शनिवार, 8 जनवरी 2011

अकेले हम, अकेले तुम !

कैसा समाज बना रही हैं सोशल नेटवर्किंग साइट्स

-संजय द्विवेदी

लंदन की 42 वर्षीय महिला सिमोन बैक की आत्महत्या की खबर एक ऐसी सूचना है जिसने सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर पल रहे रिश्तों की पोल खोल दी है। यह घटना हमें बताती है कि इन साइट्स पर दोस्तों की हजारों की संख्या के बावजूद आप कितने अकेले हैं और आपकी मौत की सूचना भी इन दोस्तों को जरा भी परेशान नहीं करती। सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर सिमोन ने अपनी आखिरी पंक्तियों में लिखा था-मैंने सारी गोलियां ले ली हैं, बाय बाय। उसके 1048 दोस्तों ने इन्हें पढ़ा, लेकिन किसी ने यकीन नहीं किया, न ही किसी ने उसे बचाने या बात करने की कोशिश की। एक दोस्त ने उसे झूठी बताया तो एक ने लिखा उसकी मर्जी। जाहिर तौर पर यह हमारे सामाजिक परिवेश के सच को उजागर करती हुई एक ऐसी सत्यकथा है जो इस नकली दुनिया की हकीकत बताती है। यह हिला देने वाली ही नहीं, शर्मसार कर देने वाली घटना बताती है कि भीड़ में भी हम कितने अकेले हैं और अवसाद की परतें कितनी मोटी हो चुकी हैं। आनलाइन दोस्तों की भरमार आज जितनी है ,शायद पहले कभी न थी किंतु आज हम जितने अकेले हैं, उतने शायद ही कभी रहे हैं।

महानगरीय अकेलेपन और अवसाद को साधने वाली इन साइट्स के केंद्र में वे लोग हैं जो खाए-अधाए हैं और थोड़ा सामाजिक होने के मुगालते के साथ जीना चाहते हैं। सही मायने में यह निजता के वर्चस्व का समय है। व्यक्ति के सामाजिक से एकल होने का समय है। उसके सरोकारों के भी रहस्यमय हो जाने का समय है। वह कंप्यूटर का पुर्जा बन चुका है। मोबाइल और कंप्यूटर के नए प्रयोगों ने उसकी दुनिया बदल दी है, वह एक अलग ही इंसान की तरह सामने आ रहा है। वह नाप रहा है पूरी दुनिया को, किंतु उसके पैरों के नीचे ही जमीन नहीं है। उसे अपने शहर, गली, मोहल्ले या जिस बिल्डिंग में वह रहता है उसका शायद कुछ पता ना हो किंतु वह अपनी रची वर्चुअल दुनिया का सिरमौर है। वह वहां का हीरो है। मोबाइल, लैपटाप और डेस्कटाप स्क्रीन की रंगीन छवियों ने उसे जकड़ है। वह एकांत का नायक है। उसे आसपास के परिवेश का पता नहीं है, वह अब विश्व नागरिक बन चुका है। दोस्तों का ढेर लगाकर सामाजिक भी हो चुका है। कुछ स्फुट, एकाध पंक्ति के विचार व्यक्त कर समाज और दुनिया की चिंता भी कर रहा है। यानि सारा कुछ बहुत ही मनोहारी है। शायद इसी को लीला कहते हैं, वह लीला का पात्र मात्र है। कारपोरेट, बाजार और यंत्रों का पुरजा।

सोशल नेटवर्किग साइट्स के सामाजिक प्रभावों का भारतीय संदर्भ में विशद अध्ययन होना शेष है किंतु यह एक बड़ी पीढ़ी को अपनी गिरफ्त में ले रहा है इसमें दो राय नहीं। नई पीढ़ी तो इसी माध्यम पर संवाद कर रही है, प्यार कर रही है, फंतासियां गढ़ रही है, समय से पहले जवान हो रही है। हमारे पुस्तकालय भले ही खाली पड़े हों किंतु साइबर कैफे युवाओं से भरे पड़े हैं और अब इन साइट्स ने मोबाइल की भी सवारी गांठ ली है, यानि अब जेब में ही दुनिया भर के दोस्त भी हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट्स का भारतीय संदर्भ में असर शशि थरूर के बहाने ही चर्चा में आया, जबकि ट्विटर पर वे अपनी कैटल क्लास जैसी टिप्पणियों के चलते विवादों में आए और बाद में उन्हें मंत्री पद भी छोड़ना पड़ा। भारत में अभी कंप्यूटर का प्रयोग करने वाली पीढ़ी उतनी बड़ी संख्या में नहीं हैं किंतु इन साइट्स का सामाजिक प्रभाव बहुत है। ये निरंतर एक नया समाज बन रही हैं। सपने गढ़ रही हैं और एक नई सामाजिकता भी गढ़ रही हैं। नकली प्रोफाइल बनाकर पलने वाले पापों के अलावा छल और झूठे-सच्चे प्यार की तमाम कहानियां भी यहां पल रही हैं। व्यापार से लेकर प्यार सबके लिए इन सोशल साइट्स ने खुली जमीन दी है। सही मायने में यह सूचना, संवाद और रिश्ते बनाने का बेहद लोकतांत्रिक माध्यम हो चुका है जिसने संस्कृति,भाषा और भूगोल की सरहदों को तोड़ दिया है। संचार बेहद सस्ता और लोकतांत्रिक बन चुका है। जहां तमाम अबोली भाषाएं, भावनाएं जगह पा रही हैं। आप यहां तो अपनी बात कह ही सकते हैं। यह आजादी इस माध्यम ने हर एक को दी है। यह आजादी नौजवानों को ही नहीं, हर आयु-वर्ग के लोगों को रास आ रही है, वे विहार कर रहे हैं इन साइट्स पर। यह एक अलग लीलाभूमि है। जो टीवी से आगे की बात करती है। टीवी तमाम अर्थों में आज भी सामाजिकता को साधता है किंतु यह माध्यम एकांत का उत्सव है। वह आपके अकेलेपन को एक उत्सव में बदलने का सामर्थ्य रखता है। वह आपके लिए एक समाज रचता है। आपकी निजता को सामूहिकता में, आपके शांत एकांत को कोलाहल में बदलता है। सोशल साइट्स की सफलता का रहस्य इसी में छिपा है। वे महानगरीय जीवन में, सिकुड़ते परिवारों में, अकेले होते आदमी के साथ हैं। वे उनके लिए रच रही हैं एक वर्चुअल दुनिया जिसके हमसफर होकर हम व्यस्त और मस्त होते हैं। किंतु यह दुनिया कितनी खोखली, कितनी नकली, कितनी बेरहम और संवेदनहीन है, इसे समझने के लिए सिमोन बैक की धीरे-धीरे निकलती सांसों और बाद में उसकी मौत को महसूस करना होगा। सिमोन बैक के अकेलेपन, अवसाद और उससे उपजी उसकी मौत को अगर उसके 1048 दोस्त नहीं रोक सके तो क्या हमारी रची इस वर्चुअल दुनिया के हमारे दोस्त हमें रोने के लिए अपना कंधा देगें ?

4 टिप्‍पणियां:

  1. आज के समाज कि विडंबना बन गयी है कि मोहल्ले की दोस्ती यारी और बैठिकी छोड़ कर इस आभासी दुनिये में सुख दुःख बाँट रहे हैं.

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  2. आज राष्ट्रीय सहारा में आपका यह लेख पढ़ा. कुछ बातें मन को छू गईं.कभी कहा जाता था कि लोग पढ़-लिख लेंगे तो समाज बदहाली से निकल आयेगा और हम तरक्की करेंगें! आज पढ़-लिखकर और तरक्की करके हम कहाँ पहुँच रहे हैं? एक अंधी सुरंग में! और वो सुरंग भी हम ख़ुद ही बना रहे हैं! बहरहाल, ऐसी मौतें तो हर पल होती रहती हैं संजय जी , लेकिन आपने उस नामालुम शख्स की मौत को एक बड़े सामाजिक सरोकार से जोड़कर एक गंभीर मुद्दा उठाया है, इसके लिए आपको साधुवाद! यह बहस आगे बढ़नी चाहिए

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  4. संजय जी , बहुत ही सुन्दर , सवाल उठाता, झगझोरता सा लेख है आपका - इस खबर ने मुझे भी अन्दर तक दुःख पहुँचाया मैं तो हमेशा से हैरान होती हूँ फेसबुक पर लोगों की लम्बी लम्बी फ्रेंड लिस्ट देख कर ,सभी ना जाने किस माया जाल में जकडे है सब इक दूसरे को छलते रहते है कोई किसी को समझने की कोशिश नहीं करता ऐसा लगता है फेसबुक पर हर किसी का अपना अपना आसमां , हर कोई अपने जुनूं की कह रहा है दास्ताँ " मुझे तो लगता है कंप्यूटर और मोबाइल ने रिश्तों की मिठास छीन ली है ना फोन पर बात करते समय किसी की आवाज में सच्चाई नजर आती है ना फेसबुक पर ही लोग खुद को सही रूप में प्रस्तुत करते है
    यक़ीनन सिमोन बेक की मौत और उसके दोस्तों की बेरुखी ने इस रिश्ते की कलई खोल दी है और उन लोगो को सोचने पर मजबूर किया है जो अपने दोस्तों की लम्बी लिस्ट देख कर खुश होते होगे अफ़सोस १०४८ दोस्तों में इक भी ऐसा नहीं था जो सिमोन के मन तक पहुंचा हो उसने जरुर मरते वक्त सोचा होगा की " सेहरा में मेरे हाल पर कोई फूट के रोया तो वो मेरे पाँव का छाला ही रोया " और रही बात हमें रोने के लिए कौन कंधा देगा ??? तो साहब यदि हमारे मन में किसी के लिए दर्द है और हम पीर पराई जानते है कभी किसी के लिए हमारी आखं नम हुई होगी और हमने किसी के आसुओं को अपना कंधा दिया होगा तो हमें भी रोने के लिए कंधा जरुर मिलेगा

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