शनिवार, 16 अक्तूबर 2010

कैसे आएंगें राम इस रक्तरंजित बस्तर में !


जिस धरा पर पड़े प्रभु के चरण वहां बिछी हैं लैंड माइंस
-संजय द्विवेदी
बस्तर यानि दण्डकारण्य का वह क्षेत्र जहां भगवान राम ने अपने वनवास काल में प्रवास किया। बस्तर की यह जमीन आज खून से नहाई हुयी है। बस्तर एक युद्धभूमि में बदल गया है। जहां वे वनवासी मारे जा रहे हैं जिनकी मुक्ति की जंग कभी राम ने लड़ी थी और आज उस जंग को लड़ने का कथित दावा नक्सली संगठन भी कर रहे हैं। दशहरे का बस्तर में एक खास महत्व है। बस्तर का दशहरा विश्वप्रसिद्ध है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाले इस दशहरे में बस्तर की आदिवासी संस्कृति के प्रभाव पूरे ताप पर दिखती है। बस्तर की लोकसंस्कृति का शायद यह अपने आप में सबसे बड़ा जमावड़ा है। बस्तर राजपरिवार के नेतृत्व में जुटने वाला जनसमुद्र इसकी लोकप्रियता का गवाह है। लोकसंस्कृति किस तरह स्थानीयता के साथ एकाकार होती है इसका उदाहरण यह है कि दशहरे में यहां रावण नहीं जलाया जाता, पूजा भी नहीं जाता। क्या इस दशहरे में राम बस्तर आने का मन बना पाएंगें। जिन रास्तों से वे गुजरे होंगें वहां आज बारूदी सुरंगे बिछी हुयी हैं। आतंक और अज्ञात भय इन तमाम इलाकों में घेरते हैं। रावण की हिंसात्मक राजनीति का दमन करते हुए राम ने आतंक से मुक्ति का संदेश दिया था। किंतु आज के हालात में बस्तर अपने भागीरथ का इंतजार कर रहा है जो उसे आतंक के शाप से मुक्त करा सके। बस्तर के दशहरे में मुड़िया दरबार सजता है जो पंचायत सरीखी संस्था है, जहां पर आदिवासी जन बस्तर के राजपरिवार के साथ बैठकर अपनी चिंताओं पर बात करते हैं। इस दरबार में आदिवासी समाज को बस्तर में फैली हिंसा पर भी बात करनी चाहिए। ताकि बस्तर आतंक के शाप से मुक्त हो सके। आदिवासी जीवन फिर से अपनी सहज हंसी के साथ जी सके और बारूद व मांस के लोथड़ों की गंध से बस्तर मुक्त हो सके।
नक्सली जिस तरह भारतीय राजसत्ता को आए दिन चुनौती दे रहे हैं और उससे निपटने के लिए हमारे पास कोई समाधान नहीं दिखता । सरकार के एक कदम आगे आकर फिर एक कदम पीछे लौट जाने के तरीके ने हमारे सामने भ्रम को गहरा किया है। जाहिर तौर पर हमारी विवश राजनीति,कायर रणनीति और अक्षम प्रशासन पर यह सवाल सबसे भारी है। नक्सली हों या देश की सीमापार बैठे आतंकवादी वे जब चाहें, जहां चाहें कोई भी कारनामा अंजाम दे सकते हैं और हमारी सरकारें लकीर पीटने के अलावा कर क्या सकती हैं। राजनीति की ऐसी बेचारगी और बेबसी लोकतंत्र के उन विरोधियों के सामने क्यों है। क्या कारण है कि हिंसा में भरोसा रखनेवाले, हमारे लोकतंत्र को न माननेवाले, संविधान को न माननेवाले भी इस देश में कुछ बुद्धिवादियों की सहानुभूति पा जाते हैं। सरकारें भी इनके दबाव में आ जाती हैं। नक्सली चाहते क्या हैं। नक्सलियों की मांग क्या है। वे किससे यह यह मांग कर रहे हैं। वे बातचीत के माध्यम से समस्या का हल क्यों नहीं चाहते। सही तो यह है कि वे इस देश में लोकतंत्र का खात्मा चाहते हैं। वे जनयुद्ध लड़ रहे हैं और जनता का खून बहा रहे हैं।हमारी सरकारें भ्रमित हैं। लोग नक्सल समस्या को सामाजिक-आर्थिक समस्या बताकर प्रमुदित हो रहे हैं। राज्य का आतंक चर्चा का केंद्रीय विषय है जैसे नक्सली तो आतंक नहीं फैला रहे बल्कि जंगलों में वे प्रेम बांट रहे हैं। उनका आतंक, आतंक नहीं है। राज्य की हिंसा का प्रतिकार है। किसने उन्हें यह ठेका दिया कि वे शांतिपूर्वक जी रही आदिवासी जनता के जीवन में जहर धोलें। उनके हाथ में बंदूकें पकड़ा दें, जो हमारे राज्य की ओर ही तनी हुयी हों। लोगों की जिंदगी बदलने के लिए आए ये अपराधी क्यों इन इलाकों में स्कूल नहीं बनने देना चाहते, क्यों वे चाहते हैं कि सरकार यहां सड़क न बनाए, क्यों वे चाहते हैं कि सरकार नाम की चीज के इन इलाकों में दर्शन न हों। पुल, पुलिया, सड़क, स्कूल, अस्पताल सबसे उन्हें परेशानी है। जनता को दुखी बनाए रखना और अंधेरे बांटना ही उनकी नीयत है। क्या हम सब इस तथ्य से अपरिचित हैं। सच्चाई यह है कि हम सब इसे जानते हैं और नक्सलवाद के खिलाफ हमारी लड़ाई फिर भी भोथरी साबित हो रही है। हमें कहीं न कहीं यह भ्रम है कि नक्सल कोई वाद भी है। आतंक का कोई वाद हो सकता है यह मानना भी गलत है। अगर आपका रास्ता गलत है तो आपके उद्देश्य कितने भी पवित्र बताए जाएं उनका कोई मतलब नहीं है। हमारे लोकतंत्र ने जैसा भी भारत बनाया है वह आम जनता के सपनों का भारत है। माओ का कथित राज बुराइयों से मुक्त होगा कैसे माना जा सकता है। आज लोकतंत्र का ही यह सौंदर्य है कि नक्सलियों का समर्थन करते हुए भी इस देश में आप धरना-प्रदर्शन करते और गीत- कविताएं सुनाते हुए घूम सकते हैं। अखबारों में लेख लिख सकते हैं। क्या आपके माओ राज में अभिव्यक्ति की यह आजादी बचेगी। निश्चय ही नहीं। एक अधिनायकवादी शासन में कैसे विचारों, भावनाओं और अभिव्यक्तियों का गला घुटता है इसे कहने की जरूरत नहीं है। ऐसे माओवादी हमारे लोकतंत्र को चुनौती देते घूम रहे हैं और हम उन्हें सहते रहने को मजबूर हैं।
नक्सलवादियों के प्रति हमें क्या तरीका अपनाना चाहिए ये सभी को पता है फिर इस पर विमर्श के मायने क्या हैं। खून बहानेवालों से शांति की अर्चना सिर्फ बेवकूफी ही कही जाएगी। हम क्या इतने नकारा हो गए हैं कि इन अतिवादियों से अभ्यर्थना करते रहें। वे हमारे लोकतंत्र को बेमानी बताएं और हम उन्हें सिर-माथे बिठाएं, यह कैसी संगति है। आपरेशन ग्रीन हंट को पूरी गंभीरता से चलाना और नक्सलवाद का खात्मा हमारी सरकार का प्राथमिक ध्येय होना चाहिए। जब युद्ध होता है तो कुछ निरअपराध लोग भी मारे जाते हैं। यह एक ऐसी जंग है जो हमें अपने लोकतंत्र को बचाने के लिए जीतनी ही पड़ेगी। बीस राज्यों तक फैले नक्सली आतंकवादियों से समझ की उम्मीदें बेमानी हैं। वे हमारे लोकतंत्र की विफलता का फल हैं। राज्य की विफलता ने उन्हें पालपोस का बड़ा किया है। सबसे ऊपर है हमारा संविधान और लोकतंत्र जो भी ताकत इनपर भरोसा नहीं रखती उसका एक ही इलाज है उन प्रवृत्तियों का शमन।
भगवान राम आज इस बस्तर की सड़कों और इस शांत इलाके में पसरी अशांति पर क्या करते। शायद वही जो उन्होंने लंका के राजा रावण के खिलाफ किया। रावण राज की तरह नक्सलवाद भी आज हमारी मानवता के सामने एक हिंसक शक्ति के रूप में खड़ा है। हिंसा के खिलाफ लड़ना और अपने लोगों को उससे मुक्त कराना किसी भी राज्य का धर्म है। नक्सलवाद के रावण के खिलाफ हमारे राज्य को अपनी शक्ति दिखानी होगी। क्योंकि नक्सलवाद के रावण ने हमारे अपने लोगों की जिंदगी में जहर घोल रखा है। उनके शांत जीवन को झिंझोड़कर रख दिया है। बस्तर के लोग फिर एक राम का इंतजार कर रहे हैं। पर क्या वे आएंगें। क्या एक बार फिर जनता को आसुरी शक्तियों से मुक्त कराने का काम करेंगें। जाहिर तौर पर ये कल्पनाएं भर नहीं हैं, हमारे राज्य को अपनी शक्ति को समझना होगा। नक्सली हिंसा के रावण के खिलाफ एक संकल्प लेना होगा। हमारा देश एक नई ताकत के साथ महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है। ये हिंसक आंदोलन उस तेज से बढ़ते देश के मार्ग में बाधक हैं। हमें तैयार होकर इनका सामना करना है और इसे जल्दी करना है- यह संकल्प हमारी सरकार को लेना होगा। भारत की महान जनता अपने संविधान और लोकतंत्र में आस्था रखते हुए देश के विकास में जुटी है। हिंसक रावणी और आसुरी आतंकी प्रसंग उसकी गति को धीमा कर रहे हैं। हमें लोगों को सुख चैन से जीने से आजादी और वातावरण देना होगा। अपने जवानों और आम आदिवासियों की मौत पर सिर्फ स्यापा करने के बजाए हमें कड़े फैसले लेने होंगें और यह संदेश देना होगा कि भारतीय राज्य अपने नागरिकों की जान-माल की रक्षा करने में समर्थ है। बस्तर से आतंक की मुक्ति में आम जनता,आदिवासी समाज और सरकार को राम की सेना के रूप में एकजुट होना होगा। तभी लोकतंत्र की जीत होगी और रावणी व आसुरी नक्सलवाद को पराजित किया जा सकेगा। दशहरे पर नक्सलवाद के रावण के शमन का संकल्प लेकर हम अपने लोकतंत्र की बुनियाद को ही मजबूत करेंगें।
( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)

1 टिप्पणी:

  1. वस्तुत: हालात नाज़ुक हैं.
    चक्षु खोलने वाला आलेख.



    “दीपक बाबा की बक बक”
    आज अमृतयुक्त नाभि न भेदो

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