सोमवार, 10 मार्च 2014

चुनावी समर में भाजपा की सोशल इंजीनिरिंग

-संजय द्विवेदी
 देश की हर पार्टी को यह हक है कि वह अपने सामाजिक और भौगोलिक विस्तार के न सिर्फ सपने देखे, बल्कि उसे हकीकत में बदलने के जतन भी करे। राष्ट्रीय रंगमंच पर जैसे-जैसे चुनावी गतिविधियां तेज हो रही हैं, भाजपा में अपने सामाजिक आधार के विस्तार की तड़प साफ दिख रही है। लगभग आधे भारत में अनुपस्थित भाजपा की समस्या यह है कि वृहत्तर हिंदू समाज की रहनुमाई का दम भरने वाली इस पार्टी के छाते के नीचे अभी भी एक बड़ा समाज नहीं है। खासकर दलितों ,आदिवासियों और पिछड़ों के बीच इसे अपनी स्थाई जगह अभी बनानी है। शायद इसी को भांपते हुए पार्टी ने ताबड़तोड़ ऐसे फैसले लिए हैं जिससे एक वातावरण बने कि भाजपा के छाते के नीचे वृहत्तर हिंदू समाज एकत्र तो हो ही रहा है और बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक भी उसके छाते के नीचे आ रहे हैं। पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह के मुसलमानों से माफी मांगने के बयान को इस रोशनी में देखा जा सकता है।
दलितों की जगहः भाजपा और संघ परिवार की लाख कोशिशों के बावजूद दलित नेतृत्व का अभाव पार्टी को हमेशा महसूस होता रहा है। सूरजभान, बंगारू लक्ष्मण सरीखे एकाध नेताओं को छोड़ दें तो भाजपा के दलित नेता राष्ट्रीय रंगमंच पर अपनी जगह नहीं बना पाए। वहीं दूसरे दलों से आए संघप्रिय गौतम जैसे नेता भी भाजपा में उस तरह रच-बस नहीं पाए कि वे दल को कोई शक्ति दे पाते। अब भाजपा ने इसकी तोड़ के लिए एक बार फिर जतन शुरू किए हैं। इंडियन जस्टिस पार्टी के नेता उदित राज को भाजपा में शामिल कर इस ओर एक बड़ा कदम उठाया है। संजय पासवान जैसे बिहार भाजपा के दलित नेता इस दिशा में निरंतर प्रयास कर रहे हैं। वे बाबा साहेब अंबेडकर से लेकर कांशीराम और जगजीवन राम के चित्र अपने कार्यालय में लगाकर यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि भाजपा दलितों के सवालों पर गंभीर है। यहां बौद्ध और हिंदु एकता के प्रयास भी देखे जा रहे हैं। जैसे भाजपा शासित मध्यप्रदेश में बौद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना कर वहां के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक बड़ा कदम उठाया है। जिससे दुनिया भर के बौद्ध धर्मावलंबी देश आकर्षित हुए हैं। बौद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना सांची(मप्र) में करने का एक प्रतीकात्मक महत्व भी है। उदित राज भी एक ऐसे नेता हैं जो हिंदु समाज की तमाम रीति-नीति पर सवाल खड़े करते हुए बौद्ध बन गए थे। उनका भाजपा में आना एक संकेत जरूर है कि राजनीति में बदलाव आ रहा है। भाजपा का दिल भी बड़ा हो रहा है और उसमें अन्य विचारों के लिए भी जगह बन रही है। इसी प्रकार महाराष्ट्र में रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया के नेता रामदास आठवले आज राजग गठबंधन के एक बड़े नायक बन चुके हैं। भाजपा ने अपने राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर के स्थान पर उन्हें समर्थन देकर राज्यसभा में भेजा है। जाहिर तौर पर भाजपा की यह उदारता अकारण नहीं है। वह अपने सामाजिक विस्तार की पीड़ा में बहुत से कदम उठाते हुए, ज्यादा सरोकारी और ज्यादा व्यापक बनने की कोशिशों में लगी है। इसी तरह रामविलास पासवान की पार्टी को सप्रयास राजग में लाना साधारण नहीं है। इस फैसले से बिहार के राजनीतिक समीकरणों में अकेली पड़ी भाजपा को जहां राहत मिलेगी, वहीं दलितों के बीच एक राष्ट्रीय अपील भी बनेगी। इसमें दो राय नहीं कि देश में मायावती, रामविलास पासवान, रामदास आठवले और उदितराज ऐसे नाम हैं, जिन्हें दलित नेता के नाते जाना-पहचाना जाता है। इनमें मायावती को छोड़कर तीनों आज राजग और भाजपा के मंच पर हैं।हरियाणा में पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के बेटे कुलदीप विश्नोई के साथ गठबंधन बना हुआ है। इसी तरह तमिलनाडु में वायको का साथ आना भी भाजपा की राजनीति को सफल बनाता है। जयललिता के तीसरे मोर्चे के मंच पर जाने से भाजपा का अकेलापन तमिलनाडु में वायको निश्चित ही भरने में सफल होंगें। वैसे भी वे वाजपेयी सरकार में मंत्री रह चुके हैं।

पिछड़े वर्ग के प्रधानमंत्री का नाराः भाजपा लंबे समय तक पिछड़ों में लोकप्रिय रही है। किंतु 1990 के बाद हुए सामाजिक बदलावों ने भाजपा को काफी पीछे छोड़ दिया। पूरा उत्तर भारत सामाजिक न्याय की शक्तियों की लीलाभूमि बन गया, जिसमें समाजवादी विचारधारा से आने वाले पिछड़े वर्गों के अनेक नेता प्रभावी हो गए।  वहीं रही सही कसर भाजपा के कल्याण सिंह, उमा भारती जैसे नेताओं की नाराजगी ने पूरी कर दी। इससे सबक लेकर भाजपा ने पहले अपने नाराज नेताओं को मनाया और आज कल्याण सिंह व उमा भारती दोनों पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में पुनः दल में शामिल हो चुके हैं। वहीं उप्र में स्व.सोनेलाल पटेल जो अपना दल बनाकर कुर्मियों में खास आधार रखते थे, की बेटी अनुप्रिया पटेल का समर्थन भाजपा ने हासिल कर लिया है। बिहार में कुशवाहा समाज के प्रमुख नेता  उपेंद्र कुशवाहा का तालमेल भी भाजपा से हो चुका है।इसके साथ गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछड़ा वर्ग से आने के कारण मिलने वाले लाभ पर भी भाजपा की नजर है। मोदी अपने भाषणों में अपनी जाति और काम (चाय बेचना) दोनों की याद दिलाना नहीं भूलते हैं। निश्चित ही इसके अपने अर्थ हैं और यह नाहक कही जा रही बात तो कतई नहीं है। पिछले चुनाव में भी भाजपा ने उप्र में अजीत सिंह के साथ तालमेल किया था, किंतु सत्ता आते ही वे कांग्रेस के गठबंधन में शामिल हो गए। इस बार भाजपा अपने साथियों के चुनाव में सर्तकता तो बरत रही है किंतु वह इस चुनाव को लेकर खासी गंभीर भी है। दो चुनावों की हार ने उसके आत्मविश्वास को हिलाकर रख दिया है, यही कारण है उप्र के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, मप्र की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती,कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री वीएस येदुरप्पा, गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री केशूभाई पटेल जैसे तमाम नेताओं को साथ लेकर वह परिवार की एकता और पिछड़ा वर्गों के नेतृत्व की एकजुटता का संदेश देना चाहती है। आज देश में उसके पास कर्ई पिछड़ा वर्ग के नेता हैं जो उसका आधार बढ़ाने में सहायक हैं। मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, बिहार के नेता प्रतिपक्ष सुशील कुमार मोदी जैसे चेहरे भाजपा को राहत देते नजर आते हैं। भाजपा की इस सोशल इंजिनियरिंग में अकेले झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी शेष हैं। बाकी अपने सारे बागियों को भाजपा अपने मंच पर वापस ला चुकी है। यह साधारण नहीं है कि भाजपा से बगावत करने वाले ज्यादातर बड़े नेताओं में आदिवासी, दलित और पिछड़े वर्ग के नेता ही शामिल थे। इस पर भाजपा को विश्लेषण करने की जरूरत है कि आखिर वह क्या कारण है कि पार्टी इन वर्गों के नेताओं की शक्ति और जनाधार का सही उपयोग नहीं कर पाती और वे बगावत की सीमा तक चले जाते हैं। कल्याण सिंह, उमा भारती, बाबूलाल मरांडी, प्रहलाद पटेल, वीएस येदुरप्पा, शंकर सिंह बाधेला, केशूभाई पटेल जैसे तमाम नाम इसी परंपरा में आते हैं। भाजपा में मोदी युग का आरंभ होने के बाद एक बार फिर बिखरा भाजपा परिवार एक हो रहा है। देखना है कि यह एकता और नए समीकरण चुनाव को किस तरह प्रभावित करते हैं।

2 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसे ज्वलंत समस्याओं का गंभीरता से निराकरण नहीं करना और उनकी उपेक्षा करते हुए उनका हल नहीं निकलना, आगे बढ़ने नहीं देता है.विषय को सामने लाना अच्छा प्रयास है . अब भी कोई ध्यान न दे तो परिणाम सामने होगा l

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  2. ऐसे ज्वलंत समस्याओं का गंभीरता से निराकरण नहीं करना और उनकी उपेक्षा करते हुए उनका हल नहीं निकलना, आगे बढ़ने नहीं देता है.विषय को सामने लाना अच्छा प्रयास है . अब भी कोई ध्यान न दे तो परिणाम सामने होगा l शैलेश मिश्रा

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