमिता, जागरूकता और सशक्तिकरण का महत्वपूर्ण माध्यम बन गया है। ब्रांड्स आपकी प्रतिभा का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन समय की मांग यह है कि आप स्वयं भी एक जिम्मेदार और विश्वसनीय ब्रांड के रूप में विकसित हों। सरकार और समाज के बीच भी सोशल मीडिया सेतु का काम रहा है क्योंकि संवाद यहां निरंतर है और एकतरफा भी नहीं है। सरकार के सभी अंग इसीलिए अब सोशल प्लेटफार्म पर हैं और अपने तमाम कामों में क्रिएटर्स की मदद भी ले रहे हैं।

    सोशल मीडिया एक साधन है, परंतु गलत दिशा में प्रवाहित होने पर यह एक खतरनाक हथियार भी बन सकता है। यह मनोरंजन का माध्यम है, पर समाज-निर्माण का आयाम भी इसके भीतर निहित है। यह दोहरा स्वरूप अवसर भी प्रदान करता है और चुनौती भी। सोशल मीडिया उचित दृष्टिकोण के साथ उपयोग हो तो वह ग्लोबल वॉयस फॉर लोकल इशूज़बन सकता है। कंटेंट क्रिएटर्स की शक्ति यदि ज्ञान और जिम्मेदारी से न जुड़ी हो, तो वह समाज के लिए खतरनाक हो सकती है। सामाजिक सोच के साथ किए गए प्रयासों से सोशल मीडिया केवल एक पेशा नहीं, बल्कि एक सामाजिक मिशन का माध्यम भी हो सकता है। हमें सोचना होगा कि आखिर हमारे कंटेंट का उद्देश्य क्या है। क्या सिर्फ आनंद और लाइक्स के लिए हम समझौते करते रहेंगें।

  सोशल मीडिया की चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। फेक न्यूज़, तथ्यहीन दावे और सनसनीखेज प्रस्तुति विश्वसनीयता के संकट को जन्म दे रहे हैं। एल्गोरिद्म की मजबूरी क्रिएटर्स को रचनात्मकता से दूर ले जाकर केवल ट्रेंड के पीछे भागने के लिए विवश कर रही है। लाइक्स, फॉलोअर्स और व्यूज़ की अनवरत दौड़ मानसिक तनाव और आत्मसम्मान के संकट को बढ़ा रही है। ध्रुवीकरण और ट्रोल संस्कृति समाज के ताने-बाने को कमजोर कर रही है। इन परिस्थितियों में क्रिएटर्स के सामने तीन मार्ग हैं, ट्रेंड का अनुकरण करने वाला कंटेंट क्रिएटर, नए ट्रेंड स्थापित करने वाला कंटेंट लीडर या समाज को दिशा देने वाला कंटेंट रिफॉर्मर।

    जिम्मेदार क्रिएटर की पहचान सत्य, संवेदना और सामाजिक हित से होती है। विश्वसनीय जानकारी देना, सकारात्मक संवाद स्थापित करना, आंचलिक भाषाओं और स्थानीय मुद्दों को महत्व देना, जनता की समस्याओं को स्वर देना और स्वस्थ हास्य तथा मानवीय संवेदनाओं को बनाए रखना आज की डिजिटल नैतिकता के प्रमुख तत्व हैं। वर्तमान समय में सोशल मीडिया पर दो तरह के लोग सक्रिय दिखाई देते हैं, एक वे जो समाज को बाँटते हैं और दूसरे वे जो समाज को जोड़ते हैं। विश्वास है कि नई पीढ़ी जोड़ने वालों की भूमिका निभाएगी। आपके पास केवल कैमरा या रिंग लाइट नहीं है; आपके पास समाज को रोशन करने की रोशनी है। आप वह पीढ़ी हैं जो बिना न्यूज़रूम के पत्रकार, बिना स्टूडियो के कलाकार और बिना मंच के विचारक हैं। जाहिर है तोड़ने वाले बहुत हैं अब कुछ ऐसे लोग चाहिए जो देश और दिलों को जोड़ने का काम करें।

   आपमें परिवर्तन की शक्ति है। यदि आप सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ अपनी भूमिका निभाएँ, तो डिजिटल परिदृश्य को अधिक संवेदनशील, अधिक सकारात्मक और अधिक प्रेरणादायक बना सकते हैं। महाभारत का संदेश यहाँ स्मरणीय है, युधिष्ठिर सत्यवादी थे, पर कृष्ण सत्यनिष्ठ थे। सत्य कहना ही पर्याप्त नहीं है; सत्य के प्रति निष्ठा और समाज के हित में समर्पण ही असली धर्म है। सोशल मीडिया की दुनिया में यही दृष्टि हमें प्रभावशाली और विश्वसनीय बनाएगी।

क्या आत्मदैन्य से मुक्त हो रहा है नया भारत?

 

जीवन मूल्यों के आधार पर करें नई चुनौतियों का मुकाबला



  देश में परिवर्तन की एक लहर चली है। सही मायनों में भारत जाग रहा है और नए रास्तों की तरफ देख रहा है। यह लहर परिर्वतन के साथ संसाधनों के विकास की भी लहर है। जो नई सोच पैदा हो रही है वह आर्थिक संपन्नता, कमजोरों की आय बढ़ाने, गरीबी हटाओ और अंत्योदय जैसे नारों से आगे संपूर्ण मानवता को सुखी करने का विचार करने लगी है। भारत एक नेतृत्वकारी भूमिका के लिए आतुर है और उसका लक्ष्य विश्व मानवता को सुखी करना है।

   नए चमकीले अर्थशास्त्र और भूमंडलीकरण ने विकार ग्रस्त व्यवस्थाएं रची हैं। जिसमें मनुष्य और मनुष्य के बीच गहरी खाई बनी है और निरंतर बढ़ती जा रही है। अमीर ज्यादा अमीर और गरीब ज्यादा गरीब हो रहा है। शिक्षा,स्वास्थ्य और सूचना और सभी संसाधनों पर ताकतवरों या समर्थ लोगों का कब्जा है। पूरी दुनिया के साथ तालमेल बढ़ाने और खुले बाजारीकरण से भारत की स्थिति और कमजोर हुयी है। उत्पादन के बजाए आउटसोर्सिंग बढ़ रही है। इससे अमरीका पूरी दुनिया का आदर्श बन गया है। मनुष्यता विकार ग्रस्त हो रही है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा से भोग और अपराधीकरण का विचार प्रमुखता पा रहा है। कानून सुविधा के मुताबिक व्याख्यायित किए जा रहे हैं। साधनों की बहुलता के बीच भी दुख बढ़ रहा है, असंतोष बढ़ रहा है।

      ऐसे समय में भारत के पास इन संकटों के निपटने के बौद्धिक संसाधन मौजूद हैं। भारत के पास विचारों की कमी नहीं है किंतु हमारे पास ठहरकर देखने का वक्त नहीं है। आधुनिक समय में भी महर्षि अरविंद, स्वामी विवेकानंद, जे.कृष्णमूर्ति, महात्मा गांधी, पं.दीनदयाल उपाध्याय, डा. राममनोहर लोहिया, नानाजी देशमुख, दत्तोपंत ठेंगड़ी जैसे नायक हमारे पास हैं, जिन्होंने भारत की आत्मा को स्पर्श किया था और हमें रास्ता दिखाया था। ये नायक हमें हमारे आतंरिक परिर्वतन की राह सुझा सकते हैं। मनुष्य की पूर्णता दरअसल इसी आंतरिक परिर्वतन में है। मनुष्य का भीतरी परिवर्तन ही बाह्य संसाधनों की शुद्धि में सहायक बन सकता है। हमें तेजी के साथ भोगवादी मार्गों को छोड़कर योगवादी प्रयत्नों को बढ़ाना होगा। संघर्ष के बजाए समन्वय के सूत्र तलाशने होगें। स्पर्धा के बजाए सहयोग की राह देखनी होगी। शक्ति के बजाए करूणा, दया और कृपा जैसे भावों के निकट जाना होगा। दरअसल यही असली भारत बनाने का महामार्ग है। एक ऐसा भारत जो खुद को जान पाएगा। सदियों बाद खुद का साक्षात्कार करता हुआ भारत। अपने बोध को अपने ही अर्थों में समझता हुआ भारत। आत्मसाक्षात्कार और आत्मानुभूति करता हुआ भारत। आत्मदैन्य से मुक्त भारत। आत्मविश्वास से भरा भारत।

    आज के भारत का संकट यह है कि उसे अपने पुरा वैभव पर गर्व तो है पर वह उसे जानता नहीं हैं। इसलिए भारत की नई पीढ़ी को इस आत्मदैन्य से मुक्त करने की जरूरत है। यह आत्म दैन्य है, जिसने हमें पददलित और आत्मगौरव से हीन बना दिया है। सदियों से गुलामी के दौर में भारत के मन को तोड़ने की कोशिशें हुयी हैं। उसे उसके इतिहासबोध, गौरवबोध को भुलाने और विदेशी विचारों में मुक्ति तलाशने की कोशिशें परवान चढ़ी हैं। आजादी के बाद भी हमारे बौद्धिक कहे जाने वाले संस्थान और लोग अपनी प्रेरणाएं कहीं और से लेते रहे और भारत के सत्व और तत्व को नकारते रहे। इस गौरवबोध को मिटाने की सचेतन कोशिशें आज भी जारी हैं।

      विदेशी विचारों और विदेशी प्रेरणाओं व विदेशी मदद पर पलने वाले बौद्धिकों ने यह साबित करने की कोशिशें कीं कि हमारी सारी भारतीयता पिछडेपन, पोंगापंथ और दकियानूसी विचारों पर केंद्रित है। हर समाज का कुछ उजला पक्ष होता है तो कुछ अंधेरा पक्ष होता है। लेकिन हमारा अंधेरा ही उन्हें दिखता रहा और उसी का विज्ञापन ये लोग करते रहे। किसी भी देश की सांस्कृतिक धारा में सारा कुछ बुरा कैसे हो सकता है। किंतु भारत, भारतीयता और राष्ट्रवाद के नाम से ही उन्हें मिर्च लगती है। भारतीयता को एक विचार मानने, भारत को एक राष्ट्र मानने में भी उन्हें हिचक है। खंड-खंड विचार उनकी रोजी-रोटी है, इसलिए वे संपूर्णता की बात से परहेज करते हैं। वे भारत को जोड़ने वाले विचारों के बजाए उसे खंडित करने की बात करते हैं। यह संकट हमारा सबसे बड़ा संकट है। आपसी फूट और राष्ट्रीय सवालों पर भी एकजुट न होना, हमारे सब संकटों का कारण है। हमें साथ रहना है तो सहअस्तित्व के विचारों को मानना होगा। हम खंड-खंड विचार नहीं कर सकते। हम तो समूची मनुष्यता के मंगल का विचार करने वाले लोग हैं, इसलिए हमारी शक्ति यही है कि हम लोकमंगल के लिए काम करें। हमारा साहित्य, हमारा जीवन, हमारी प्रकृति, हमारी संस्कृति सब कुछ लोकमंगल में ही मुक्ति देखती है। यह लोकमंगल का विचार साधारण विचार नहीं है। यह मनुष्यता का चरम है। यहां मनुष्यता सम्मानित होती हुयी दिखती है। यहां वह सिर्फ शरीर का नहीं, मन का भी विचार करती है और भावी जीवन का भी विचार करती है। यहां मनुष्य की मुक्ति प्रमुख है।

    नया भारत बनाने की बात दरअसल पुराने मूल्यों के आधार पर नयी चुनौतियों से निपटने की बात है। नया भारत सपनों को सच करने और सपनों में नए रंग भरने के लिए दौड़ लगा रहा है। यह दौड़ सरकार केंद्रित नहीं, मानवीय मूल्यों के विकास पर केंद्रित है। इसे ही भारत का जागरण और पुर्नअविष्कार कहा जा रहा है। कई बार हम राष्ट्रीय पुर्ननिर्माण की बात इसलिए करते हैं, क्योंकि हमें कोई नया राष्ट्र नहीं बनाना है। हमें अपने उसी राष्ट्र को जागृत करना है, उसका पुर्ननिर्माण करना है, जिसे हम भूल गए हैं। यह अकेली राजनीति से नहीं होगा। यह तब होगा जब समाज पूरी तरह जागृत होकर नए विमर्शों को स्पर्श करेगा। अपनी पहचानों को जानेगा, अपने सत्व और तत्व को जानेगा। उसे भारत और उसकी शक्ति को जानना होगा। लोक के साथ अपने रिश्ते को समझना होगा। तब सिर्फ चमकीली प्रगति नहीं, बल्कि मनुष्यता के मूल्य, नैतिक मूल्य और आध्यात्मिक मूल्यों की चमक उसे शक्ति दे रही होगी। यही भारत हमारे सपनों का भी है और अपनों का भी। इस भारत को हमने खो दिया, और बदले में पाएं हैं दुख, असंतोष और भोग के लिए लालसाएं। जबकि पुराना भारत हमें संयम के साथ उपभोग की शिक्षा देता है। यह भारत परदुखकातरता में भरोसा रखता है। दूसरों के दुख में खड़ा होता है। उसके आंसू पोंछता है। वह परपीड़ा में आनंद लेने वाला समाज नहीं है। वह द्रवित होता है। वात्सल्य से भरा है। उसके लिए पूरी वसुधा पर रहने वाले मनुष्य मात्र ही नहीं प्राणि मात्र परिवार का हिस्सा हैं। इसलिए इस लोक की शक्ति को समझने की जरूरत है। भारत इसे समझ रहा है। वह जाग रहा है। एक नए विहान की तरफ देख रहा है। वह यात्रा प्रारंभ कर चुका है। क्या हम और आप इस यात्रा में सहयात्री बनेगें यह एक बड़ा सवाल है।

कंटेट वायरल ही नहीं मूल्यवान भी हो- प्रोफेसर संजय द्विवेदी

 'वेब मीडिया समागम-2025' में देश भर से जुटे डिजिटल दिग्गज


भागलपुर (बिहार)। भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के पूर्व महानिदेशक प्रो.संजय द्विवेदी का कहना है डिजिटल मीडिया के व्यापक प्रभाव के कारण बड़ी जिम्मेदारी भी जुड़ जाती है। इसलिए जरुरी है कि हम सिर्फ कंटेंट क्रिएटर नहीं, उससे आगे कंटेंट लीडर और कंटेंट रिर्फामर बनें। करोड़ों लोगों तक पहुँचने वाला प्रत्येक शब्द, प्रत्येक विचार और प्रत्येक दृश्य अपने आप में एक संदेश है। इसलिए यह सिर्फ वायरल नहीं बल्कि मूल्यवान भी होना चाहिए। वे वेब जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा भागलपुर में आयोजित 'वेब मीडिया समागम-2025' को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री अश्विनी कुमार चौबे, वरिष्ठ पत्रकार डॉ.बृजेश कुमार सिंह,संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री आनंद कौशल, राष्ट्रीय महासचिव डा. अमित रंजन विशेष रूप से सहभागी रहे। समागम में देश भर के डिजिटल मीडिया दिग्गजों ने कई सत्रों में विमर्श किया और संगठन विस्तार पर भी चर्चा की।

    प्रो. द्विवेदी ने कहा कि लोकप्रियता से अधिक जरूरी यह है कि सामग्री समाज को बेहतर बनाए, नागरिक विवेक को विकसित करे और संवाद की संस्कृति को मजबूत करे। फेक न्यूज़, तथ्यहीन दावे और सनसनीखेज प्रस्तुति विश्वसनीयता के संकट को जन्म दे रहे हैं। एल्गोरिद्म की मजबूरी क्रिएटर्स को रचनात्मकता से दूर ले जाकर केवल ट्रेंड के पीछे भागने के लिए विवश कर रही है। उन्होंने कहा कि लाइक्स, फॉलोअर्स और व्यूज़ की अनवरत दौड़ मानसिक तनाव और आत्मसम्मान के संकट को बढ़ा रही है। ध्रुवीकरण और ट्रोल संस्कृति समाज के ताने-बाने को कमजोर कर रही है। प्रोफेसर द्विवेदी ने कहा कि जिम्मेदार क्रिएटर की पहचान सत्य, संवेदना और सामाजिक हित से होती है। विश्वसनीय जानकारी देना, सकारात्मक संवाद स्थापित करना, आंचलिक भाषाओं और स्थानीय मुद्दों को महत्व देना, जनता की समस्याओं को स्वर देना और स्वस्थ हास्य तथा मानवीय संवेदनाओं को बनाए रखना आज की डिजिटल नैतिकता के प्रमुख तत्व हैं। 

     उन्होंने वेब पत्रकारों का आह्वान करते हुए कहा कि आपके पास केवल कैमरा या रिंग लाइट नहीं है; आपके पास समाज को रोशन करने की रोशनी है। आप वह पीढ़ी हैं जो बिना न्यूज़रूम के पत्रकार, बिना स्टूडियो के कलाकार और बिना मंच के विचारक हैं। जाहिर है तोड़ने वाले बहुत हैं अब कुछ ऐसे लोग चाहिए जो देश और दिलों को जोड़ने का काम करें।

जड़ों से जुड़ी रहे पत्रकारिता : अश्विनी चौबे 

   पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने अपने संबोधन में कहा कि हर युग में पत्रकारों ने अपनी लेखनी से क्रांति लाई है। अब तकनीक से चलने वाली मीडिया का समय है। बावजूद इसके अपनी जड़ों से जुड़े रहकर हम बेहतर पत्रकारिता कर सकते हैं। भाजपा नेता प्रीति शेखर ने कहा कि जिस तरह से संचार क्रांति आई है उससे युवाओं के बेहतर अवसर मिले हैं। स्थानीय भाषाओं में सामग्री पहुंचाने के द्वार खुले हैं।

सूचनाओं को दबाना असंभव:डा.बृजेश कुमार सिंह 

  वरिष्ठ पत्रकार डा. बृजेश कुमार सिंह ने कहा कि पिछले 15 वर्षों के अंदर बहुत बड़ा बदलाव आया है। इसकी वजह इंटरनेट का डाटा सस्ता होना और हर व्यक्ति तक पहुंच बढ़ना है। अब सूचना को दबाए रखने की व्यवस्था खत्म हो चुकी है और इसका लोकतंत्रीकरण हुआ है। उन्होंने कहा कि समाज का भरोसा अर्जित करें क्योंकि प्रायः वेब पत्रकारों के पास बड़ी टीम नहीं होती किंतु सूचना का सत्यापन जरूरी है। इसलिए बड़े मीडिया हाउस की तुलना में वेब पत्रकारों की चुनौतियां ज्यादा हैं।



बुधवार, 24 दिसंबर 2025

अटलजीः वाक् शक्ति की आराधना से छुए शिखर

 

उनकी पत्रकारिता, कविता और भाषणों में  छिपे हैं संचार के असाधारण सूत्र

-      प्रो.संजय द्विवेदी



   हमारे यहां शब्द को ब्रम्ह कहा गया है। शब्द की साधना, वाक् की साधना ईश्वर की ही साधना है। भारत रत्न श्री अटलबिहारी वाजपेयी हमारे समय के ऐसे नायक हैं जिन्होंने संवाद और संचार के माध्यम से जो जगह बनाई वह दुर्लभ है। हम उनके समूचे व्यक्तित्व का आकलन करेंगे तो पाएंगे संचार और संवाद ही दो ऐसे तत्व हैं, जिन्होंने उन्हें गढ़ा था। उन्होंने भारतीय राजनीति और समाज को अपने व्यक्तित्व-कृतित्व से इस तरह प्रभावित किया जिसकी मिसाल नहीं मिलती।

      हर राजनेता अपने कुछ विलक्षण गुणों के लिए जाना जाता है। हमारे देश में त्याग,बलिदान, लोकसेवा, ग्रामीण विकास, समाज सुधार के कामों में रुचि लेकर काम करके बढ़े अनेक नायक दिखते हैं। आजादी के आंदोलन में अनेक नायक समाज सुधार के प्रकल्पों से जुड़े थे। खुद राष्ट्रपिता महात्मा एक समाज सुधारक और आंदोलनकारी की तरह सामने आते हैं। लोकमान्य तिलक ने गणेश उत्सव और अपनी समाज सुधार की चेतना से समाज में अलग तरह का जागरण किया। बाबा साहब आंबेडकर गैरबराबरी के विरुद्ध संघर्ष से जननायक बन जाते हैं। नेताजी सुभाषचंद्र बोस अपनी रणनीतिक कुशलता और सैन्य रूचियों से एक अलग संसार रच देते हैं। लालबहादुर शास्त्री और दीनदयाल उपाध्याय अपनी निजी ईमानदारी और त्याग से आकर्षित करते हैं। नानाजी देशमुख अपने ग्राम स्वराज्य के संकल्पों से जगह बनाते हैं। इसी तरह अनेक नायक अलग-अलग कामों के माध्यम से सामने आगे आते हैं।

संवाद नायक अटलजी-

       इन सबके बीच अटलजी का किस्सा बहुत अलग है। वे प्रथमतः और अंततः संवाद नायक हैं। अनोखे संवाद नायक। ह्दय से ह्दय का संवाद करने वाले नायक। उन्हें सुनना इस देश का स्वभाव बन गया। वे कविताएं पढ़ रहे हों या भाषण दे रहे हों, उनका संवेदनशील मन लोगों के दिलों को स्पर्श करता है। अपनी भाषणकला से वे असाधारण नायक बने। हिंदी में होने वाले उनके व्याख्यानों ने सारे देश को एक सूत्र में बांध दिया। उनके दल के वैचारिक और भौगोलिक विस्तार में सहायक बना। वे ही ऐसे हैं जो प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू से लेकर आज के दौर तक प्रासंगिक बने रहे। अपनी बीमारी के बाद भी उनका मौन बहुत मुखर था। उनके निधन के बाद का समय याद कीजिए किस तरह सारा देश जुड़ गया था, वर्तमान प्रधानमंत्री सहित सारी सरकार और लाखों लोग पैदल चलकर उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे। उनमें नौजवानों की संख्या बहुत थी जिन्होंने उन्हें देखा नहीं था। आनलाईन या टीवी माध्यमों पर सुना था। उनकी कविताएं और भाषण आज भी लोकतंत्र को राह दिखाते हैं।

    एक साधारण परिवार में जन्में इस राजनेता ने अपनी भाषण कला,पत्रकारिता, लेखन, देहभाषा और विचारधारा के प्रति सातत्य का जो परिचय दिया वह आज की राजनीति और समाज में दुर्लभ है। उनकी समूची यात्रा में उनका संवाद कौशल बार-बार उभरकर सामने आता है, जो उन्हें उनके समकालीन नेताओं से बहुत अलग बनाता है। अटल जी का मूल्यांकन करें तो वे मूलतःसंचारक ही हैं। उनकी इस प्रतिभा को पं. दीनदयाल उपाध्याय ने पहचान लिया था और इसलिए जब उन्होंने लखनऊ से स्वदेश, राष्ट्रधर्म और पांचजन्य जैसे प्रकाशन प्रारंभ किए तो उनकी नजर अटलजी ही पड़ी। इसके पहले से अटलजी एक कवि के रूप में लोकप्रिय हो चुके थे। मंचों पर उनकी कविताएं सुनीं जाने लगीं थीं। उनका कवि रूप भी बहुत संवादी है। उनकी कविताएं अप्रतिम संचार करती हैं। वे लिखते हैं-

उजियारे में, अंधकार में, कल कहार में,

बीच धार में, क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,

परहित अर्पित अपना तन-मन,

जीवन को शत-शत आहुति में,

जलना होगा, गलना होगा।

कदम मिलाकर चलना होगा।


    उनकी संचार और संवाद कला ही उन्हें भारत जैसे महादेश का नायक बनाने में सबसे महत्वपूर्ण है। एक बड़े परिवार का उत्तराधिकार पाकर कुर्सियां हासिल करना बहुत सरल है किंतु वाजपेयी की पृष्ठभूमि और उनका संघर्ष देखकर लगता है कि संवादकला कैसे एक सामान्य परिवार से आए बालक को महानायक बना सकती है। वे लोगों के स्वप्न को साकार करने वाले नायक बने। लोगों ने उनके भाषण सुने और भरोसा किया। इन अर्थों में अटल जी का संवाद ह्दय से ह्दय का संवाद बन जाता है।

    याद कीजिए अटल जी की कविता तन-मन हिंदू मेरा परिचय। वे अपनी कविताओं, लेखों ,भाषणों और जीवन से जो कुछ प्रकट करते रहे उसमें इस मातृ-भू की अर्चना के सिवा क्या है। वे सही मायने में भारतीयता के ऐसे अग्रदूत बने जिसने न सिर्फ सुशासन के मानकों को भारतीय राजनीति के संदर्भ में स्थापित किया वरन अपनी विचारधारा को आमजन के बीच स्थापित कर दिया। उनके अद्भुत संचार शैली की कविताएं, भाषण और लेख उनको लोगों के बीच ले गए। जिसने उन्हें सुना, उनका दीवाना हो गया। जब वे पहली बार संसद पहुँचे, तो उनकी भाषण कला से संसद भी प्रभावित हुई। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भी श्री वाजपेयी की तारीफ की। इसके बाद श्री वाजपेयी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
यशस्वी संपादक एवं पत्रकार-

  अटल जी के संचार और संवाद के अनेक रूप हैं। जिसमें वे खुद को व्यक्त करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आरंभिक प्रकाशनों स्वदेश, राष्ट्रधर्म और पांचजन्य के साथ वे दैनिक वीर अर्जुन(दिल्ली) के भी संपादक बने। इस तरह उनका लेखन और संपादक कौशल सामने दिखता है। वाराणसी शहर ने उनके अंदर के पत्रकार को पहचाना था और उसे मंच प्रदान किया था। उनके पत्रकारिता जीवन की शुरुआत वाराणसी के 'समाचार' नामक अखबार से हुई थी। यह अखबार 1942 में भईया जी बनारसी ने शुरू किया था। उस समय इस अखबार का कार्यालय चेतगंज स्थित हबीबपुरा मोहल्ले में था। अटल जी ने 1977 में एक चुनावी रैली में इस बात की जानकारी दी थी। इस अखबार के लिए नानाजी देशमुख और बाला साहब देवरस भी लिखा करते थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी पत्रकारों, साहित्यकारों से उनका संवाद बना रहा है। वे अखबारों के आयोजनों में भी जाते रहे। पत्रकारिता पर राय देते रहे। ऐसे ही 20 जनवरी 1982 कोतरुण भारतकी रजत जयंती पर अटल जी ने कहा था किसमाचार पत्र के ऊपर एक बड़ा राष्ट्रीय दायित्व है। भले हम समाचार पत्रों की गणना उद्योग में करें, कर्मचारियों के साथ न्याय करने की दृष्टि से आज यह आवश्यक भी होगा, लेकिन समाचार पत्र केवल उद्योग नहीं है, उससे भी कुछ अधिक है।    अटल जी ने स्वयं कई साक्षात्कारों में बताया था कि वह अपने पत्रकारिता जीवन से काफी खुश थे। साल 1953 में भारतीय जनसंघ के नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी कश्मीर को विशेष दर्जा देने का विरोध कर रहे थे। जम्मू-कश्मीर में लागू परमिट सिस्टम को विरोध करने मुखर्जी श्रीनगर चले गए। वे परमिट सिस्टम को तोड़कर श्रीनगर गए थे। इस घटना को कवर करने के लिए पत्रकार के रूप में वाजपेयी वहां थे। अटलजी ने इंटरव्यू में बताया, मुखर्जी को गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन मैं वापस आ गया। इस घटना के कुछ दिनों बाद ही डॉ. मुखर्जी की बीमारी के कारण मृत्यु हो गई। इस घटना से वाजपेयी पूरी तरह से हिल गए। इसके बाद उन्होंने राजनीति में आने का निर्णय लिया। 

       वे पत्रकारिता में शुचिता के पक्षधर थे। वे नहीं चाहते थे पत्रकारिता में किसी का अंधसमर्थन हो। वरिष्ठ पत्रकार श्री हेमंत शर्मा ने एक लेख में अटल जी इस भावना को रेखांकित करते हुए लिखा है-मैं उस समय लखनऊ में जनसत्ता का स्टेट ब्यूरो चीफ था। अटलजी लखनऊ से ही चुनाव लड़ा करते थे. उन दिनों टीवी था नहीं, अखबार ही चलते थे। अटलजी दिल्ली से जो कुछ भी इनपुट दिया करते थे वो अगले दिन उन्हें अखबार में छपा मिला करता था। इसीलिए भी वह मुझे सबसे ज्यादा स्नेह करते थे। उन दिनों मैंने उनके पक्ष में दो-तीन रिपोर्टें लिखीं। पहले और दूसरे पर उन्होंने कहा, “बहुत अच्छा लिखा।इससे मुझे काफी हिम्मत मिली। लेकिन तीसरे लेख पर उन्होंने अपने अंदाज में कहा, “भई, दिल्ली में आपका बड़ा रसूख है। आपकी विश्वसनीयता बहुत है। आप पत्रकारिता में अपने विश्वास को बनाये रखिए. हमारे बारे में ज्यादा लिखेंगे तो दूसरा पक्ष आपके प्रति अलग भाव रखेगा। आज ऐसा कहने वाले राजनेता दुर्लभ हैं जो दूसरे के मान की चिंता करते हैं। कुल मिलाकर इससे पत्रकारिता की शुचिता पर उनका भरोसा पता चलता है।

    पत्रकार तवलीन सिंह की किताब दरबार में वे लिखती हैं- “21 महीने के बाद इमरजेंसी हटी थी। इसके बाद विपक्ष ने एकजुटता से इंदिरा गांधी का मुकाबला करने का फैसला किया। इसी एकजुटता में पहली रैली दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित की गई।रैली को लेकर पत्रकारों में एक्साइटमेंट था। प्रेस गैलरी में हम सब गपशप कर रहे थे। इस रैली में कम से कम लोग पहुंचे, इसके लिए इंदिरा गांधी ने दूरदर्शन पर उस समय पर सुपर-डुपर हिट फिल्म बॉबीका प्रसारण करवा दिया। लेकिन बॉबीभी लोगों को रामलीला मैदान आने से न रोक सकी। शाम के लगभग 6 बजे नेताओं का काफिला आयावे सब लोग सफेद एम्बेसडर कारों से आए। उनमें से अधिकर बूढ़े हो चुके थे। बोलने का क्रम शुरू हुआ। एक-एक करके माइक पर आते और बोरिंग स्पीच देते। हर कोई जेल में अपने अनुभव बता रहा था। भीड़ भी बोर हो रही थी और अब थकने लगी थी। तभी मैंने हिंदुस्तान टाइम्स के अपने साथी से कहा कि अगर किसी ने बहुत कुछ हटकर नहीं बोला तो लोग यहाँ और टिकने वाले नहीं हैं। रात के 9 बज चुके थे। हालांकि बारिश रुक चुकी थी लेकिन सर्दी थी। तभी उस साथी ने मुस्काराकर जवाब दिया… चिंता मत करो, जब तक अटलजी नहीं बोल लेते, कोई नहीं जाएगा। ये लोग उन्हें ही सुनने आए हैं। फिर लगभग 9:30 के आसपास अटलजी की बारी आईजैसे ही बोलने के लिए खड़े हुए। भीड़ उत्साह से भर गई, तमाम लोग खड़े होकर तालियां बजाने लगे। नारे लगे।  अटल बिहारी जिंदाबाद… अटलजी ने दोनों हाथ जोड़कर भीड़ का अभिवादन स्वीकार किया फिर हवा में दोंनो हाथ लहराकर भीड़ से शांत होने का इशारा किया। फिर एक मंझे हुए अभिनेता की तरह आंखें बंद करते हुए बोले… बाद मुद्दत के मिले हैं दीवाने अपने चिरपरिचित अंदाज में अटलजी थोड़ा रुके। इतने भर में भीड़ बौरा गई। जब शोर शांत हुआ तो फिर आंखें बंद की और लंबी खामोशी के बाद बोलना शुरू किया… कहने-सुनने को बहुत हैं अफसाने भीड़ अब उम्मादी/बेकाबू सी हो चुकी थी… खुली हवा में जरा सांस तो ले लें, कब तक रहेगी आज़ादी कौन जाने!जाहिर है संवाद पर ऐसी पकड़ उनकी ही थी। वे किसी भी सभा का मूल आकर्षण होते थे।विपक्ष अनेक सर्वदलीय सभाओं में दिग्गजों के बीच भी उनका भाषण अंत में करवाया जाता था, क्योंकि जनता उनको ही सुनने के लिए आती थी। उनका एक अलग आकर्षण था। उनके ऐसे अनेक किस्से लोकविमर्श में हैं।

           अटल जी का गांव आगरा जिले के बटेश्वर में हैं। वहां अटल बिहारी वाजपेयी और मामा जी के नाम से विख्यात माणिकचंद्र वाजपेयी दो पत्रकार निकले। मामा जी और अटल जी दोनों स्वदेश के संपादक रहे। अटल जी के मन में पत्रकारिता के प्रति इतना आदर था कि उन्होंने मामा जी का सम्मान समारोह प्रधानमंत्री आवास पर आयोजित किया और उनके बारे में न सिर्फ विचार रखे वरन उनके चरण भी छुए। यह उनकी विनम्रता थी जो मामा जी के गुणों का सार्वजनिक सम्मान कर रही थी। देश के अनेक लेखकों से उनका संवाद और पत्राचार था। किताबों को पढ़ना और उन पर टिप्पणी करना उनकी रुचि का हिस्सा था।

 संवाद से समन्वय-

 अटल जी का संवाद पर बहुत गहरा भरोसा था। वे हर बार कहते थे कि कोई भी ऐसा संकट नहीं जो बातचीत से हल न किया जा सके। उनके शब्दों पर लोग विश्वास करते थे। इसीलिए वे एक ऐसी सरकार के नायक बने जिसने भारतीय राजनीति में समन्वय की राजनीति की शुरुआत की।किसी भी मिली- जुली सरकार को चलाना संवाद के बगैर संभव नहीं है। वह एक ऐसी राष्ट्रीय सरकार बनी जिसमें विविध विचारों, क्षेत्रीय हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले तमाम लोग शामिल थे। दो दर्जन दलों के विचारों को एक मंत्र से साधना आसान नहीं था। किंतु अटल जी की राष्ट्रीय दृष्टि, उनकी साधना, संवाद कौशल और बेदाग व्यक्तित्व ने सारा कुछ संभव कर दिया। वे सही मायने में भारतीयता और उसके औदार्य के उदाहरण बन गए। उनकी सरकार ने अस्थिरता के भंवर में फंसे देश को एक नई राजनीति को राह दिखाई। यह रास्ता मिली-जुली सरकारों की सफलता की मिसाल बन गया। भारत जैसे देशों में जहां मिलीजुली सरकारों की सफलता एक चुनौती थी, अटलजी ने साबित किया कि स्पष्ट विचारधारा,राजनीतिक चिंतन, संवाद और समन्वय, साफ नजरिए से भी परिवर्तन लाए जा सकते हैं। विपक्ष भी उनकी कार्यकुशलता और व्यक्तित्व पर मुग्ध था। यह शायद उनके विशाल व्यक्तित्व के चलते संभव हो पाया, जिसमें सबको साथ लेकर चलने की भावना थी। देश प्रेम था, देश का विकास करने की इच्छाशक्ति थी। उनकी नीयत पर किसी कोई शक नहीं था। शायद इसीलिए उनकी राजनीतिक छवि एक ऐसे निर्मल राजनेता की बनी जिसके मन में विरोधियों के प्रति भी कोई दुराग्रह नहीं था।

    उनकी सरकार सुशासन के उदाहरण रचने वाली साबित हुई। जनसमर्थक नीतियों के साथ महंगाई पर नियंत्रण रखकर सरकार ने यह साबित किया कि देश यूं भी चलाया जा सकता है। सन् 1999 के राजग के चुनाव घोषणापत्र का आकलन करें तो पता चलता है कि उसने सुशासन प्रदान करने की हमारी प्रतिबद्धताजैसे विषय को उठाने के साथ कहा-लोगों के सामने हमारी प्रथम प्रतिबद्धता एक ऐसी स्थायी, ईमानदार, पारदर्शी और कुशल सरकार देने की है, जो चहुंमुखी विकास करने में सक्षम हो। इसके लिए सरकार आवश्यक प्रशासनिक सुधारों के समयबद्ध कार्यक्रम शुरू करेगी, इन सुधारों में पुलिस और अन्य सिविल सेवाओं में किए जाने वाले सुधार शामिल हैं।राजग ने देश के सामने ऐसे सुशासन का आदर्श रखा जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रीय पुनर्निर्माण, संघीय समरसता, आर्थिक आधुनिकीकरण, सामाजिक न्याय, शुचिता जैसे सवाल शामिल थे। आम जनता से जुड़ी सुविधाओं का व्यापक संवर्धन, आईटी क्रांति, सूचना क्रांति इससे जुड़ी उपलब्धियां हैं।

     अपनी कुशल संवाद शैली से उन्होंने देश में सकारात्मकता का संचार किया और अपने दल और सहयोगियों के लिए जनसमर्थन जुटाया। चुनाव अभियान सही मायने में लोकसंचार के सबसे बड़े उदाहरण हैं, जिसमें आप निरंतर संवाद करते हुए जनता का भरोसा हासिल करते हैं। भारत जैसे महादेश में अटल जी ने इसे संभव किया। अटल जी जिस तरह पूरे देश का निरंतर प्रवास किया, उसने न सिर्फ उनकी संवेदात्मक ग्रहणशीलता को व्यापक किया बल्कि सरोकारी भी बनाया। विपक्ष के नेता के रूप में संसद में उनके व्याख्यान संचार और संवाद कला उदाहरण हैं। उन्होंने बहुत संवेदना के साथ पूरी मर्यादा में रहते हुए लोकतंत्र को मजबूती देना का काम किया। एक सांसद के रुप में उनकी सक्रियता राज्यसभा और लोकसभा में हुए उनके व्याख्यान उनकी अध्ययनशीलता और देशप्रेम का उदाहरण हैं। जब वे सदन में खड़े होते थे, तब उन्हें सुनने की लालसा सांसदों को भी रहती थी। उनके सुनने के सांसद अपनी व्यस्तताओं के बीच भी सदन में रहते थे। नये सांसदों के वे प्रेरणापुरुष ही थे। नयी पीढ़ी को इस तरह प्रेरित और प्रशिक्षित करना उनका विरल योगदान है। जो लोग आज भी याद करते हैं। संसदीय परंपराओं और लोकतांत्रिक मर्यादा का उन सरीखा समर्थक दुर्लभ है। उनका संसदीय जीवन ऐसी कथा है जिस पर शोध किए जाने की जरूरत है।  

एक भारतीय प्रधानमंत्री-

 संचार और संवाद की सफलता बहुत कुछ देहभाषा (बाडी लैंग्वेंज) पर निर्भर करती है। जैसे महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस अपनी देहभाषा से बहुत कुछ कहते थे। अटलजी ने भी अपनी देहभाषा, वेशभूषा से देश को जोड़ा। लोग उनमें अपनी छवि देख पाए। खुद को उनसे जोड़ पाए।अटलबिहारी बाजपेयी सही मायने में एक ऐसे प्रधानमंत्री थे जो भारत को समझते थे। भारतीयता को समझते थे। राजनीति में उनकी खींची लकीर इतनी लंबी है जिसे पारकर पाना संभव नहीं दिखता। अटलजी सही मायने में एक ऐसी विरासत के उत्तराधिकारी हैं जिसने राष्ट्रवाद को सर्वोपरि माना। देश को सबसे बड़ा माना। देश के बारे में सोचा और अपना सर्वस्व देश के लिए अर्पित किया।

       उनकी समूची राजनीति राष्ट्रवाद के संकल्पों को समर्पित रही। वे भारत के प्रधानमंत्री बनने से पहले विदेश मंत्री भी रहे। उनकी यात्रा सही मायने में एक ऐसे नायक की यात्रा है जिसने विश्वमंच पर भारत और उसकी संस्कृति को स्थापित करने का प्रयास किया। मूलतः पत्रकार और संवेदनशील कवि रहे अटल जी के मन में पूरी विश्वमानवता के लिए एक संवेदना है। यह बार-बार उनकी वाणी से, लेखों से कविताओं से मुखर होती है। यही भारतीय तत्व है। इसके चलते ही उनके विदेश मंत्री रहते पड़ोसी देशों से रिश्तों को सुधारने के प्रयास हुए तो प्रधानमंत्री रहते भी उन्होंने इसके लिए प्रयास जारी रखे। भले ही कारगिल का धोखा मिला, पर उनका मन इन सबके विपरीत एक प्रांजलता से भरा रहा। उन्होंने संवाद किया और भरोसा किया। बदले की भावना न तो उनके जीवन में थी न राजनीति में। इसी के चलते वे अजातशत्रु कहे जाते रहे। उनकी यही संवेदना भी इस कविता में व्यक्त होती है-

छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता

टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।

हाजिरजवाबी और संवादशैली-वे अपनी हाजिर जवाबी और मजाकिया अंदाज में गंभीर बात कहने की खूबी से हर किसी का दिल जीत लेते थे। फरूर्खाबाद में 1991 में ऐसे ही एक वाकये को उस दौर के साक्षी लोग आज भी यादों में संजोए हैं। तब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी भाजपा प्रत्याशी ब्रह्मदत्त द्विवेदी के समर्थन में आयोजित जनसभा को संबोधित करने आए थे। मंच काफी ऊंचा बना था तो पहले इस पर ही चुटकी ली। बोले, “मुझे नहीं पता कि मैं मंच पर खड़ा हूं या मचान पर। उनका इतना कहना था कि मैदान में भीड़ के बीच ठहाकों के साथ तालियां गूंज गई। दरअसल, अटल बिहारी वाजपेयी जी के कार्यक्रम की अचानक सूचना पर आननफानन में एक ट्रक को खड़वा कर उसे मंच का रूप दे दिया गया था।

   भारत-पाक रिश्तों में सहजता लाने के लिए वे 1999 में बस से लाहौर गए थे। वहां पहुंचने पर पाकिस्तानी मीडिया की एक महिला पत्रकार ने उनसे कश्मीर को लेकर सवाल पूछने के साथ ही शादी का प्रस्ताव भी दे दिया। महिला पत्रकार ने कहा, “मैं आपसे शादी करना चाहती हूं, लेकिन मुंह दिखाई में कश्मीर लूंगी।इस पर अटल जी ने खूबसूरत जवाब देकर सबको हैरान कर दिया। उन्होंने कहा, “मैं शादी के लिए तैयार हूं, लेकिन मुझे दहेज में पूरा पाकिस्तान चाहिए।उनका यह जवाब मीडिया की सुर्खियां बन गया था और काफी चर्चित रहा। ऐसे अनेक उदाहरण अटल जी की हाजिर जबावी के मशहूर हैं। एक बार वे मेरे शहर बस्ती (उत्तर प्रदेश) में थे। वहां की सभा में काफी विलंब से पहुंचे। लोग इंतजार करते रहे और अंततः अटलजी आए। वे बोले, “मैं देर से आया हूं लेकिन दूर से आया हूं।लोगों की तालियों ने उनका समर्थन किया। वे फिर बोले मैंने आज दिल्ली की लोकसभा सीटों पर प्रचार किया और उन्हें मथ डाला और इस मंथन से अमृत निकलेगा। उनके भाषण कविता की तरह दिलों में उतर जाते थे। मैंने अमीनाबाद (लखनऊ) में उन्हें एक चुनावी सभा में ही सुना। उन सभा बिजली चली गयी। वे बोलते रहे। भीड़ थोड़ी इधर- उधर हुई तो वो बोले अरे भाई मैं सुनने की चीज हूं, देखने की नहीं। फिर क्या था तालियां बजने लगीं। इस बीच माइक भी बंद हो गया। उन्होंने गहरे व्यंग्यबोध से कहा अरे भाई क्या माइक भी चंदे में लाए हो। इस तरह उनका हास्य, व्यंग्य और सरलता से संवाद दिलों में उतर जाता था।

    सही मायने में राजनीति में उनकी अनुपस्थिति इसलिए भी बेतरह याद की जाती है, क्योंकि उनके बाद मूल्यपरक राजनीति का अंत होता दिखता है। क्षरण तेज हो रहा है, आदर्श क्षरित हो रहे हैं। उसे बचाने की कोशिशें असफल होती दिख रही हैं। आज भी वे एक जीवंत इतिहास की तरह हमें प्रेरणा दे रहे हैं। वे एक ऐसे नायक हैं जिसने हमारे इसी कठिन समय में हमें प्रेरणा दी और हममें ऊर्जा भरी और स्वाभिमान के साथ साफ-सुथरी राजनीति का पाठ अपने समूचे जीवन और संवाद से अटलजी जो पाठ पढ़ाते हैं उसमें राजनीति कम और राष्ट्रीय चेतना ज्यादा है। सारा जीवन एक तपस्वी की तरह जीते हुए भी वे राजधर्म को निभाते हैं। सत्ता में रहकर भी वीतराग उनका सौंदर्य है। वे एक लंबी लकीर खींच गए हैं, इसे उनके चाहनेवालों को न सिर्फ बड़ा करना है बल्कि उसे दिल में भी उतारना होगा। उनके सपनों का भारत तभी बनेगा और सामान्य जनों की जिंदगी में उजाला फैलेगा।

     स्वतंत्र भारत के इस करिश्माई नेता का व्यक्तित्व और कृतित्व सदियों तक याद किया जाएगा, वे धन्य हैं जिन्होंने अटल जी को देखा, सुना और उनके साथ काम किया है। ये यादें और उनके काम ही प्रेरणा बनें तो भारत को परमवैभव तक पहुंचने से रोका नहीं जा सकता। उनकी कविता और भाषण दोनों देश के लिए हैं। लोगों को जगाने के लिए हैं। ऐसी ही एक कविता में वे कहते हैं-

भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।
कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।
यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये
मरेंगे तो इसके लिये।

ऐसी अनेक कविताएं और लोकप्रिय भाषणों से लोगों के दिलों में वे बसे रहे। उन्हें सुनने के लिए विरोधी दलों के लोग भी जाते थे। उनको सुनने का सुख विरल था। लंबे समय तक विपक्ष में रहने के बाद भी उनकी लोकप्रियता अपार थी। लोग बताते हैं कि देश में प्रधानमंत्री के बाद अगर किसी की सभा में स्वस्फूर्त सर्वाधिक लोग आते थे तो वे अटल जी थे। उन्होंने वाक् को साध लिया था। उसी की आराधना की थी। अनोखे संचारक, विरल वक्ता, संवेदनशील कवि, मंचों के नायक, अप्रतिम संसदविद् जैसी उनकी अनेक छवियां हैं। वे संचार के महानायक थे। लोक में व्याप्त उनकी स्मृति इतनी सघन है कि आज भी लोग उनका नाम सुनकर श्रद्धा से भर जाते हैं।