शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

सन्यासी का संचार शास्त्र


-प्रो. संजय द्विवेदी


     स्वामी विवेकानंद ज्यादा बड़े संन्यासी थे या उससे बड़े संचारक (कम्युनिकेटर) या फिर उससे बड़े प्रबंधक ? ये सवाल हैरत में जरूर डालेगा पर उत्तर हैरत में डालनेवाला नहीं है क्योंकि वे एक नहीं,तीनों ही क्षेत्रों में शिखर पर हैं। वे एक अच्छे कम्युनिकेटर हैं, प्रबंधक हैं और संन्यासी तो वे हैं ही। भगवा कपड़ों में लिपटा एक संन्यासी अगर युवाओं का रोल माडल बन जाए तो यह साधारण घटना नहीं है, किंतु विवेकानंद के माध्यम से भारत और विश्व ने यह होते हुए देखा। कोलकाता में जन्मे विवेकानंद और उनके विचार अगर आज डेढ़ दशक बाद भी प्रासंगिक बने हुए हैं तो समय के पार देखने की उनकी क्षमता को महसूस कीजिए। एक बहुत छोटी सी जिंदगी पाकर भी उन्होंने जो कर दिखाया वह इस घरती पर तो चमत्कार सरीखा ही था।
   स्वामी विवेकानंद की बहुत छोटी जिंदगी का पाठ बहुत बड़ा है। वे अपने समय के सवालों पर जिस प्रखरता से टिप्पणियां करते हैं वे परंपरागत धार्मिक नेताओं से उन्हें अलग खड़ा कर देती हैं। वे समाज से भागे हुए सन्यासी नहीं हैं। वे समाज में रच बस कर उसके सामने खड़े प्रश्नों से मुठभेड़ का साहस दिखाते हैं। वे विश्वमंच पर सही मायने में भारत, उसके अध्यात्म, पुरूषार्थ और वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को स्थापित करने वाले नायक हैं। वे एक गुलाम देश के नागरिक हैं पर उनकी आत्मा,वाणी और कृति स्वतंत्र है। वे सोते हुए देश और उसके नौजवानों को झकझोर कर जगाते हैं और नवजागरण का सूत्रपात करते हैं। धर्म को वे जीवन से पलायन का रास्ता बनाने के बजाए राष्ट्रप्रेम, राष्ट्र के लोगों से प्रेम और पूरी मानवता से प्रेम में बदल देते हैं।शायद इसीलिए वे कह पाए-व्यावहारिक देशभक्ति सिर्फ एक भावना या मातृभूमि के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति मात्र नहीं है। देशभक्ति का अर्थ है अपने साथी देशवासियों की सेवा करने का जज्बा।
   अपने जीवन,लेखन, व्याख्यानों में वे जिस प्रकार की परिपक्वता दिखाते हैं, पूर्णता दिखाते हैं वह सीखने की चीज है। उनमें अप्रतिम नेतृत्व क्षमता, कुशल प्रबंधन के गुर,परंपरा और आधुनिकता का तालमेल दिखता है। उनमें परंपरा का सौंदर्य है और बदलते समय का स्वीकार भी है। वे आधुनिकता से भागते नहीं, बल्कि उसका इस्तेमाल करते हुए नए समय में संवाद को ज्यादा प्रभावकारी बना पाते हैं। स्वामी जी का लेखन और संवादकला उन्हें अपने समय में ही नहीं, समय के पार भी एक नायक का दर्जा दिला देती है। आज के समय में जब संचार और प्रबंधन की विधाएं एक अनुशासन के रूप में हमारे सामने हैं तब हमें पता चलता है कि स्वामी जी ने कैसे अपने पूरे जीवन में इन दोनों विधाओं को साधने का काम किया। यह वह समय था जब मीडिया का इतना कोलाहल न था फिर भी छोटी आयु पाकर भी वे न सिर्फ भारत वरन दुनिया में भी जाने गए। अपने विचारों को लोगों तक पहुंचाया और उनकी स्वीकृति पाई। क्या कम्युनिकेशन की ताकत और प्रबंधन को समझे बिना उस दौर में यह संभव था। स्वामी जी के व्यक्तित्व और उनकी पूरी देहभाषा को समझने पर उनमें प्रगतिशीलता के गुण नजर आते हैं। उनका अध्यात्म उन्हें कमजोर नहीं बनाता, बल्कि शक्ति देता है कि वे अपने समय के प्रश्नों पर बात कर सकें। उनका एक ही वाक्य –“उठो!जागो ! और तब तक मत रूको जब तक लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता। उनकी संचार और संवादकला के प्रभाव को स्थापित करने के लिए पर्याप्त है। यह वाक्य हर निराश व्यक्ति के लिए एक प्रभावकारी स्लोगन बन गया। इसे पढ़कर जाने कितने सोए, निराश, हताश युवाओं में जीवन के प्रति एक उत्साह पैदा हो जाता है। जोश और उर्जा का संचार होने लगता है। स्वामी जी ने अपने जीवन से भी हमें सिखाया। उनकी व्यवस्थित प्रस्तुति, साफा बांधने की शैली जिसमें कुछ बाल बाहर झांकते हैं बताती है कि उनमें एक सौंदर्यबोध भी है। वे स्वयं को भी एक तेजस्वी युवा के रूप में प्रस्तुत करते हैं और उनके विचार भी उसी युवा चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे शास्त्रीय प्रसंगों की भी ऐसी सरस व्याख्या करते हैं कि उनकी संचारकला स्वतः स्थापित हो जाती है। अपने कर्म, जीवन, लेखन, भाषण और संपूर्ण प्रस्तुति में उनका एक आदर्श प्रबंधक और कम्युनिकेटर का स्वरूप प्रकट होता है। किस बात को किस समय और कितने जोर से कहना यह उन्हें पता है। अमरीका के विश्व धर्म सम्मेलन में वे अपने संबोधन से ही लोगों को सम्मोहित कर लेते हैं। भारत राष्ट्र और उसके लोगों से उनका प्रेम उनके इस वाक्य से प्रकट होता है-आपको सिखाया गया है अतिथि देवो भव, पितृ देवो भव, मातृदेवो भव। पर मैं आपसे कहता हूं दरिद्र देवो भव, अज्ञानी देवो भव, मूर्ख देवो भव। यह बात बताती है कि कैसे वे अपनी संचार कला से लोगों के बीच गरीब, असहाय और कमजोर लोगों के प्रति संवेदना का प्रसार करते नजर आते हैं। समाज के कमजोर लोगों को भगवान समझकर उनकी सेवा का भाव विवेकानंद जी ने लोगों के बीच भरना चाहा। वे साफ कहते हैं- यदि तुम्हें भगवान की सेवा करनी हो तो, मनुष्य की सेवा करो। भगवान ही रोगी मनुष्य, दरिद्र पुरूष के रूप में हमारे सामने खड़ा है।वह नर वेश में नारायण है। संचार की यह शक्ति कैसे धर्म को एक व्यापक सामाजिक सरोकारों से जोड़ देती है यह स्वामी जी बताते हैं। सही मायने में विवेकानंद जी एक ऐसे युगपुरूष के रूप में सामने आते हैं जिनकी बातें आज के समय में ज्यादा प्रासंगिक हो गयी दिखती हैं। धर्म के सच्चे स्वरूप को स्थापित कर उन्होंने जड़ता को तोड़ने और नए भारत के निर्माण पर जोर दिया। भारतीय समाज में आत्मविश्वास भरकर उन्हें हिंदुत्व के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान दिया जिसमें सबका स्वीकार है और सभी विचारों का आदर करने का भाव है। इसलिए वे कहते थे भारत का उदय अमराईयों से होगा। अमराइयां का मायने था छोटी झोपड़ियां। वे भारतीय संदर्भ में सामाजिक न्याय के सबसे प्रखर प्रवक्ता हैं। वे दिखावटी संवेदना के खिलाफ थे और इसलिए स्वामी जी को जीवन में उतारना एक कठिन संकल्प है। आज जबकि कुपोषण,पर्यावरण के सवालों पर बात हो रही है। स्वामी जी इन मुद्दों पर बहुत सधी भाषा में अपनी बात कर चुके हैं। वे बेहतर स्वास्थ्य को एक नियामत मानते हैं। इसीलिए वे कह पाए कि गीता पढ़ने से अच्छा है, फुटबाल खेलो। एक स्वस्थ शरीर के बिना भारत सबल न होगा यह उनकी मान्यता थी।
     मात्र 39 साल की आयु में वे हमसे विदा हो गए किंतु वे कितने मोर्चों पर कितनी बातें कह और कर गए हैं कि वे हमें आश्चर्य में डालती हैं। एक साधारण इंसान कैसे अपने आपको विवेकानंद के रूप में बदलता है। इसमें एक प्रेरणा भी है और प्रोत्साहन भी। आज की युवा शक्ति उनसे प्रेरणा ले सकती है। स्वामी विवेकानंद ने सही मायने में भारतीय समाज को एक आत्मविश्वास दिया, शक्ति दी और उसके महत्व का उसे पुर्नस्मरण कराया। सोते हुए भारत को उन्होंने झकझोरकर जगाया और अपने समूचे जीवन से सिखाया कि किस तरह भारतीयता को पूरे विश्वमंच पर स्थापित किया जा सकता है। एक बेहतर कम्युनिकेटर, एक प्रबंधन गुरू, एक आध्यात्मिक गुरू, वेदांतों का भाष्य करने वाला सन्यासी, धार्मिकता और आधुनिकता को साधने वाला साधक, अंतिम व्यक्ति की पीड़ा और उसके संघर्षों में उसके साथ खड़ा सेवक, देशप्रेमी, कुशल संगठनकर्ता, लेखक एवं संपादक, एक आदर्श शिष्य जैसी न कितनी छवियां स्वामी विवेकानंद से जुड़ी हैं। किंतु हर छवि में वे अव्वल नजर आते हैं। उनकी जयंती मनाते हुए देश में विवेकानंद के विचारों के साथ-साथ जीवन में भी उनकी उपस्थिति बने तो यही भारत मां के माथे पर सौभाग्य का टीका साबित होगी।

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

उनकी आंखों में था एक समृध्द लोकजीवन का स्वप्न


नहीं रहे पद्मश्री से अलंकृत पं. श्यामलाल चतुर्वेदी

-प्रो. संजय द्विवेदी
      भरोसा नहीं होता कि पद्मश्री से अलंकृत वरिष्ठ पत्रकार- साहित्यकार पं.श्यामलाल चतुर्वेदी नहीं रहे। शुक्रवार सुबह ( 7 दिसंबर,2018) उनके निधन की सूचना ने बहुत सारे चित्र और स्मृतियां सामने ला दीं। छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के अध्यक्ष रहे श्री चतुर्वेदी सही मायनों में छत्तीसगढ़ की अस्मिता, उसके स्वाभिमान, भाषा और लोकजीवन के सच्चे प्रतिनिधि थे। उन्हें सुनकर जिस अपनेपन, भोलेपन और सच्चाई का भान होता है, वह आज के समय में बहुत दुर्लभ है। श्यामलाल जी से मेरी पहली मुलाकात सन् 2001 में उस समय हुयी जब मैं दैनिक भास्कर, बिलासपुर में कार्यरत था।
     मैं मुंबई से बिलासपुर नया-नया आया था और शहर के मिजाज को समझने की कोशिश कर रहा था। हालांकि इसके पहले मैं एक साल रायपुर में स्वदेश का संपादक रह चुका था और बिलासपुर में मेरी उपस्थिति नई ही थी। बिलासपुर के समाज जीवन, यहां के लोगों, राजनेताओं, व्यापारियों, समाज के प्रबुद्ध वर्गों के बीच आना-जाना प्रारंभ कर चुका था। दैनिक भास्कर को री-लांच करने की तैयारी मे बहुत से लोगों से मिलना हो रहा था। इसी बीच एक दिन हमारे कार्यालय में पं. श्यामलाल जी पधारे। उनसे यह मुलाकात जल्दी ही ऐसे रिश्ते में बदल गयी, जिसके बिना मैं स्वयं को पूर्ण नहीं कह सकता। अब शायद ही कोई ऐसा बिलासपुर प्रवास हो, जिसमें उनसे सप्रयास मिलने की कोशिश न की हो। उनसे मिलना हमेशा एक शक्ति देता था । उनसे मिला प्रेम, हमारी पूंजी है। उनके स्नेह-आशीष की पूंजी लिए मैं भोपाल आ गया किंतु रिश्तों में वही तरलता मौजूद रही। मेरे समूचे परिवार पर उनकी कृपा और आशीष हमेशा बरसते रहे हैं। मेरे पूज्य दादा जी की स्मृति में होने वाले पं. बृजलाल द्विवेदी स्मृति साहित्यिक पत्रकारिता समारोह में भी वे आए और अपना आर्शीवाद हमें दिया।
अप्रतिम वक्ताः
      पं. श्यामलाल जी की सबसे बड़ी पहचान उनकी भाषण-कला थी। वे बिना तैयारी के डायरेक्ट दिल से बोलते थे। हिंदी और छत्तीसगढ़ी भाषाओं का सौंदर्य, उनकी वाणी से मुखरित होता था। उन्हें सुनना एक विलक्षण अनुभव है। हमारे पूज्य गुरूदेव महामंडलेश्वर स्वामी शारदानंद जी उन्हें बहुत सम्मान देते रहे और अपने आयोजनों में आग्रह पूर्वक श्यामलाल जी को सुनते रहे। श्यामलाल जी अपनी इस विलक्षण प्रतिभा के चलते पूरे छत्तीसगढ़ में लोकप्रिय थे। वे किसी बड़े अखबार के संपादक नहीं रहे, बड़े शासकीय पदों पर नहीं रहे किंतु उन्हें पूरा छत्तीसगढ़ पहचानता है। सम्मान देता रहा। चाहता रहा। उनके प्रेम में बंधे लोग उनकी वाणी को सुनने के लिए आतुर रहते थे। उनका बोलना शायद इसलिए प्रभावकारी था क्योंकि वे वही बोलते थे जिसे वे जीते रहे। उनकी वाणी और कृति मिलकर संवाद को प्रभावी बना देते हैं।
महा परिवार के मुखियाः
      श्यामलाल जी को एक परिवार तो विरासत में मिला था। एक महापरिवार उन्होंने अपनी सामाजिक सक्रियता से बनाया । देश भर में उन्हें चाहने और मानने वाले लोग हैं। देश की हर क्षेत्र की विभूतियों से उनके निजी संपर्क थे। पत्रकारिता और साहित्य की दुनिया में छत्तीसगढ़ की वे एक बड़ी पहचान हैं। अपने निरंतर लेखन, व्याख्यानों, प्रवासों से उन्होंने हमें रोज समृद्ध किया । इस अर्थ में वे एक यायावर भी रहे, जिन्हें कहीं जाने से परहेज नहीं रहा। वे एक राष्ट्रवादी चिंतक थे किंतु विचारधारा का आग्रह उनके लिए बाड़ नहीं थी। वे हर विचार और राजनीतिक दल के कार्यकर्ता के बीच समान रूप से सम्मानित रहे। मध्यप्रदेश के अनेक मुख्यमंत्रियों से उनके निकट संपर्क रहे हैं। मंत्रियों की मित्रता सूची में उनकी अनिर्वाय उपस्थिति थी। किंतु खरी-खरी कहने की शैली ने सत्ता के निकट रहते हुए भी उनकी चादर मैली नहीं होने दी। सही मायनों में वे रिश्तों को जीने वाले व्यक्ति थे, जो किसी भी हालात में अपनों के साथ होते हैं।    
छत्तीसगढ़ी संस्कृति के चितेरेः
     छत्तीसगढ़ उनकी सांसों में बसता था। उनकी वाणी से मुखरित होता था। उनके सपनों में आता था। उनके शब्दों में व्यक्त होता था। वे सच में छत्तीसगढ़ के लोकजीवन के चितेरे और सजग व्याख्याकार थे। उनकी पुस्तकें, उनकी कविताएं, उनका जीवन, उनके शब्द सब छत्तीसगढ़ में रचे-बसे हैं। आप यूं कह लें उनकी दुनिया ही छत्तीसगढ़ था। जशपुर से राजनांदगांव, जगदलपुर से अंबिकापुर की हर छवि उनके लोक को रचती है और उन्हें महामानव बनाती थी। अपनी माटी और अपने लोगों से इतना प्रेम उन्हें इस राज्य की अस्मिता और उसकी भावभूमि से जोड़ता रहा है। श्यामलाल जी उन लोगों में थे जिन्होंने अपनी किशोरावस्था में एक समृद्ध छत्तीसगढ़ का स्वप्न देखा और अपनी आंखों के सामने उसे राज्य बनते हुए और प्रगति के कई सोपान तय करते हुए देखा। आज भी इस माटी की पीड़ा, माटीपुत्रों के दर्द पर वे विहवल हो उठते थे। जब वे अपनी माटी के दर्द का बखान करते थे तो उनकी आंखें पनीली हो जाती थीं, गला रूंध जाता था और इस भावलोक में सभी श्रोता शामिल हो जाते थे। अपनी कविताओं के माध्यम से इसी लोकजीवन की छवियां बार-बार पाठकों को प्रक्षेपित करते रहे हैं। उनका समूचा लेखन इसी लोक मन और लोकजीवन को व्यक्त करता रहा है। उनकी पत्रकारिता भी इसी लोक जीवन से शक्ति पाती रही है। युगधर्म और नई दुनिया के संवाददाता के रूप में उनकी लंबी सेवाएं आज भी छत्तीसगढ़ की एक बहुत उजली विरासत है।
सच कहने का साहस और सलीकाः   
पं. श्यामलाल जी में सच कहने का साहस और सलीका दोनों मौजूद थे। वे कहते तो बात समझ में आती थी। कड़ी से कड़ी बात वे व्यंग्य में कह जाते थे। सत्ता का खौफ उनमें कभी नहीं रहा। इस जमीन पर आने वाले हर नायक ने उनकी बात को ध्यान से सुना और उन्हें सम्मान भी दिया। सत्ता के साथ रहकर भी नीर-क्षीर-विवेक से स्थितियों की व्याख्या उनका गुण था। वे किसी भी हालात में संवाद बंद नहीं करते। व्यंग्य की उनकी शक्ति अप्रतिम थी। वे किसी को भी सुना सकते थे और चुप कर सकते थे। उनके इस अप्रतिम साहस के मैंने कई बार दर्शन किए हैं। उनके साथ होना सच के साथ होना था, साहस के साथ होना था। रिश्तों को बचाकर भी सच कह जाने की कला उन्होंने न जाने कहां से पाई थी। इस आयु में भी उनकी वाणी में जो खनक और ताजगी थी वह हमें विस्मित करती थी।मृत्यु के अंतिम दिन तक उनकी याददाश्त बिलकुल तरोताजा रही। स्मृति के संसार में वे हमें बहुत मोहक अंदाज में ले जाते थे। उनकी वर्णनकला गजब थी। वे बोलते थे तो दृश्य सामने होता था। सत्य को सुंदरता से व्यक्त करना उनसे सीखा जा सकता था। वे अप्रिय सत्य न बोलने की कला जानते थे।
लोक से जुड़ी पत्रकारिताः
   पं.श्यामलाल चतुर्वेदी और उनकी पत्रकारिता सही मायने में लोक से जुड़ी हुई थी। वे लोकमन, लोकजीवन और ग्राम्य जीवन के वास्तविक प्रवक्ता रहे हैं। वे मूलतः एक आंचलिक पत्रकार थेजिनका मन लोक में ही रमता था। वे गांव,गरीब, किसान और लोक अंचल की प्रदर्शन कलाओं को मुग्ध होकर निहारते थे, उन पर निहाल थे और उनके आसपास ही उनकी समूची पत्रकारिता ठहर सी गई थी। उनकी पत्रकारिता में लोकतत्व अनिवार्य रहा है। विकास की चाह, लोकमन की आकांक्षाएं, उनके सपने, उनके आर्तनाद और पीड़ा ही दरअसल श्यामलाल जी पत्रकारिता को लोकमंगल की पत्रकारिता से जोड़ते थे। उनकी समूची पत्रकारिता न्याय के लिए प्रतीक्षारत समाज की इच्छाओं का प्रकटीकरण है।
  लोक में रचा-बसा उनका समग्र जीवन हमें बताता है कि पत्रकारिता ऐसे भी की जा सकती है। वे अध्यापक रहे, और पत्रकारिता से भी जुड़े रहे । नई दुनिया और युगधर्म जैसे अखबारों से जुड़े रहकर उन्होंने अपने परिवेश, समुदाय और क्षेत्र के हितों को निरंतर अभिव्यक्ति दी थी। मूलतः संवाददाता होने के नाते उनके विपुल लेखन का आंकलन संभव नहीं था, क्योंकि संवाददाता खबरें या समाचार लिखता है जो तुरंत ही पुरानी पड़ जाती हैं। जबकि विचार लिखने वाले, लेखमालाएं लिखने वाले पत्रकारों को थोड़ा समय जरूर मिलता है। श्यामलाल जी ने अपने पत्रकारीय जीवन के दौरान कितनी खबरें लिखीं और उनसे क्या मुद्दे उठे क्या समाधान निकले इसके लिए एक विस्तृत शोध की जरूरत है। उनके इस अवदान को रेखांकित किया जाना चाहिए। उनकी यायावरी और निरंतर लेखन ने एक पूरे समय को चिन्हित और रेखांकित किया है, इसमें दो राय नहीं है। अपने कुछ सामयिक लेखों से भी वे हमारे समय में हस्तक्षेप करते रहे हैं।
गुणों के पारखी-विकास के चितेरेः
श्यामलाल जी पत्रकारिता में सकारात्मकता के तत्व विद्यमान हैं। वे पत्रकारिता से प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने की अपेक्षा तो रखते थे किंतु गुणों के पारखी भी थे। उन्होंने अपनी पूरी जीवन यात्रा में सिर्फ खबर बनाने के लिए नकारात्मकता को प्रश्रय नहीं दिया। वे मानते थे कि पत्रकारिता का काम साहित्य की तरह ही उजाला फैलाना है, दिशा दिखाना है और वह दिशा है विकास की, समृद्धि की, न्याय की। अपने लोगों और अपने छत्तीसगढ़ अंचल को न्याय दिलाने की गूंज उनकी समूची पत्रकारिता में दिखती है। वे बोलते, लिखते और जीते हुए एक आम-आदमी की आवाज को उठाते, पहुंचाते और बताते रहे हैं। सही मायने में एक संपूर्ण संचारकर्ता थे। वे एक बेहतर कम्युनिकेटर थे, जो लिखकर और बोलकर दोनों ही भूमिकाओं से न्याय करता था। अपने गांव कोटमी सोनार से आकर बिलासपुर में भी वे अपने गांव, उसकी माटी की सोंधी महक को नहीं भूलते। वे भोपाल, दिल्ली और रायपुर में सत्ताधीशों के बीच भी अपनी वाणी, माटी के दर्द और उसकी पीड़ा के ही वाहक होते थे। वे भूलते कुछ भी नहीं बल्कि लोगों को भी याद दिलाते थे कि हमारी जड़ें कहां हैं और हमारे लोग किस हाल में हैं।
श्रेष्ठ संचारक-योग्य पत्रकारः
 श्यामलाल जी एक योग्य पत्रकार थे किंतु उससे बड़े संचारक या संप्रेषक थे। उनकी संवाद कला अप्रतिम थी। वे लिख रहे हों या बोल रहे हों। दोनों तरह से आप उनके मुरीद हो जाते हैं। कम्युनिकेशन या संचार की यह कला उन्हें विरासत में मिली है और लोकतत्व ने उसे और पैना बनाया है। वे जीवन की भाषा बोलते थे और उसे ही लिखते थे। ऐसे में उनका संचार प्रभावी हो जाता था। वे सरलता से बड़ी से बड़ी बात कह जाते थे और उसका प्रभाव देखते ही बनता था। आज जब कम्युनिकेशन को पढ़ाने और सिखाने के तमाम प्रशिक्षण और कोर्स उपलब्ध हैं, श्यामलाल जी हमें सिखाते थे कि कैसे ‘लोक’ किसी व्यक्ति को बनाता है। श्यामलाल जी इस मायने में विलक्षण थे। हम सबके बीच श्यामलाल जी की उपस्थिति सही मायने में एक ऐसे यात्री की उपस्थिति थी, जिसकी बैचेनियां अभी खत्म नहीं हुई थीं। मृत्यु के अंतिम दिन तक उनकी आंखों में वही चमक, वाणी में वही ओज और जोश मौजूद था जिसका सपना उन्होंने अपनी युवा अवस्था में देखा रहा होगा। आज भी अखबारों या पत्रिकाओं में कुछ अच्छा पढ़कर अपनी नई पीढ़ी की पीठ ठोंकना उन्हें आता था। वे निराश नहीं थे, हताश तो बिल्कुल नहीं। वे उम्मीदों से भरे हुए थे, उनका इंतजार जारी था। एक उजले समय के लिए... एक उजली पत्रकारिता के लिए.. एक सुखी-समृद्ध छत्तीसगढ़ के लिए...आत्मनिर्भर गांवों के लिए.. एक समृध्द लोकजीवन के लिए। क्या हम श्यामलाल जी के सपनों के साथ अपने सपनों को जोड़ने के लिए तैयार हैं?
लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।


मंगलवार, 9 अक्तूबर 2018

किरण बेदी ने किया ‘मीडिया विमर्श’ के तेलुगु मीडिया विशेषांक का विमोचन



चित्र परिचयः पुदुच्चेरी में मीडिया विमर्शके तेलुगु मीडिया विशेषांक के विमोचन के अवसर पर अतिथि संपादक डॉ. सी. जय शंकर बाबु, प्रभात प्रकाशन के अध्यक्ष सह प्रबंध निदेशक प्रभात कुमार, पुदुच्चेरी की उप राज्यपाल डॉ. किरण बेदी,पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. गुरमीत सिंह, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास – भारत के प्रशिक्षण अधिकारी नरेंद्र कुमार, हिंदी विभाग की हिंदी सहआचार्या डॉ. पद्मप्रिया दर्शित हैं ।


पुदुच्चेरी।  जनसंचार के सरोकारों पर केंद्रित भोपाल से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका मीडिया विमर्श के तेलुगु मीडिया विशेषांक का विमोचन पुदुच्चेरी की उप राज्यपाल डॉ. किरण बेदी ने किया । राष्ट्रीय पुस्तक न्यास - भारत के तत्वावधान में पांडिच्चेरी केंद्रीय विश्वविद्यालय में पुस्तक प्रकाशन प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम के अवसर पर इस विशेषांक का विमोचन किया गया ।  पत्रिका के तेलुगु मीडिया विशेषांक के अतिथि संपादक पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. सी. जय शंकर बाबु हैं ।
विमोचन के अवसर पर पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय के प्रो. गुरमीत सिंह, प्रभात प्रकाशन के अध्यक्ष सह प्रबंध निदेशक प्रभात कुमार, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास – भारत के प्रशिक्षण अधिकारी नरेंद्र कुमार, विशेषांक के अतिथि संपादक डॉ. सी. जय शंकर बाबु उपस्थित थे ।।  डेढ़ सौ पृष्टों में तेलुगु मीडिया के सभी आयामों पर हिंदी में समग्र आकलन का यह पहला उल्लेखनीय प्रयास है ।  विशेषांक के विमोचन के अवसर पर डॉ. किरण बेदी, प्रो. गुरमीत सिंह आदि ने पत्रिका के इस विशेषांक की मुक्तकंठ से प्रशंसा की है ।
सितंबर, 2018 के इस अंक मेंतेलुगु मीडिया के लगभग सभी आयामों पर संदर्भ ग्रंथ सरीखे की सामग्री इसमें शामिल हैं ।  तेलुगु पत्रकारिता के कई विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुत इतिहास, शोध आलेख, विश्लेषण-मूल्यांकन, साक्षात्कार आदि प्रकाशित हैं ।  इतिहास-विकास स्तंभ के अंतर्गत तेलुगु पत्रकारिता के ऐतिहासिक विवेचन के साथ-साथ राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान देनेवाले पत्रों, पत्रकारों का आकलन प्रस्तुत है ।  पत्रकारिता स्तंभ के अंतर्गत उन आरंभिक पत्रकारों के योगदान का अकलन प्रस्तुत है, जिन्होंने तेलुगु पत्रकारिता के विकास में कई रूपों में योग दिया था ।  तेलुगु साहित्यिक पत्रकारिता के सभी आयामों पर विश्लेषण करनेवाले दो आलेख साहित्यिक-पत्ररकारिता के स्तंभ में प्रकाशित हैं ।  तेलुगु मीडिया के विविध आयामों के मूल्यांकन-विश्लेषण पर केंद्रित चार आलेख प्रकाशित हुए हैं ।  तेलुगु मीडिया के भाषा-विमर्श तीन आलेखों में और तेलुगु मीडिया के लिए योगदान देने वाले दिग्गजों के योगदान के संबंध में व्यक्तित्व स्तंभ के अंतर्गत आकलन प्रस्तुत हैं ।  आरंभिक द्विभाषी पत्रकार दंपूरु नरसय्या, कंदुकूरु वीरेशलिंगम पंतुलु, पंदिरि मल्लिकार्जुन राव, ईनाडु ग्रूप के संस्थापक एवं प्रधान संपादक सी. रामोजी राव के पत्रकारिता के क्षेत्र के लिए योगदान का विश्लेषण व्यक्तित्व स्तंभ का आकर्षण है । साक्षात्कार स्तंभ के अंतर्गत एस.वी. सूर्यप्रकाश राव, डॉ. नगसूरि वेणुगोपाल, प्रो. सी. मृणालिनी के साक्षात्कार शामिल हैं, जिसमें तेलुगु मीडिया के विविध आयामों पर बेबाक टिप्पणियाँ प्रस्तुत हैं ।  तेलुगु वेब मीडिया के आकलन पर दो आलेख, तेलुगु सिनेमा के विश्लेषण पर तीन आलेख, टेलीविजन पर केंद्रित चार आलेख, विज्ञापनों पर केंद्रित एक आलेख प्रस्तुत हैं ।  इस अंक में तेलुगु मीडिया के विशेषज्ञ विद्वान लेखकों के लेख शामिल हैं, जिनमें डॉ. दण्डिभोट्ला नागेश्वर राव, प्रो. अन्नपूर्णा चेर्ला, रमेश बाबु दर्शि, सी. श्रीवैष्णवी, डॉ. ए.बी. साईप्रसाद, आचार्य दार्ल वेंकटेश्वर राव, डॉ. टी. हैमावती, डॉ. सी. जय शंकर बाबु, गुडिमेट्ला चेन्नय्या, प्रो. टी. रमश्री, डॉ. एम. पवन कुमारी, मन्नव गंगाधर प्रसाद, डॉ. जे. आत्माराम, डॉ. आशा रानी, डॉ. श्री ज्ञानमोटे, के. शांतय्या, सी. विजयेंद्र बाबु, राजेश्वरी केशवपंतुला, डॉ. जया सुरजानी, डॉ. पद्मप्रिया, डॉ. एस. कृष्णबाबु, गरिमा के आलेख शामिल हैं ।  अटल स्मृति पर केंद्रित संस्मरण और स्वतंत्रता दिवस के प्रसंग पर केंद्रित कार्यकारी संपादक प्रो. संजय द्विवेदी के संपादकीय के अलावा स्याही की एक बूंद लाखों दिमागों को हिला सकती है.... शीर्षक से अतिथि संपादक की ओर से प्रकाशित भूमिका तेलुगु मीडिया के विविध आयामों पर संक्षिप्त आकलन में प्रस्तुत विशेषांक का संक्षिप्त परिचय और तेलुगु भाषा की विशिष्टता पर समग्र चिंतन पर केंद्रित है।

शनिवार, 18 अगस्त 2018

भारतीय राष्ट्रवाद के प्रखर प्रवक्ता अटल जी


भारतीय प्रतिपक्ष के सबसे चमकदार नेता, जिसने कभी अपनी प्रासंगिकता नहीं खोयी
-प्रो.संजय द्विवेदी



         अटलजी नहीं रहे। पिछले दस वर्षों से सार्वजनिक जीवन में उनकी अनुपस्थिति के बाद भी मन को यही सूचना भरोसा देती थी कि वे हैं और हमारे बीच हैं। उनका मौन भी इतना मुखर था कि उनकी अनुपस्थिति कभी खली ही नहीं। वे हम सब भारतीयों के मन में ऐसे रचे-बसे थे कि लगता था कि जब हमें जरूरत होगी वे जरूर बोल पड़ेगें। पिछले छः दशकों से उनकी समूची सार्वजनिक जीवन की यात्रा में भारत और देश-देशांतर को नापती हुयी उनकी अनेक छवियां हैं। पूरे भारत को उन्होंने मथ डाला था। सार्वजनिक जीवन में उपस्थित वे एक ऐसे यायावर थे जिनमें निरंतर संवाद करने की शक्ति थी। वे ही थे जो भाषणों से, लेखों से, कविताओं से और देहभाषा से देश को संबोधित करते और चमत्कृत करते आ रहे थे। हर व्यक्ति का समय होता है। जब वह शिखर पर होता है। लेकिन अटल जी का कोई समय ऐसा नहीं था, जब वे घोर नेपथ्य में रहें हों। वे भारतीय प्रतिपक्ष के सबसे चमकदार नेता थे, जिसने कभी अपनी प्रासंगिकता नहीं खोयी। पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरु से लेकर डा. मनमोहन सिंह को सत्ता सौंपने तक वे जीवंत, प्राणवान, स्फूर्त और प्रासंगिक बने रहे।  
       अटलजी भारतीय राष्ट्रवाद की सबसे प्रखर और मुखर प्रवक्ता थे। उन्होंने अपनी युवावस्था में जिस विचार को स्वीकार किया, उसका जीवन भर साथ निभाया। सही मायनों में वे विचारधारा के प्रति अविचल प्रतिबद्धता के भी उदाहरण हैं। एक विचार के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर देने की भावना से वे ताजिंदगी लैस रहे। उन्होंने जो कहा उसे जिया और अपने जैसै हजारों लोग खड़े किए। एक पत्रकार, संपादक, लेखक, कवि, राष्ट्रनेता, संगठनकर्ता, संसदविद्, हिंदीसेवी, प्रखर वक्ता, प्रशासक जैसी उनकी अनेक छवियां हैं और वे हर छवि में पूर्ण हैं। इस सबके बीच उनकी सबसे बड़ी पहचान यही है कि वे भारतीय राष्ट्रवाद के हमारे समय के सबसे लोकप्रिय नायक हैं। वे अपने हिंदुत्व पर गौरव करते हुए भारतीयता की समावेशी भावना के ही प्रवक्ता हैं। शायद इसीलिए वे लिख पाते हैं-
होकर स्वतंत्र मैंने कब चाहा है कर लूं सब को गुलाम
मैंने तो सदा सिखाया है करना अपने मन को गुलाम। 
गोपालराम के नामों पर कब मैंने अत्याचार किया
कब दुनिया को हिंदू करने घरघर में नरसंहार किया
कोई बतलाए काबुल में जाकर कितनी मस्जिद तोड़ी
भूभाग नहीं, शतशत मानव के हृदय जीतने का निश्चय। 
हिंदू तनमन, हिंदू जीवन, रगरग हिंदू मेरा परिचय!
     भारतीय राजनीति में होते हुए भी अटल जी राजनीति की तंग सीमाओं से नहीं घिरे। वे व्यापक हैं, विस्तृत हैं और अपने विचारों में भारतीय जीवन मूल्यों का अवगाहन करते हैं। उनकी सोच पूरी सृष्टि के लिए है, वे भारत की आत्मा में रचे-बसे हैं। इसीलिए वे हमें अपने जीवन से भी सिखाते हैं और वाणी से भी। उनकी वाणी, जीवन और कृति हमें भारतीयता का ही पाठ देते हैं। वे अपनी भाव-भंगिमा, सरलता और व्यवहार से भी सिखाते हैं। भारत उनकी वाणी में, उनकी सांसों में पलता है। भारतीयता को वे अपने तरीके से पारिभाषित करते रहे हैं। उनमें हिंदुत्व का आग्रह था पर वे जड़वादी या कट्टर कहीं से भी नहीं हैं। वे हिंदुत्व को उसके सही संदर्भों में समझते और व्याख्यायित करते हैं। अपनी कविता में वे लिखते हैं-
मैं अखिल विश्व का गुरु महान, देता विद्या का अमरदान। 
मैंने दिखलाया मुक्तिमार्ग, मैंने सिखलाया ब्रह्मज्ञान। 
मेरे वेदों का ज्ञान अमर, मेरे वेदों की ज्योति प्रखर। 
मानव के मन का अंधकार, क्या कभी सामने सका ठहर
   अटलजी भारतप्रेमी हैं। वे भारतीयता और हिंदुत्व को अलग-अलग नहीं मानते। उनके लिए भारत एक जीता जागता राष्ट्रपुरूष है। वे अपनी कविताओं में प्रखर राष्ट्रवादी स्वर व्यक्त करते हैं। उनकी राजनीति भी इसी भाव से प्रेरित है। इसलिए उनका दल यह कह पाया- दल से बड़ा देश। राष्ट्र के लिए सर्वस्व अर्पित कर देने की भावना वे बार-बार व्यक्त करते हैं। भारत का सांस्कृतिक एकता और उसके यशस्वी भूगोल को वे एक कविता के माध्यम से व्यक्त करते हैं।  वे लिखते हैं -
भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,/ जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।…..
इसका कंकर-कंकर शंकर है,/ इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये,/ मरेंगे तो इसके लिये।
     अटलजी मूलतः कवि और पत्रकार हैं। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में थे और उन्हें पं. दीनदयाल उपाध्याय राजनीति में ले आए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वे प्रतिबद्ध स्वयंसेवक रहे। ताजिंदगी राष्ट्र प्रथम उनका जीवन मंत्र रहा। राजनीति की काली कोठरी में भी वे निष्पाप और निष्कलंक रहे। अपने समावेशी भारतीय चरित्र की छाप उन्होंने राजनीति पर भी छोड़ी। गठबंधन सरकारों को चलाने का अनुपम प्रयोग किया। 1967 में संविद सरकारें बनीं, 1977 में जनता प्रयोग, नवें दशक में वीपी सिंह की जनता दल सरकार और बाद में वे खुद इस प्रयोग के सर्वोच्च नायक बने। वे पांच साल सरकार चलाने वाले पहले गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री बने। उनके व्यक्तित्व ने ही यह संभव किया था कि विविध विरोधी विचारों को साथ लेकर वे चल सके। लंबे समय तक प्रतिपक्ष के नेता के नाते उनकी भाषणकला, कविता का कौशल उनकी पूरी राजनीति पर इस तरह भारी है कि उनके राजनायिक कौशल, कूटनीतिक विशेषताओं और सुशासन की पहल करने वाले प्रशासक की उनकी अन्य महती भूमिकाओं पर नजर ही नहीं जाती। जबकि एक विदेशमंत्री और प्रधानमंत्री के नाते की गयी उनकी सेवाओं का तटस्थ मूल्यांकन और विश्लेषण जरूर किया जाना चाहिए। उनके व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हुए हमें उनकी कई विशेषताओं का पता लगता है।  अब समय आ गया है कि उनकी इन विशिष्टताओं का मूल्यांकन जरूर करना चाहिए।
     संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को गुंजायमान करने के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। विदेश मंत्री के रूप में दुनिया के तमाम देशों के साथ उन्होंने जिस तरह से रिश्ते बनाए वे उन्हें एक वैश्विक राजनेता के तौर पर स्थापित करते हैं। प्रधानमंत्री के रूप में सड़कों का संजाल बिछाने और संचार क्रांति खासकर मोबाइल क्रांति के जनक के रूप में उन्हें याद किया जाना चाहिए। विकास और सुशासन उनके शासन के दो मंत्र रहे। यहां यह बात भी खास है कि उन्होंने भारतीय राजनीति को धर्म-जाति और क्षेत्रवाद की गलियों से निकाल कर विकास  और सुशासन के दो मंत्रों के आधार खड़ा करने की कोशिश की। एक राष्ट्रवादी व्यक्तित्व किस तरह राष्ट्र के बड़े सवालों को केंद्र में लाकर सामान्य मुद्दों को किनारे करता है वे इसके उदाहरण हैं। समन्वयवादी राजनीति और क्षेत्रीय आकांक्षाओं की पुष्टि करते हुए जिस तरह वे बिना विवाद के तीन राज्यों (उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़) का गठन करते हैं, वह भी उनके नेतृत्व कौशल का ही कमाल था। पोखरण में परमाणु विस्फोट उनकी राजनीतिक दृढृता का उदाहरण ही था। इसी के साथ प्रख्यात वैज्ञानिक  डा.एपीजे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनाकर उन्होंने यह साबित किया कि भारतीयता के नायकों को सम्मान  देना जानते हैं और कहीं से संकुचित और कट्टर नहीं हैं। भारतीय राजनीति को उन्होंने यह भी संदेश दिया कि हमारे मुस्लिम समाज से हमें कैसे नायकों का चयन करना चाहिए?  आप कल्पना करें कि अटल जी जैसा प्रधानमंत्री और डा. कलाम जैसा राष्ट्रपति हो तो विश्वमंच पर देश कैसा दिखता रहा होगा। इसे अटल जी ने संभव किया। यह एक गहरी राजनीति थी और इसके राष्ट्रीय अर्थ भी थे। किंतु यह थी राष्ट्रीय और राष्ट्रवादी राजनीति।
     काश्मीर के सवाल पर बहुत दृढ़ता से उन्होंने जम्हूरियत, काश्मीरियत और इंसानियत का नारा दिया। पाकिस्तान से बार-बार छल के बाद भी वे बस से इस्लामाबाद गए और बाद में कारगिल में उसे मुंहतोड़ जवाब भी दिया। लेकिन संवाद नहीं छोड़ा क्योंकि वे संवाद नायक थे। किसी भी स्थिति में संवाद की कड़ी न टूटे, वे इस पर विश्वास करते थे। संवाद के माध्यम से हर समस्या हल हो सकती है, वे इस मंत्र पर भरोसा करते थे। उनकी बातें आज भी इसलिए कानों में गूंजती हैं। वे संकटों से मुंह फेरने वालों में नायकों में न थे। वे संवाद से संकटों का हल खोजने में भरोसा रखते थे। इसीलिए पिछले दस सालों का उनका मौन भी एक संवाद था। उनकी छः दशकों की तपस्या मुखर थी। भारत के लगभग हर शहर और तमाम गांवों तक फैली उनकी यादें, संवाद और भाषण लोगों की स्मृतियों में हैं। वे नहीं हैं, पर हैं। दिल्ली ही नहीं, देश का हर नागरिक अगर उनकी अंतिम यात्रा में खुद को शामिल करना चाहता था तो यह भी अकारण नहीं था। पांच लाख लोग दिल्ली की सड़कों पर थे। देश के ताकतवर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अटलजी के तमाम अनुयायी राजपुरुष अगर पांच किलोमीटर पैदल चलकर उन्हें विदा देते हैं तो यह सामान्य बात नहीं है।  उनके प्रति भावनाओं का ज्वार सिर्फ दिल्ली नहीं समूचे देश में था, जहां लोग टीवी चैनलों, मोबाइल की स्क्रीनों पर चिपके अपने प्रिय नेता की अंतिम यात्रा को देख रहे थे। यह भी साधारण नहीं था कि पिछले चौदह सालों से नेपथ्य में जा चुके एक नेता के लिए यह दीवानगी युवाओं में भी देखी गयी। ऐसे युवा जो अभी 18-20 के हैं, जिन्होंने अटलजी को न देखा है, न सुना है। उनके प्रधानमंत्री पद पर रहते ये युवा चार या पांच साल के रहे होगें। किंतु यह संभव हुआ और लोग खुद को उनसे जोड़ पाए। भारतरत्न अटल जी इस योग्य थे, इसलिए लोग उनसे खुद को संबद्ध(कनेक्ट) पाए। संवाद के अधिपति को खामोश देखकर, देश मुखर हो गया। देश की आंखें गीली थीं। प्रकृति ने उनकी अंतिम यात्रा के समय नम आँखों से विदाई दी। बारिश की बूंदें दिल्ली के दर्द में यूं ही शामिल नहीं हुयीं। राष्ट्रवादी नायक की विदाई पर समूचे राष्ट्र की पनीली थीं। अटल जी ने खुद का परिवार नहीं बसाया, किंतु उनकी अंतिम यात्रा ने साबित किया कि वे एक महापरिवार के महानायक थे। यह परिवार है- एक सौ पचीस करोड़ भारतीयों का परिवार।

बुधवार, 20 जून 2018

विश्व योग दिवस

https://www.youtube.com/watch?v=rZHwqgsLN54&feature=share

मंगलवार, 22 मई 2018

वरिष्ठ पत्रकार एवं विचारक श्री माधव गोविंद वैद्य आज डी.लिट् की मानद उपाधि से अलंकृत होगें

वरिष्ठ पत्रकार मा. गो. वैद्य को नागपुर जाकर डी.लिट. सौंपेंगे कुलपति
दीक्षांत समारोह में उपराष्ट्रपति श्री एम. वैंकैया नायडू ने की थी घोषणा

भोपाल, 23 मई। वरिष्ठ पत्रकार एवं विचारक श्री माधव गोविंद वैद्य को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति श्री जगदीश उपासने नागपुर स्थित उनके निवास पर जाकर 23 मई, बुधवार को विद्या वाचस्पति (डी. लिट.) की मानद उपाधि से सम्मानित करेंगे। इस अवसर पर आयोजित सम्मान समारोह में विश्वविद्यालय के कुलाधिसचिव श्री लाजपत आहूजा और कुलसचिव प्रो. संजय द्विवेदी सहित नागपुर के प्रमुख पत्रकार भी उपस्थित रहेंगे।
उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश विधानसभा के सभागृह में 16 मई को आयोजित दीक्षांत समारोह में भारत के उपराष्ट्रपति एवं विश्वविद्यालय के कुलाध्यक्ष श्री वैंकैया नायडू ने श्री वैद्य को मानद उपाधि दिए जाने की घोषणा की थी। स्वास्थ्यगत कारणों से श्री वैद्य दीक्षांत समारोह में उपस्थित नहीं हो सके थे। विश्वविद्यालय ने निर्णय लिया है कि 23 मई, बुधवार को कुलपति श्री जगदीश उपासने श्री वैद्य को नागपुर स्थित उनके निवास पर जाकर विद्या वाचस्पति की मानद उपाधि से सम्मानित करेंगे। श्री माधव गोविंद वैद्य लंबे समय से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं। उनका जन्म महाराष्ट्र में 11 मार्च, 1923 को हुआ था। प्रारंभ में श्री वैद्य नागपुर के महाविद्यालय में प्राध्यापक रहे। बाद में उन्होंने वर्ष 1966 से 1983 तक लोकप्रिय समाचार पत्र 'तरुण भारत' का संपादन किया। श्री वैद्य ने कई प्रमुख पुस्तकों का लेखन एवं संपादन किया है।
#MCU_Bhopal

शनिवार, 28 अप्रैल 2018

राष्ट्रवाद से जुड़े विमर्शों को रेखांकित करती एक किताब

पुस्तक समीक्षा

समीक्षकलोकेन्द्र सिंह
(समीक्षक विश्व संवाद केंद्र,भोपाल के कार्यकारी निदेशक हैं।)



    देश में राष्ट्रवाद से जुड़ी बहस इन दिनों चरम पर है। राष्ट्रवाद की स्वीकार्यता बढ़ी है। उसके प्रति लोगों की समझ बढ़ी है। राष्ट्रवाद के प्रति बनाई गई नकारात्मक धारणा टूट रही है। भारत में बुद्धिजीवियों का एक वर्ग ऐसा हैजो हर विषय को पश्चिम के चश्मे से देखते है और वहीं की कसौटियों पर कस कर उसका परीक्षण करता है। राष्ट्रवाद के साथ भी उन्होंने यही किया। राष्ट्रवाद को भी उन्होंने पश्चिम के दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया। जबकि भारत का राष्ट्रवाद पश्चिम के राष्ट्रवाद से सर्वथा भिन्न है। पश्चिम का राष्ट्रवाद एक राजनीतिक विचार है। चूँकि वहाँ राजनीति ने राष्ट्रों का निर्माण किया हैइसलिए वहाँ राष्ट्रवाद एक राजनीतिक विचार है। उसका दायरा बहुत बड़ा नहीं है। उसमें कट्टरवाद है,जड़ता है। हिंसा के साथ भी उसका गहरा संबंध रहा है। किंतुहमारा राष्ट्र संस्कृति केंद्रित रहा है। भारत के राष्ट्रवाद की बात करते हैं तब 'सांस्कृतिक राष्ट्रवादकी तस्वीर उभर कर आती है। विभिन्नता में एकात्म। एकात्मता का स्वर है- 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद'। इसी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की समझ को और स्पष्ट करने का प्रयास पुस्तक के संपादक प्रो. संजय द्विवेदी ने अपनी पुस्तक 'राष्ट्रवादभारतीयता और पत्रकारिताके माध्यम से किया है। उन्होंने न केवल राष्ट्रवाद पर चर्चा को विस्तार दिया हैअपितु पत्रकारिता में भी 'राष्ट्र सबसे पहलेके भाव की स्थापना को आवश्यक बताया है। 
          यह पुस्तक ऐसे समय में आई हैजब मीडिया में भी राष्ट्रीय विचार 'धाराबहती दिख रही है। हालाँकियह भी सत्य है कि उसका इस तरह दिखना बहुतों को सहन नहीं हो रहा। भारतीयता का विरोधी कुनबा अब राष्ट्रवाद को पहले की अपेक्षा अधिक बदनाम करने का षड्यंत्र रच रहा है। किंतुराष्ट्रवाद का जो ज्वार आया हैउसमें उनके सभी प्रयास न केवल असफल हो रहे हैंबल्कि उसके वेग से उनके नकाब भी उतर रहे हैं। पुस्तक में शामिल 38 आलेख और तीन साक्षात्कारों से होकर जब हम गुजरते हैंतो उक्त बातें ध्यान में आती हैं। संपादक ने यह सावधानी रखी है कि राष्ट्रवादभारतीयता और पत्रकारिता पर समूचा संवाद एकतरफा न हो। वामपंथी विचारक डॉ. विजय बहादुर सिंह अपने लेख 'समझिए देश होने के मायने!में राष्ट्रवाद के संबंध में अपने विचार रखते हैं। वह अपने साक्षात्कार में मुखर होकर कहते हैं कि उन्हें 'राष्ट्र तो मंजूर हैपर राष्ट्रवाद नहीं।इसी तरह जनता दल (यू) के राज्यसभा सांसद और प्रभात खबर के संपादक हरिवंश 'आइएसामूहिक सपना देखेंका आह्वान करते हैं। आजतक के एंकर- टेलीविजन पत्रकार सईद अंसारी 'भारतीयता और पत्रकारिताको अपने ढंग से समझा रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार आबिद रजा ने अपने लेख में यह समझाने का बखूबी प्रयास किया है कि भारतीयता और राष्ट्रीयता एक-दूसरे की पूरक हैं। उनका कहना सही भी है।
          पुस्तक में राष्ट्रवाद का ध्वज उठाकर और सामाजिक जीवन का वृत लेकर चल रहे चिंतक-विचारकों के दृष्टिकोण भी समाहित हैं। विवेकानंद केंद्र के माध्यम से युवाओं के बीच लंबे समय तक कार्य करने वाले मुकुल कानिटकरराष्ट्रवादी विचारधारा के विद्वान डॉ. राकेश सिन्हावरिष्ठ साहित्यकार डॉ. देवेन्द्र दीपक और वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा, रमेश शर्मा जैसे प्रखर विद्वानों ने भारतीय दृष्टिकोण से राष्ट्रवाद को हम सबके सामने प्रस्तुत किया है। भारतीय दृष्टिकोण से देखने पर राष्ट्रवाद की अवधारण बहुत सुंदर दिखाई देती है। भारत का राष्ट्रवाद उदार है। उसमें सबके लिए स्थान है। सबको साथ लेकर चलने का आह्वान भारत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद करता है। इसलिए जिन लोगों को राष्ट्रवाद के नाम से ही उबकाई आती हैउन्हें यह पुस्तक जरूर पढऩी चाहिएताकि वह जान सकें कि राष्ट्र और राष्ट्रवाद को लेकर भारतीय दृष्टि क्या है?
          मीडिया की समाज में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। वह जनता के मध्य मत निर्माण करने में उत्प्रेरक की भूमिका निभाती है। इसलिए मीडिया में कार्य करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है। अक्सर यह कहा जाता है कि लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका एक विपक्ष की तरह है। इस नीति वाक्य को सामान्य ढंग से लेने के कारण अकसर पत्रकार गड़बड़ कर देते हैं। वह भूल जाते हैं कि मीडिया की विपक्ष की भूमिका अलग प्रकार की है। वह सत्ता विरोधी राजनीतिक पार्टी की तरह विपक्ष नहीं है। उसका कार्य है कि वह सत्ता के अतार्किक और गलत निर्णयों पर प्रश्न उठाए, न कि लट्ठ लेकर सरकार और उसके विचार के पीछे पड़ जाए। किंतुआज मीडिया अपनी वास्तविक भूमिका भूल कर राजनीतिक दलों की तरह विपक्ष बन कर रह गया है। जिस तरह विपक्षी राजनीतिक दल सत्ता पक्ष के प्रत्येक कार्य को गलत ठहरा कर हो-हल्ला करते हैंवही कार्य आज मीडिया कर रहा है। दिक्कत यहाँ तक भी नहींकिंतु कई बार मीडिया सत्ता का विरोध करते हुए सीमा रेखा से आगे निकल जाता है। कब सत्ता की जगह देश उसके प्रश्नों के निशाने पर आ जाता हैउसको स्वयं पता नहीं चल पाता है। संभवत: इस परिदृश्य को देखकर ही पुस्तक में 'राष्ट्रवाद और मीडियाविषय पर प्रमुखता से चर्चा की गई है।
         भारतीय शिक्षण मंडल के राष्ट्रीय संगठन मंत्री मुकुल कानिटकर ने जिस तरह आग्रह किया है कि 'प्रसार माध्यम भी कहें पहले भारत', उसी बात को अपन राम ने भी अपने आलेख'पत्रकारिता में भी राष्ट्र सबसे पहले जरूरीमें उठाया है। आज जिस तरह की पत्रकारिता हो रही हैउसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि हमारी पत्रकारिता में भी राष्ट्र की चिंता पहले करने की प्रवृत्ति बढऩी चाहिए। पुस्तक के संपादक प्रो. संजय द्विवेदी ने भी इस बार को रेखांकित किया है- 'उदारीकरण और भूमंडलीकरण की इस आँधी में जैसा मीडिया हमने बनाया हैउसमें 'भारतीयताऔर 'भारतकी उपस्थिति कम होती जा रही है। संपादक का यह कथन ही पुस्तक और उसके विषय की प्रासंगिकता एवं आवश्यकता को बताने के लिए पर्याप्त है। राष्ट्रवाद और मीडिया के अंतर्सबंधों एवं उनकी परस्पर निर्भरता को डॉ. सौरभ मालवीय ने भी अच्छे से वर्णित किया है। 
          पुस्तक के संपादक प्रो. संजय द्विवेदी के इस कथन से स्पष्ट सहमति जताई जा सकती है कि - 'यह पुस्तक राष्ट्रवादभारतीयता और मीडिया के उलझे-सुलझे रिश्तों तथा उससे बनते हुए विमर्शों पर प्रकाश डालती है।' निश्चित ही यह पुस्तक राष्ट्रवाद पर डाली गई धूल को साफ कर उसके उजले पक्ष को सामने रखती है। इसके साथ ही राष्ट्रवादभारतीयता और पत्रकारिता के आपसी संबंधों को भी स्पष्ट करती है। वर्तमान समय में जब तीनों ही शब्द एवं अवधारणाएं विमर्श में हैंतब प्रो. द्विवेदी की यह पुस्तक अत्यधिक प्रासंगिक हो जाती है।

पुस्तक परिचय
पुस्तक : राष्ट्रवादभारतीयता और पत्रकारिता
संपादक : प्रो. संजय द्विवेदी
प्रकाशकः यश पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स
1/10753, सुभाष पार्कनवीन शाहदरादिल्ली-110032
मूल्यः 650 रूपए मात्र (सजिल्द), 250 रूपए मात्र (पेपरबैक)
पृष्ठ : 247
ई-मेल- संपर्कः yashpublicationdelhi@gmail.comjatinyashpublication@gmail.com


गुरुवार, 22 मार्च 2018

एक विलक्षण संपादकः जगदीश उपासने


माखनलाल विश्वविद्यालय के नए कुलपति का है हिंदी पत्रकारिता में खास योगदान
-संजय द्विवेदी



    मीडिया और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में देश के सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा केंद्र माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय,भोपाल के कुलपति के रूप में जब ख्यातिनाम पत्रकार श्री जगदीश उपासने का चयन हो चुका है, तब यह जानना जरूरी है कि आखिर हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका योगदान क्या है? मध्यप्रदेश के इस महत्वपूर्ण विश्वविद्यालय के कुलपति बनने से पूर्व उनकी यात्रा रेखांकित की जानी चाहिए और उम्मीद की जानी चाहिए कि वे इस संस्था को और भी गति से आगे ले जाने में कोई कसर नहीं रखेगें।
कापी के मास्टरः
    हिंदी पत्रकारिता में अंग्रेजी पत्रकारिता की तरह कापी संपादन का बहुत रिवाज नहीं है। अपने लेखन और उसकी भाषा के सौंदर्य पर मुग्ध साहित्यकारों के अतिप्रभाव के चलते हिंदी पत्रकारिता का संकोच इस संदर्भ में लंबे समय तक कायम रहा। जनसत्ता और इंडिया टुडे (हिंदी) के दो सुविचारित प्रयोगों को छोड़कर ये बात आज भी कमोबेश कम ही नजर आ रही है। ऐसे समय में जबकि हिंदी पत्रकारिता भाषाई अराजकता और हिंग्लिश की दीवानी हो रही है, तब हिंदी की प्रांजलता और पठनीयता को स्थापित करने वाले संपादकों को जब भी याद किया जाएगा, जगदीश उपासने उनमें से एक हैं। वे कापी संपादन के मास्टर हैं। हिंदी भाषा को लेकर उनका अनुराग इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि वे मराठीभाषी हैं। उन्होंने हिंदी की सबसे महत्वपूर्ण पत्रिका इंडिया टुडे को स्थापित करने में अपना योगदान दिया। इस तरह वे हिंदी के यशस्वी मराठीभाषी संपादकों सर्वश्री विष्णुराव पराड़कर, माधवराव सप्रे, राहुल बारपुते की परंपरा में अपना विनम्र योगदान जोड़ते नजर आते हैं। इंडिया टुडे के माध्यम से उन्होंने जिस हिंदी को प्रस्तुत किया वह प्रभावी, संप्रेषणीय और प्रांजल थी, वह न तो अनुवादी भाषा थी ना उसमें अंग्रेजी के नाहक शब्दों की घुसपैठ थी। यह एक ऐसी हिंदी थी, जिसके पहली बार दर्शन हो रहे थे- पठनीय, प्रवाहमान और सीधे दिल में उतरती हुयी। सही मायनों में उन्होंने पहली बार देश को हिंदी की सरलता और सहजता के साथ-साथ कठिन से कठिन विषयों को प्रस्तुत करने के सामर्थ्य के साथ प्रस्तुत किया।
शानदार पत्रकारीय पारीः
   जनसत्ता, युगधर्म, हिंदुस्तान समाचार जैसे अखबारों व समाचार एजेंसियों में पत्रकारिता करने के बाद जब वे ‘इंडिया टुडे’ पहुंचे तो इस पत्रिका का दावा देश की भाषा में देश की धड़कन बनने का था। समय ने इसे सच कर दिखाया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्य को टेबलाइट अखबार के बजाए पत्रिका के स्वरूप में निकालने का जब विचार हुआ तो जगदीश उपासने को इसका समूह संपादक बनाया गया। आज पांचजन्य और आर्गनाइजर दोनों प्रकाशन एक नए कलेवर में लोगों के बीच सराहे जा रहे हैं। जनसत्ता को प्रारंभ करने वाली टीम और इंडिया टुडे (हिंदी) की संस्थापक टीम के इस नायक को हमेशा भाषा और उसकी प्राजंलता के विस्तार के लिए जाना जाएगा।
आपातकाल में काटी जेलः
     छत्तीसगढ़ के बालोद कस्बे और रायपुर शहर से अपनी पढ़ाई करते हुए छात्र आंदोलनों और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े जगदीश उपासने ने विधि की परीक्षा में गोल्ड मैडल भी हासिल किया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, मप्र के वे प्रमुख कार्यकर्ताओं में एक थे। आपातकाल के दौरान वे तीन माह फरार रहे तो मीसा बंदी के रूप में 16 महीने की जेल भी काटी । उनके माता-पिता का छत्तीसगढ़ के सार्वजनिक जीवन में खासा हस्तक्षेप था। मां रजनीताई उपासने 1977 में रायपुर शहर से विधायक भी चुनी गयीं। उपासने के पिता श्री दत्तात्रेय उपासने जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, प्रख्यात समाज सेवी थे। उपासने परिवार का राजनीति एवं समाज सेवा में काफी योगदान रहा है। परिवार के मुखिया के नाते श्री दत्तात्रेय उपासने ने आपात काल का वह दौर भी झेला था, जब उनके परिवार के अधिकतर सदस्य जेल में डाल दिए गए थे। संघ परिवार में भी उनका अभिभावक जैसा सम्मान था। जगदीश उपासने के अनुज सच्चिदानंद उपासने आज भी छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं।
       एक राजनीतिक परिवार और खास विचारधारा से जुड़े होने के बावजूद जगदीश जी ने पत्रकारिता में अपेक्षित संतुलन बनाए रखा। इन अर्थों में वे राष्ट्र के समावेशी चरित्र और उदार लोकतांत्रिक व्यक्तित्व का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। वे अपनी विचारधारा पर गर्व तो करते हैं, किंतु कहीं से कट्टर और जड़वादी नहीं हैं। राष्ट्रबोध और राष्ट्र के लोगों के प्रति प्रेम उनमें कूट-कूट कर भरा हुआ है। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को एक ऐसी भाषा दी, जिसमें हिंदी का वास्तविक सौंदर्य व्यक्त होता है।
      उन्होंने कई पुस्तकों का संपादन किया है, जिनमें दस खंडों में प्रकाशित सावरकर समग्र काफी महत्वपूर्ण है। टीवी चैनलों में राजनीतिक परिचर्चाओं का आप एक जरूरी चेहरा बन चुके हैं। गंभीर अध्ययन, यात्राएं, लेखन और व्याख्यान उनके शौक हैं। आज जबकि वे मीडिया में एक लंबी और सार्थक पारी खेल कर माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार  विश्वविद्यालय के कुलपति बन चुके हैं, तो भी वे रायपुर के अपने एक वरिष्ठ संपादक स्व. दिगंबर सिंह ठाकुर को याद करना नहीं भूलते, जिन्होंने पहली बार उनसे एक कापी तीस बार लिखवायी थी। वे प्रभाष जोशी, प्रभु चावला और बबन प्रसाद मिश्र जैसे वरिष्ठों को अपने कैरियर में दिए गए योगदान के लिए याद करते हैं, जिन्होंने हमेशा उन्हें कुछ अलग करने को प्रेरित किया।


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)