रविवार, 6 जुलाई 2014

मौसम की तरह तुम भी बदल तो न जाओगे


-संजय द्विवेदी
    उनका संकट यह है कि उन्हें अरसे बाद देश में एक ऐसी सरकार का नेतृत्व करने का अवसर मिला है, जो पूर्ण बहुमत की सरकार है। जिसके साथ प्रबल जनादेश और जनांकांक्षाएं संयुक्त हैं। जाहिर तौर पर समर्थ राजनीतिक नेतृत्व के बिना दस साल तक चली यूपीए सरकार के मुकाबले वे ज्यादा आदमकद और सरोकारी राजनेता हैं। गुजरात में अपने कामकाज और बेहद धारदार चुनाव अभियान चलाकर वे वैसे भी आकांक्षाओं का विस्तार जरूरत से ज्यादा कर चुके हैं। नरेंद्र मोदी का वर्णन इससे ज्यादा भी किया जा सकता है, किंतु मोदी अब केंद्रीय सत्ता में हैं जो उनके लिए एक अनजानी जगह है।
   यहां यह भी स्वीकारना होगा कि उनके विरोधी बेहद चतुर-चालाक और सत्ता संविमर्श में दशकों से लगे हुए लोग हैं। वे इतने टीवी और मीडिया चपल हैं कि एक महीने में ही अच्छे दिन आने वाले हैं के नारे को एक मजाक में बदल चुके हैं। यह देखना भी रोचक है कि मप्र से लेकर दिल्ली तक कांग्रेस अब महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़क पर संघर्ष कर रही है। तो क्या महंगाई अलग-अलग होती है? मनमोहन और मोदी की महंगाई का अंतर क्या है? जाहिर तौर पर जनता को इन सवालों से मतलब नहीं होता, उसे राहत चाहिए, जीवन जीने की न्यूनतम जरूरतें पूरी होनी चाहिए। उसे राज और ताज बदलने से बहुत मतलब नहीं होता। उसने बदलाव इसी आशा से किया है कि उसके अच्छे दिन आएंगें। क्योंकि चुनावी मैदान में यह वादा करने वाले मोदी अकेले थे इसलिए जनता ने उनके सर्वाधिक सांसदों को चुनकर भेजा। शेष राजनीतिक दल महंगाई, भ्रष्टाचार और निर्णयहीनता से लड़ने के बजाए मोदी को रोकने में लगे थे, ऐसे में मोदी को वे अतिरिक्त ताकत और सहानुभूति दोनों दे रहे थे। इस अभूतपूर्व चुनाव के परिणाम बताते हैं कि लोग आज भी उम्मीदों से खाली नहीं हैं और वे एक नई तरह की राजनीति को जन्म देना चाहते हैं। राजनीतिक दलों के तमाम किंतु-परंतु के बावजूद देश की जनता एक नई राजनीतिक शैली को पसंद कर रही है और उसे ताकत दे रही है।
   एक विशाल देश की आकांक्षाएं और सपने जाहिर तौर पर एक नहीं हो सकते। दिल्ली को इसे समझकर कदम उठाने होंगें किंतु देश आगे बढ़े और जनता का एजेंडा राजनीति का भी एजेंडा बने यह सोच सबकी है। सत्ता पर नियंत्रण और राजनीतिक दलों पर सामाजिक समूहों का निरंतर दबाव जरूरी है। वरना सत्ता मनमाने व्यवहार से जनविरोधी चरित्र जल्दी ही ओढ़ लेती है। पांच साल का जनादेश उसे शासन करने का प्रमाणपत्र लगने लगता है। एक अतिरिक्त अहंकार के बोझ से दबी हमारी राष्ट्रीय राजनीति और नौकरशाही की नजर में हम भारतीय सबसे निकम्मे,काहिल और बेईमान लोग दिखने लगते हैं। दिल्ली में बैठे राजपुत्रों को दो समय के भोजन के बंदोबस्त में जुटा भारत नजर नहीं आता है और यहीं जनता और सत्ता से रिश्ते टूट जाते हैं। अंग्रेजी राज की मानसिकता और अंग्रेजी कानूनों से देश आज भी मुक्त नहीं है। जनसेवक और लोकसेवक की परिभाषा में आने वाले पदाधिकारी आज भी अपने को साहब कहलाना पसंद करते हैं, उनके लिए आमजन तो सेवक और नौकर सरीखे ही होंगें। जिस मानसिकता से अंग्रेज नौकरशाही हम भारतीयों को हेय दृष्टि से, हिकारत की नजर से देखती थी, हमें काहिल-कामजोर, नमक हराम समझकर दमनचक्र चलाती थी, उसमें बदलाव कहां आया है? साहब आज भी साहब है। लोकतंत्र के सात दशक की यात्रा सिर्फ आम भारतीय के अपमान और तिरस्कार की यात्रा बनकर रह गयी है। पांच रूपए, एक रूपए में भरपेट भोजन हमें मिलता है, यह बताने वाली राजनीति और नौकरशाही की खुद की एक थाली कितने में पड़ती है, उसका भी हिसाब लेने की जरूरत है। अखबार आपको बता ही रहे हैं एक गरीब राज्य छत्तीसगढ़ के विधानसभा अध्यक्ष के बंगले में कितने एसी लगाए गए हैं। यह प्रतीकात्मक सूचनाएं बताती हैं कि हिंदुस्तान कहां से और कितना बदला है।
  सरकारी अफसरों की अकड़, हेकड़ी और देहभाषा देखिए उनके लिए आम जनता तो छोड़िए सामान्य आम जनप्रतिनिधि भी कोई मायने नहीं रखता। उन्हें साहब कहलाना और साहबी दिखाना पसंद है। जिस भारतीय आम जन को हम निकम्मा समझने की अंग्रेजी सरकार की मानसिकता से ग्रस्त हैं, अपना चश्मा उतारेंगें तो आपको इनमें ही श्रमदेव और श्रमदेवियां नजर आएंगीं। एक गरीब देश और उसके अमीर शासक। यह देश अफसरों की फौज और राजनेताओं को इतनी सुविधाएं साधन इसलिए दे रहा है कि ये इन सुविधाओं को पाकर अपेक्षित संवेदनशीलता के साथ जनता के एजेंडे पर काम करेंगें। किंतु सत्ता पाकर लोगों की दृष्टि और सृष्टि दोनों बदल जाती है।
     दिल्ली की सत्ता पर ऐसे समय में नरेंद्र मोदी का आगमन एक ठंडी हवा के झोंके की तरह है, क्योंकि वे मनमोहन सिंह की तरह इंडिया नहीं भारत के प्रतिनिधि हैं। वे गांवों के दर्द, उसकी गरीबी और संघर्ष को जानते हैं। दिल्ली उन्हें बदल न सके इसके लिए हम सबको प्रार्थना करनी चाहिए। उनके जीवन के अनुभव और उनकी समूची जीवन यात्रा उम्मीदों को जागने वाली है। देश ने उनके इसी देशीपने पर मुग्ध होकर उन्हें स्वीकारा है। खतरा यहीं बड़ा है कि वे जनादेश पा चुके हैं और लुटियंस जोन को क्रेक कर चुके हैं। कल तक जो ताकतें उन्हें दिल्ली न आने देने के लिए सारे जुगत लगा रही थीं और इसमें उनके दल के अंदर-बाहर के लोग भी शामिल थे, अब वे उनका अनूकूलन करने का प्रयास करेंगें। दिल्ली आपको अपने जैसा बना लेती है या फिर वेबफा हो जाती है। नरेंद्र मोदी अपार जनशक्ति से समर्थन से वहां पहुंचे हैं तो उम्मीद की जानी चाहिए कि वे इस जनविश्वास की रक्षा करते हुए शासन-प्रशासन में आम आदमी के लिए ज्यादा संवेदना का विस्तार करेंगें। वे उन इलाकों पर भी ध्यान देंगें जहां असली नक्सलियों से ज्यादा लूट और अत्याचार शासन का खुद का तंत्र और उद्योंगों कर रहे हैं। वे इस बात को समझने की कोशिश करेंगें कि क्यों जमीनों, जंगलों और पानी की लूट का माहौल बना हुआ है और उन लोगों की परवाह किए बिना जो इन संसाधनों पर अपना पहला हक रखते हैं। सवाल यह भी हैं कि सरकार एक व्यापारी की तरह काम करेगी या एक संवेदनशील मानवीय आचरण भी करेगी। दिल्ली की बेरहमी के किस्से हमारे इतिहास में बिखरे पड़े हैं। दिल्ली के बारे में हमारे समय के एक बड़े कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना लिखते हैं-
दिल्ली हमका चाकर कीन्ह
दिल दिमाग भूसा भर-दीन्ह।

  इतिहास की इस घड़ी में समूचा देश नरेंद्र मोदी को दिल्ली में रहकर भी देशी आदमी बने रहने की प्रार्थना प्रभु से कर रहा है। वह उम्मीद कर रहा है कि वे देश की राजधानी को उस सोच से मुक्त कराएंगें जिसमें आम भारतीय के बारे में अच्छी धारणा नहीं है। उस प्रशासन तंत्र में संवेदना भरने का काम भी करेंगें जिसे भारतीयता, उसके मूल्यों, संस्कृति और यहां के लोगों से दूरी बनाना ही पसंद है। वह भारतीय मेघा का सम्मान करने वाला वातावरण भी बनाने का काम करेंगें। हिंदुस्तान को समझकर झकझोरने और इस देश की एकता के लिए गुजरात से आए नायकों स्वामी दयांनद, महात्मा गांधी और सरदार पटेल ने अभूतपूर्व काम किया है। सही मायने में हमारे अंदर सोये हुए मनुष्य को जगाने, झकझोरने और एक भारतीय दृष्टि से सोचने का जो जज्बा महात्मा गांधी ने हमें दिया वह आज हमारा मार्गदर्शक हो सकता है। गुजरात की घरती से आने के नाते, अपने पूर्व जीवन के अनुभवों के आधार पर नरेंद्र मोदी अगर कुछ कर पाते हैं तो यही बात देश के माथे पर सौभाग्य का टीका साबित होगी। ऐसे में उन्हें यह परवाह करने की जरूरत नहीं है कि देश के प्रभु वर्गों में उनको लेकर क्या राय बनती है। उन्हें तो देश की महान जनता पर भरोसा करना चाहिए, जिसने उन्हें भारत जैसे महादेश की कमान तब सौंप दी जब हर प्रभावी विचार, व्यक्ति, बुद्धिजीवी और संस्थाएं उनके दिल्ली की तरफ बढ़ रहे अश्वमेघ को रोकने के लिए हम संभव उपाय अपना रहे थे। दिल्ली उन्हें अनूकूलित करने के प्रयासों में विफल होती है तो नरेंद्र मोदी को इतिहास पुरूष बनने से कोई रोक नहीं सकता। वे विश्व इतिहास के एक ऐसे नायक बनेंगें जिस पर हमारी पीढियों को गर्व होगा और वे कहेंगी कि हमने नरेंद्र मोदी को देखा था।

2 टिप्‍पणियां:

  1. संजय जी हर दल इसी तरह कोरा वादा कर सत्ता में तो आती है। लेकिन सत्ता में बैठते ही उन्हें भी दाल और आटे का भाव समझ में आता है। एक दिन में कुछ नहीं होगा लेकिन जो इनके हाथ में है उसे तो रोक सकते है।मुंबई बीजेपी के अध्यक्ष तो दावा कर रहे है कि 5 रुपए में मुंबई में भरपेट भोजन मिलता है। ऐसा नहीं है कि हर विरोध करनेवाला मोदी विरोधी है। जिन्होंने वोट डाला वे भी पछता रहे कि काश, उन्हें कांग्रेस,बीजेपी से हटकर कोई और विकल्प क्यों नहीं मिला।

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  2. सटीक आलोचनात्मक आलेख, बधाई

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