शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

एक अराजनैतिक प्रधानमंत्री


अपनी योग्यताओं के बावजूद बहुत औसत राजनेता साबित हुए मनमोहन
-संजय द्विवेदी

मनमोहन सिंह की सफलताएं देखकर लगता है कि आखिर वे इतने बड़े कैसे हो पाए, तो फिलहाल दो ही कारण समझ में आते हैं एक उनका भाग्य और दूसरा श्रीमती सोनिया गांधी। किंतु इन दोनों कारणों से ही कुर्सी पाने के बावजूद भी वे इस अवसर को एक सौभाग्य में बदल सकते थे- इसका कारण यह है कि उनके पास ईमानदारी और विद्वता की एक ऐसी विरासत थी जिसका संयोग आज की राजनीति में दुर्लभ है। अब जबकि वे एक लंबा कार्यकाल पाने वाले देश के तीसरे प्रधानमंत्री बन चुके हैं तो भी उनके पास उपलब्धियों का खाता खाली है। पिछले चुनावों में उनकी जिस शुचिता, ईमानदारी और भद्रता पर मुग्ध देश ने भाजपा दिग्गज लालकृष्ण आडवानी के एक तर्क नहीं सुने और मनमोहन सिंह की वापसी पर मुहर लगाई, आज देश अपने प्रधानमंत्री से खासा निराश दिखता है। अपने व्यक्तिगत गुणों के कारण अगर वे चाहते तो लालबहादुर शास्त्री की तरह एक बड़ी रेखा खींच सकते थे, जबकि शास्त्री जी को समय बहुत कम मिला था। किंतु मनमोहन सिंह पूरे साढ़े छः बाद भी एक बहुत औसत राजनेता के रूप में ही सामने आते हैं।
परमाणु करार बिल को पास कराने के समय और पिछले लोकसभा चुनावों में जिस तेवर का उन्होंने परिचय दिया था उससे लगता था कि मनमोहन सिंह बदल रहे हैं। पर अब यह लगने लगा है कि वे कांग्रेस के युवराज की ताजपोशी तक एक प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री ही हैं, जो राज नहीं कर रहा अपना समय काट रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि मनमोहन सिंह की अपार योग्यताओं के बावजूद उनकी क्षमताएं किसी मोर्चे पर प्रकट होती नहीं दिखतीं। वे दुनिया को मंदी से उबरने के मंत्र बता रहे हैं। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा कह रहे हैं कि डा. मनमोहन सिंह जब बोलते हैं दुनिया उनकी बातों को ध्यान से सुनती है। तो क्या कारण है कि यह भारतीय प्रधानमंत्री अपने देश के सवालों पर खामोश है? क्या कारण है कि हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के पास देश में फैली महंगाई का कोई हल, कोई समाधान नहीं है ? आखिर क्या कारण है कि कश्मीर के संकट को विकराल होते जाने देने के लगभग दो महीने बाद वे नींद से जागते हैं और स्वायत्तता का झुनझुना लेकर सामने आते हैं? क्या कारण है कि नक्सलवाद के सवाल पर सरकार के बीच ही इतने किंतु-परंतु हैं जिसका लाभ हिंसक आंदोलन से जुड़ी ताकतें उठाकर अपना क्षेत्र विस्तार कर रही हैं? कांग्रेस के कुछ दिग्गज और एक केंद्रीय मंत्री नक्सल आंदोलन के प्रति सहानुभूति के बोल कह देते हैं पर हमारे प्रधानमंत्री कुछ नहीं कहते। जयराम रमेश और प्रफुल्ल पटेल की भिडंत से उन्हें कुछ फर्क नहीं पड़ता। द्रुमुक के मंत्रियों के कदाचार उन्हें नहीं दिखते। क्या कारण है पूर्वांचल का एक राज्य मणिपुर महीने पर तक नाकेबंदी झेलता है पर हमारी दिल्ली की सरकार को फर्क नहीं पड़ता। क्या कारण है कि कश्मीर में सिखों को यह धमकी जा रही है कि वे इस्लाम स्वीकारें अथवा घाटी छोड़ें पर हमारी सरकार के पास इस मामले में सिर्फ आश्वासन हैं। परमाणु जवाबदेही कानून के मामले में लगता है कि राजनीतिक विमर्श के बजाए सरकार सौदेबाजी कर रही है। नहीं तो क्या कारण है कि कुछ समय पहले जब केंद्र सरकार इस विधेयक को लाई थी तो उसका कड़ा विरोध हुआ था। अब कांग्रेस-भाजपा दोनों इस विषय पर एक हो गए हैं। सबसे गंभीर एतराज संयंत्र के लिए मशीनों और कलपुर्जों की सप्लाई करने वाली विदेशी कंपनियों को जवाबदेही से मुक्त करने पर है।ऐसी ही कुछ राहत भोपाल गैस त्रासदी की आरोपी कंपनी को दी गयी है। ऐसा लगता है कि हमारी सरकारों के फैसले संसद में नहीं वाशिंगटन से होते हैं। ऐसी सरकार किस मुंह से एक लोककल्याणकारी सरकार होने का दावा करती है। एक तरफ तो यह सरकार गांधी से अपना रिश्ता जोड़ते नहीं थकती वहीं गांधी जयंती के मौके पर खादी पर मिलने वाली 20 प्रतिशत सब्सिडी वापस ले लेती है। उसे खादी ग्रामोद्योग को दी जा रही सब्सिडी भारी लगती है, किंतु विदेशी कंपनियों के लिए सरकार सब तरह की छूट देने के लिए आतुर है। लगता ही नहीं कि देश में हम भारत के लोगों की सरकार चल रही है।
प्रधानमंत्री अगले माह 78 साल के हो रहे हैं, क्या ये माना जाए कि उन पर आयु हावी हो रही है या वे अब अपने आपको इस तंत्र में मिसफिट पा रहे हैं और मानने लगे हैं कि राहुल गांधी का प्रधानमंत्री के रूप में अवतार ही देश के सारे संकट हल करेगा। देश की जनता ने उन्हें लगातार ‘कमजोर प्रधानमंत्री’ कहे जाने के बजाए उन पर भरोसा जताते हुए, न सिर्फ जिताया वरन वरन पिछले दो दशकों में यह कांग्रेस का बेहतरीन प्रदर्शन था। प्रधानमंत्री अपनी पहली पारी में तमाम वामपंथी दलों और नासमझ दोस्तों से घिरे थे, इस बार वह संकट भी नहीं है। आखिर फिर क्यों उन्हें फैसले लेने में दिक्कतें आ रही हैं। वे आखिर क्यों अपने आपको एक अनिर्णय से घिरे रहने वाले नेता के रूप में खुद को स्थापित कर रहे हैं। अपनी व्यक्तिगत ईमानदारी के बावजूद उनकी सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी है। जिन राष्ट्रमंडल खेलों में प्रकट भ्रष्टाचार हुआ उनको वे अपने भाषण में देश का गौरव बता आए। भोपाल गैस त्रासदी से लेकर जातिगण जनगणना हर सवाल पर सरकार का नेतृत्व कहीं नेतृत्वकारी भूमिका में नजर नहीं आया। यह जानते हुए भी कि यह उनके राजनीतिक एवं सार्वजनिक जीवन का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण पारी है, डा. मनमोहन सिंह ऐसा क्यों कर रहे हैं, यह एक आश्चर्य की बात है। यूं लगने लगा है जैसे वास्तव में उनका नौकरशाह अतीत उनपर हावी हो और अनिर्णय को ही निर्णय मानने की कुशल अफसरशाही के मंत्र को ही उन्होंने अपना आर्दश बना रखा है। यह भी संभव है कि हमारे प्रधानमंत्री क्योंकि जनता के बीच से नहीं आते और उनके सामने जनसमर्थन जुटाने की वैसी चुनौती नहीं है जो आम तौर पर नेताओं के पास होती है, तो वे जनता के प्रश्नों को बहुत महत्व का न मानते हों। क्योंकि संयोग से कांग्रेस के पास जनसमर्थन जुटाने की जिम्मेदारी वर्तमान प्रधानमंत्री की नहीं है , गांधी परिवार के उत्तराधिकारियों पर है। पिछले कार्यकाल में परमाणु करार को पास कराने के प्रधानमंत्री की जो ताकत, बेताबी और उत्साह नजर आया था तो ऐसा लगा था कि डा. मनमोहन सिंह ने अपने पद की ताकत को पहचान लिया है। किंतु वह सारा कुछ करार पास होने के बाद हवा हो गया। शायद अमरीका से किए वायदे चुकाने का जोश उनमें ज्यादा था किंतु जनता से किए वायदे हमारे नेताओं को याद कहां रहते हैं। शायद यही कारण है कि आज की राजनीति में जनता का एजेंडा हाशिए पर है। मनमोहन सिंह की सरकार इसलिए अपने दूसरे कार्यकाल के पहले साल में ही निराश करती नजर आ रही है। कांग्रेस नेतृत्व ने भले ही एक अराजनैतिक प्रधानमंत्री का चयन किया है उसे जनता की भावनाएं भी समझनी होंगी। यदि वर्तमान शासन एवं प्रधानमंत्री को अलोकप्रिय कर, कांग्रेस के युवराज को कमान संभालने और उनके जादुई नेतृत्व की आभा से सारे संकट हल करने की योजना बन रही हो तो कुछ नहीं कहा जा सकता। किंतु ऐसा थकाहारा, दिशाहारा नेतृत्व आखिर हमारे सामने मौजूद चुनौतियों और संकटों से कैसे जूझेगा। देश को फिलहाल प्रतीक्षा ऐसे नेतृत्व की है जो उसके सामने मौजूद प्रश्नों के ठोस और वाजिब हल तलाश सके। गंभीर मसलों पर हमारा मौन देश की जनता में निराशा और अवसाद भर रहा है। क्या श्रीमती सोनिया गांधी भी इसे महसूस कर रही हैं ?

7 टिप्‍पणियां:

  1. अब सुई से तलवार का काम लेंगे तो कैसे चलेगा. सिंह साहिब योग्य और ईमानदार नोकरशाह है - इस बात को सिर्फ सोनिया गाँधी नें पहचाना और प्रधानमंत्री के पद से नवाज़ दिया.

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  2. संजय जी हमेशा की तरह इस बार भी आपने बहुत ही अलग विषय पर लेख लिखा . साधुवाद .लोगो के बीच रहकर उनकी मन की थाह पाना और अपने लेखों में उन विषयों को उठाना और फिर प्रश्न करना , ये कमाल सिर्फ आप ही कर सकते है . बहुत ही अच्छा लेख लिखा गया है मनमोहन सिंह को प्रधान मंत्री के रूप में जनता कभी भी दिल से स्वीकार नहीं कर पायी .मेरा निजी तौर पर मानना है की व्यक्ति कितना भी ज्ञानवान क्यों न हो लेकिन उसके व्यक्तित्व में प्रभाव होना चाहिए
    और यदि वो देश का प्रधानमन्त्री है तो उसे कुशल वक्ता . कुशल संचारक और जनता के दिल तक पहुंचने की कला आनीचाहिए
    मुझे तो लगता है जो पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े प्रधानमंत्री यदि होते तो वो जनता के ज्यादा करीब होते , सोते सोते से राजा हो तो देश भी सोया सा लगता है राजा उत्साही और हंसमुख होना चाहिए -सोनिया जी क्या समझे हम भारतियों को रोटी मिले ना मिले इक सच्ची हंसी और ईमानदार मुस्कराहट पर हम भारतीय दिन भर खुश रह सकते है सोनिया जी खुद भी तो प्लास्टिक की हंसी हंसती है

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  3. बहुत सही और सटीक लेखन, आभार ।

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  4. सुन्दर पोस्ट, छत्तीसगढ मीडिया क्लब में आपका स्वागत है.

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  5. लम्‍बा आलेख था, बाते वहीं थी जो आज आम व्‍यक्ति महसूस कर रहा है। मेरा यह मानना है कि प्रत्‍येक कमजोर व्‍यक्ति ऐसे पदाधिकारी नियुक्‍त करता है जो उससे अधिक कमजोर हों। इसलिए सोनिया गांधी जिन्‍हें राजनैतिक समझ शून्‍य हैं को मनमोहन सिंह जी से अच्‍छे विश्‍वसनीय व्‍यक्ति अन्‍य नहीं मिल सकते थे। देश की समस्‍याओं से तो वैसे भी कांग्रेस का कोई वास्‍ता नहीं रहा है तो अभी भी ना हो तो कोई हैरत नहीं होती। वे तो स्‍वयं कहते हैं कि हम तो केवल राज करना जानते हैं। दुर्भाग्‍य इस देश का है कि अन्‍य दल राज करना नहीं जानते इसलिए घूम फिर कर कांग्रेस वापस आ जाती है। अन्‍त में एक बात और कि आपने लिखा कि ओबामा ने कहा कि मनमोहन सिंह को बड़े ध्‍यान से सुनते हैं लोग तो भाई ध्‍यान से सुनेंगे तभी तो कुछ समझ आएगा ना?

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