गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

मैं एक मजदूर हूं। जिस दिन कुछ लिख न लूं, उस दिन मुझे रोटी खाने का कोई हक नहीं। -प्रेमचंद



2 टिप्‍पणियां:

  1. यह उद्बोध देकर आपने बहुत अच्छा किया संजय जी! यह मेरे जैसे लोगों पर बहुत सटीक बैठता है, और अपनी मजदूरी(कर्म) के प्रति सचेत करता रहता है! धन्यवाद आपको !

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  2. संजय सर बहुत ही सुन्दर बात लिखी है। हमारा कर्म लिखना है, उसी से हमारी रोजी-रोटी चलती है। हमें अपने दायित्व का ईमानदारी से निर्वहन करना चाहिए।

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