शुक्रवार, 22 मई 2009

रमन राज में रमी भाजपा

सत्ता और संगठन के तालमेल से रचा इतिहास
राजनीति में जब सारा कुछ इतना अस्थाई और क्षणभंगुर है तो आखिर छत्तीसगढ़ भाजपा और रमन सिंह का ऐसा क्या करिश्मा है कि जनता का प्यार एक स्थाई विश्वास में बदल गया है। वह क्या जादू है जिसने लगातार छः साल से राज्य की राजनीति में हर स्तर के हुए चुनावों में डा. रमन सिंह के प्रति अपना भरोसा जताया है। वह तब जब इस नवगठित राज्य का राजनीतिक अतीत इसे ऐसी आजादी नहीं देता। छत्तीसगढ़ के इस इलाके के भरोसे ही संयुक्त मध्यप्रदेश में कांग्रेस अपनी सरकारें बनाती रही। राज्य की पहली सरकार भी कांग्रेस ने बनाई। नेताओं और संगठन की नजर से भी कांग्रेस का इस इलाके में एक खास आधार रहा है। किंतु डा. रमन सिंह जिन्हें उनके सर्मथक राज्य के प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री के रूप में संबोधित करते हैं, की चुनावी सफलताएं पूरे देश में चर्चा का कारण बन गई हैं।
बावजूद इसके डा. रमन इन सफलताओं का श्रेय लेने के उत्सुक नहीं दिखते, उनकी यह विनम्रता ही उन्हें अपने समकालीन नेताओं के बीच यशस्वी बनाती है। वे राज्य में आज छः साल के बाद भी जनता के विश्वासभाजन बने हुए हैं। पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव में जब वे पिछली लोकसभा के परिणामों को दोहराते हुए दिखते हैं तो यह लगता है कि यह सिर्फ संयोग और भाग्य का मामला नहीं है। वे हाल में ही विधानसभा के चुनावों में 50 सीटें जीते, अपने पिछले चुनाव में भी उनके पास 50 ही विधायक थे। यानि दोनों चुनावों में बराबर सीटें। इसी का दुहराव लोकसभा में हुआ, 10 सीटें 2004 में जीतीं तो 2009 में भी 10 सीटें जीतकर जनता ने उनका मान बनाए रखा है। यह एक गंभीर विश्लेषण का मामला है कि एक नवसृजित राज्य में जब जनआकाक्षाएं उफान पर होती हैं। लोग अपना राज्य हासिल करने के नाते सपनों में रंग भरने के लिए उतावले दिखते हैं। ऐसे में राजनीतिक नेतृत्व को कड़ी परीक्षा से गुजरना पड़ता है। रमन सिंह ने न सिर्फ ये परीक्षाएं पास की वरन विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण होते दिखते हैं। आज के दौर में जब राजनेताओं और राजनीति के सामने विश्वसनीयता का गंभीर संकट है ऐसे ये साधारण नहीं है कि उन्होंने जनता के मन में अपने लिए एक खास जगह बना ली है। उनका भोलापन, सज्जनता, विनम्रता, नक्सलवाद के खिलाफ उनकी प्रतिबद्धता, राज्य आदिवासी,वनवासी और गरीब वर्ग के प्रति ध्यान में रखकर बनाई गयी योजनाएं डा. रमन सिंह को एक ऐसे ब्रांड में बदलती है जो भरोसे का ब्रांड है। विकास जिसकी प्रतिबद्धता है और राज्य की बेहतरी जिसका सपना। रमन सिंह का यह ब्रांड यूं ही तैयार नहीं होता, भरोसा और सहजता उसकी यूएसपी (यूनिक सेलिंग प्वाइंट) हैं।

भरोसे से जीते कठिन मुकाबलेः
यह करिश्मा अनायास घटित नहीं होता। रमन सिंह आज सत्ता और संगठन के बीच समन्वय की मिसाल बन गए हैं। आमतौर पर सफलताएं व्यक्ति में अहंकार का सृजन करती हैं और वह श्रेय लेने की दौड़ में लग जाता है। छत्तीसगढ़ भाजपा और मुख्यमंत्री दोनों के बीच का समन्वय, एक-दूसरे को शक्ति देते हुए चलना ही आज जनविश्वास का आधार है। यही कारण है लोकसभा के इस चुनाव में जहां भाजपा हारती दिख रही थी, वहां से भी उसे संबल मिला, जनविश्वास मिली। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय, रायगढ़ की एक बेहद कठिन सीट पर मुकाबले में थे। जहां कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों में बढ़त पायी थी। स्वंय श्री साय, पत्थलगांव सीट से चुनाव हार गए थे, यह संगठन का आत्मविश्वास ही कहा जाएगा कि उसने अपने अध्यक्ष को पुनः रायगढ़ से मैदान में उतरा और तमाम अटकलों को खारिज करते हुए विजयश्री भी दिलाई। ऐसा ही विश्वास दुर्ग लोकसभा क्षेत्र में देखने को मिला पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद रहे ताराचंद साहू की बगावत से एक बड़ी चुनौती सामने थी लेकिन तमाम बेसुरी अपीलों, नारेबाजियों में आने के बजाए जनता ने भाजपा पर भरोसा जताया और भाजपा प्रत्याशी सरोज पाण्डेय को विजय मिली। दुर्ग एक ऐसे मैदान में बदल गया था जहां भाजपा समर्थक वोटों में गहरा बंटवारा था ऐसे में राजनीतिक विश्लेषक इस सीट को भाजपा के खाते से बाहर मानकर चल रहे थे, किंतु समय ने साबित किया कि संगठन की एकजुटता और जनविश्वास ही अंततः निर्णायक शक्ति है। यही हाल बिलासपुर सीट का था जहां दिलीप सिंह जूदेव के मुकाबले कांग्रेस के दिग्गज नेता की धर्मपत्नी श्रीमती रेणु जोगी मुकाबले में थीं। छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद अजीत जोगी परिवार सभी चुनावों में विजयी रहा है। यह पहला चुनाव था जिसमें भाजपा संगठन ने अपने नेता दिलीप सिंह जूदेव को मैदान में उतार यह साबित किया कि वे राज्य के आज भी सबसे लोकप्रिय नेता हैं। इसके साथ ही उस मिथक को भी तोड़ दिया कि जोगी परिवार राज्य में अविजित है।

सत्ता और संगठन का अनोखा समन्वयः
छत्तीसगढ़ शायद उन राज्यों में है जहां उसके गठन से ही सत्ता और संगठन का रिश्ता बेहतर रहा है। स्व.कुशाभाऊ ठाकरे, गोविंद सारंग, लखीराम जी अग्रवाल,पंढ़रीराव कृदत्त, लरंग साय जैसे संगठनकर्ताओं की आत्मा आज निश्चित रूप से छत्तीसगढ़ भाजपा का ऐसा विकास देखकर सुख पाती होगी। संगठन और सरकार के मतभेद आजतक किसी रूप में सामने नहीं आए। इसका श्रेय निश्चय ही राज्य भाजपा के पदाधिकारियों और सरकार के मुखिया डा. रमन सिंह को जाता है। लगातार चुनावों की जीत लोगों में अहंकार और श्रेय लेने की होड़ जगाती है किंतु यहां मुखिया मुख सो चाहिए खानपान में एक का मुहावरा साकार होता दिखता है। सर्वश्री सौदान सिंह, रामप्रताप सिंह का नेतृत्व पार्टी के लिए ऐसे अवसर में बदल गया है कि आज केंद्रीय नेतृत्व भी छत्तीसगढ़ भाजपा की ओर बहुत आशा भरी निगाहों से देखता है। शायद यही कारण है भाजपा के सामने विपक्षी दल बौने साबित हो रहे हैं। विधानसभा चुनावों जहां भाजपा को 50 सीटें मिली थीं वही इस लोकसभा चुनाव में उसे 61 विधानसभा सीटों पर बढ़त मिली है। यानि संगठन के सतत प्रयासों से सरकार की लोकप्रियता का ग्राफ कायम ही नहीं है वरन लगातार बढ़ रहा है।
यूं नहीं होता करिश्माः
राजनीति में करिश्मे यूं ही घटित नहीं होते इसके एक लंबी रणनीति और साधना की जरूरत होती है। छत्तीसगढ़ भाजपा के कार्यकर्ताओं की मेहनत और संगठन की रणनीति को रेखांकित किए बिना इस करिश्मे को समझना आसान नहीं है। यह बात लगभग मानी हुय़ी है कि डा. रमन सिंह स्वभाव से बहुत प्रचारप्रिय नहीं हैं। मुख्यमंत्री होने के नाते उनपर मीडिया फोकस रहता है किंतु वे स्वयं के प्रयास से प्रचारित होने का जतन करने वाले लोंगों में नहीं है। किंतु यह सौभाग्य ही कहा जाएगा कि उन्हें एक संगठन,ऐसा राज्य और ऐसी जनता मिली है जो उनकी इस सादगी, सदभाव भरे व्यवहार को बहुत पसंद करती है। वे इसीलिए आज अपने समकालीन नेताओं में सबसे आगे दिखने लगे हैं। छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य है जहां की जनता बेहद सीधी-साधी, सदभाव से रहने वाली, बहुत प्रतिक्रिया न करते हुए आत्मसंतोष भरा जीवन जीने वाली है, साथ ही साथ निवासियों में धार्मिक भावना भी बहुत है। ऐसे लोगों को राजनीति के आज के छल-छद्म से अलग ऐसा नेतृत्व मिला जिसका आचरण राज्य की तासीर से मेल खाता है। डा. रमन सिंह की सफलता और जनता के उनपर भरोसे को इस नजर से भी देखा जाना चाहिए। इस भरोसे को आगे बढ़ाने में संगठन की रणनीति काम आयी। संगठन ने सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और उसके परिणाम जाहिर तौर पर लाभकारी साबित हुए।

काम आई विकास की राजनीतिः
एक नया राज्य होने के कारण आम जन की आकांक्षाएं उफान पर थीं। संसाधनों की विपुलता के बावजूद एक पिछड़े क्षेत्र का तमगा इस इलाके पर लगा था। राज्य की सत्ता में आने के बाद भाजपा और उसके मुख्यमंत्री ने विकास को अपना एजेंडा बनाया। भावनात्मक नारेबाजी से अलग काम करने वाली सरकार का तमगा हासिल करने के लिए सरकार जुटी। सबसे पहले तो गरीब सर्मथक योजनाओं के माध्यम से सरकार ने जनता को भरोसा दिलाया कि आखिरी पंक्ति में खड़े लोग उसके एजेंडे में सबसे पहले हैं। तीन रूपए किलो चावल से लेकर आज अंत्योदय कार्ड पर एक रुपए किलो चावल एक ऐसी ही योजना साबित हुयी जिसने डा. रमन सिंह को चाउरवाले बाबा का प्यारा संबोधन दिलाया। चावल की योजना को लागू करने के लिए सरकार और संगठन ने एक दिन में एक साथ छत्तीसगढ़ के एक जिले को छोड़कर सबमें कार्यक्रम आयोजित किए, जिसके तहत इन जिला केंद्रों पर भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं ने चावल योजना की शुरूआत की। एक साथ एक छोटे से राज्य में इतने स्थानों पर हुए आयोजन ने एक ही दिन में इस योजना को गांव-गांव तक लोकप्रिय बना दिया। मीडिया ने इस उत्सव को कारपोरेट बांबिग की संज्ञा दी। इसी तरह गांव चलो-घर-घर चलो अभियान के भाजपा के कार्यकर्ता लगभग 20 हजार गांवों तक पहुंचे। अपनी विकास योजनाओं की जानकारी दी और यूपीए सरकार के खिलाफ माहौल बनाया। आमतौर सत्ता हासिल करने के बाद सरकारी मशीनरी तो काम करती है पर संगठन बैठ जाता है किंतु राज्य भाजपा ने सत्तारूढ़ दल होने के बावजूद अभियान जारी रखे। इसी तरह ग्राम सुराज अभियान के माध्यम से सरकार जनता के पास पहुंची। मुख्यमंत्री जब औचक किसी गांव में उतरकर आमजनता की बातें सुनते हैं तो इससे जनविश्वास तो बहाल होता ही है, सरकारी योजनाओं की वास्तविकता का भी पता चलता है। इसके बाद विकास यात्रा नाम से जो कार्यक्रम चलाया गया,वह भी मूलतः सरकारी आयोजन था जिसमें राज्य के मुख्यमंत्री ही नहीं उनके मंत्री भी अलग-अलग इलाकों में जाकर विकास योजनाओं की हकीकत मापते थे और जनता से सीधा संवाद करते थे। इससे जनता में एक काम करने और सतत संपर्क में रहने वाली सरकार की छवि तो बनी ही। विकास संचार के नए आयाम बने जिसमें जनता अपने नेता और सरकार से एक रिश्ता बना पा रही थी, सरकार को फीडबैक भी मिल ही रही थी। बाद में इस प्रयोग को इसी नाम से बिहार सरकार ने भी अपनाया। संसदीय सम्मेलनों के माध्यम से पार्टी काडर को जगाए और एकजुट रखने के प्रयास भी हुए। कुल मिलाकर सरकार एक काम करती हुई, भरोसा जगाती हुयी संस्था में बदलती नजर आयी,जिसके चलते भाजपा ने अपने परंपरागत वोट आधार से अलग भी अपना विस्तार किया। वह चाहे शहरी इलाके हों या सूदूर सरगुजा और बस्तर के वनवासी क्षेत्र। यह विस्तार भौगोलिक और सामाजिक दोनों था, जिससे पार्टी का आधार व्यापक होता नजर आ रहा है। शायद यही कारण है बहुजन समाज पार्टी जैसे दल बहुत ताकत झोंकने के बावजूद यहां बड़ी सफलताएं नहीं पा सके न ही कांग्रेस के स्टार प्रचारकों से पार्टी को बहुत मदद मिली। यही कारण है आज छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का संगठन काफी कमजोर हो गया है।

नक्सलवाद के खिलाफ प्रतिबद्धताः
नक्सलवाद के खिलाफ यह पहली ऐसी सरकार है, जो इतनी प्रखरता के साथ हर मोर्चे पर जूझ रही है। सिर्फ़ बढ़ती नक्सली घटनाओं का जिक्र न करें, तो राज्य सरकार की सोच नक्सलियों के खिलाफ ही रही है। डा. रमन सिंह की सरकार की इस अर्थ में सराहना ही की जानी चाहिए कि उसने राजकाज संभालने के पहले दिन से ही नक्सलवाद के खिलाफ अपनी प्रतिबध्दता का ऐलान कर दिया था। राजनैतिक लाभ के लिए तमाम पार्टियां नक्सलियों की मदद और हिमायत करती आई हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। इन आरोपों-प्रत्यारोपों से अलग डा. रमन सिंह की सरकार ने पहली बार नक्सलियों को उनके गढ़ में चुनौती देने का हौसला दिखाया है। राज्य सरकार की यह प्रतिबध्दता उस समय और मुखर रूप में सामने आई, जब श्री ओपी राठौर राज्य के पुलिस महानिदेशक बनाए गए। डा. रमन सिंह और श्री राठौर की संयुक्त कोशिशों से पहली बार नक्सलवाद के खिलाफ गंभीर पहल देखने में आई। वर्तमान डीजीपी विश्वरंजन की कोशिशों को भी उसी दिशा में देखा जाना चाहिए। होता यह रहा है कि नक्सल उन्मूलन के नाम पर सरकारी पैसे को हजम करने की कोशिशों से ज्यादा प्रयास कभी नहीं दिखे। पहली बार नक्सलियों को वैचारिक और मैदानी दोनों मोर्चों पर शिकस्त देने के प्रयास शुरू हुए हैं। यह अकारण नहीं है कि सलवा जुड़ूम का आंदोलन तो पूरी दुनिया में कुछ बुध्दिजीवियों के चलते निंदा और आलोचना का केंद्र बन गया किंतु नक्सली हिंसा को नाजायज बताने का साहस ये बुध्दिवादी नहीं पाल पाए। जब युध्द होते हैं, तो कुछ लोग अकारण ही उसके शिकार होते ही हैं। संभव है इस तरह की लड़ाई में कुछ निर्दोष लोग भी इसका शिकार हो रहे हों। लेकिन जब चुनाव अपने पुलिस तंत्र और नक्सल के तंत्र में करना हो, तो आपको पुलिस तंत्र को ही चुनना होगा। क्योंकि यही चुनाव विधि सम्मत है और लोकहित में भी। पुलिस के काम करने के अपने तरीके हैं और एक लोकतंत्र में होने के नाते उसके गलत कामों की आलोचना तथा उसके खिलाफ कार्रवाई करने के भी हजार हथियार भी हैं। क्योंकि पुलिस तंत्र अपनी तमाम लापरवाहियों के बावजूद एक व्यवस्था के अंतर्गत काम करता है, जिस पर समाज, सरकार और अदालतों की नजर होती है। प्रदेश के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह की इसलिए तारीफ करनी पड़ेगी कि पहली बार उन्होंने इस 'छद्म जनवादी युध्द को राष्ट्रीय आतंकवाद की संज्ञा दी। इसका कारण यह भी है कि भारतीय जनता पार्टी जिस 'विचार परिवार से जुड़ी है वह चाहकर भी माओवादी अतिवादियों के प्रति सहानुभूति नहीं रख सकती। एक वैचारिक गहरे अंर्तविरोध के नाते भारतीय जनता पार्टी की सरकार राजनैतिक हानि सहते हुए भी माओवाद के खिलाफ ही रहेगी। यह बात कहीं न कहीं नक्सल प्रभावित इलाकों में डा. रमन सिंह के पक्ष में गयी। विधानसभा चुनावों में बस्तर की 12 में 11 सीटें जीतकर भाजपा ने साबित किया कि लोग आतंक के खिलाफ भाजपा की जंग के विश्वसनीय मानते हैं। इस लोकसभा चुनाव में भी कांकेर, सरगुजा और बस्तर की जीत यही कहती है।
भाजपा का रमन ब्रांडः
चुनाव के परिणामों के बाद यह विचार सबल हो उठा है भाजपा का डा. रमन ब्रांड आज सबसे लोकप्रिय है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह अगर अपनी सरकार के छः साल से अधिक का समय पूरा करने के बावजूद जनप्रिय बने हुए हैं, तो यह सोचना बहुत मौजूं है कि आखिर उनके व्यक्तित्व की ऐसी क्या खूबियां हैं, जिन्होंने उन्हें सत्ता के शिखर पर होने के बावजूद अलोकप्रियता के आसपास भी नहीं जाने दिया। देखा जाए तो डा. रमन सिंह एक मुख्यमंत्री से कहीं ज्यादा मनुष्य हैं। उनका मनुष्य होना उन सारे इंसानी रिश्तों और भावनाओं के साथ होना है, जिसके नाते कोई भी व्यक्ति वामन से विराट हो जाता है। मुख्यमंत्री बनने के पूर्व डा. रमन सिंह के व्यक्तित्व की तमाम खूबियां बहुज्ञात नहीं थीं। शायद उन्हें इन चीजों को प्रगट करने का अवसर भी नहीं मिला। वे कवर्धा में जरूर 'गरीबों के डाक्टर के नाम से जाने जाते रहे किंतु आज वे समूचे छत्तीसगढ़ के प्रिय डाक्टर साहब हैं। उनकी छवि इतनी निर्मल है कि वे बड़ी सहजता के साथ लोगों के साथ अपना रिश्ता बना लेते हैं। राजनेताओं वाले लटकों-झटकों से दूर अपनी सहज मुस्कान से ही वे तमाम किले इस तरह जीतते चले गए। सरकारी तंत्र की तमाम सीमाओं के बावजूद मुख्यमंत्री की नीयत पर शक नहीं किया जा सकता। पहले दिन से ही उनके ध्यान में आखिरी पंक्ति पर खड़े लोग ही हैं। राज्य शासन की ज्यादातर योजनाएं इसी तबके को ध्यान में रखते हुए बनाई गईं। आदिवासियों को गाय-बैल, बकरी देने की बात हो, उन्हें चरण पादुका देने की बात हो, गरीब छात्राओं को साइकिल देने या पच्चीस पैसे में नमक और तीन रुपया किलो चावल सबका लक्ष्य अंत्योदय ही है। इस तरह की तमाम योजनाएं मुख्यमंत्री की दृष्टि और दृष्टिपथ ही साबित करती हैं। विकास की महती संभावनाओं के साथ आज भी पिछड़ेपन और गरीबी के मिले-जुले चित्र राज्य की सर्वांगीण प्रगति में बाधक से दिखते हैं। अमीर और गरीब के बीच की खाई इतनी गहरी है कि सरकार की अत्यंत सक्रियता के बिना विकास के पथ पर बहुत पीछे छूट गए लोगों को मुख्य धारा से जोड़ पाना संभव नहीं है। भूमि, वन, खनिज और मानव संसाधन की प्रचुरता के बावजूद यह राज्य बेहद चुनौतीपूर्ण है, जहां पर एक तरफ विकास की चौतरफा संभावनाएं दिखती हैं, तो दूसरी तरफ बहुत से घरों में न सिर्फ फाका होता है, बल्कि रोजगार की तलाश में नित्य पलायन हो रहा है। भूख, कुपोषण और महामारी जैसे दृश्य यहां बहुत आम हैं। इस दृश्य से निजात दिलाना राज्य भाजपा की एक बड़ी चुनौती है।

अब सपनों को सच करने की जिम्मेदारीः
एक नवंबर, 2000 को अपना भूगोल रचने वाला यह राज्य आज भी एक 'भागीरथ के इंतजार में है। छत्तीसगढ़ का भौगोलिक क्षेत्रफल 1, 35, 194 वर्गकिलोमीटर है, जो भारत के भौगोलिक क्षेत्र का 4.1 प्रतिशत है। क्षेत्रफल की दृष्टि से छत्तीसगढ़ देश के सोलह राज्यों से बड़ा है। यह कई छोटे-छोटे राष्ट्रों से भी विशाल है। छत्तीसगढ़ का क्षेत्रफल पंजाब, हरियाणा और केरल इन तीनों राज्यों के योग से ज्यादा है। जाहिर है इस विशाल भूगोल में बसने वाली जनता छत्तीसगढ़ की सत्ता पर बैठे मुखिया की तरफ बहुत आशा भरी निगाहों से देखती है। इन अर्थों में डा. रमन सिंह के पास एक ऐसी कठिन जिम्मेदारी है, जिसका निर्वहन उन्हें करना ही होगा। इस विशाल भूगोल में सालों साल से रह रही आबादी अपनी व्यापक गरीबी और पिछड़ेपन से मुक्त होने का इंतजार कर रही है। भाजपा और उसके नेता ने राज्य की जनता ने लगातार भरोसा जताते हुए बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। विरासत में मिली इन तमाम चुनौतियों की तरफ देखना और उनके जायज समाधान खोजना किसी भी राजसत्ता की जिम्मेदारी है। मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह को इतिहास की इस घड़ी में यह अवसर मिला है कि वे इस वृहतर भूगोल को उसकी तमाम समस्याओं के बीच एक नया आयाम दे सकें। सालों साल से न्याय और विकास की प्रतीक्षा में खड़ी 'छत्तीसगढ़ महतारी की सेवा के हर क्षण का रचनात्मक उपयोग करें। बहुत चुनौतीपूर्ण और कंटकाकीर्ण मार्ग होने के बावजूद उन्हें इन चुनौतियों को स्वीकार करना ही होगा, क्योंकि सपनों को सच करने की जिम्मेदारी इस राज्य के भूगोल और इतिहास दोनों ने उन्हें दी है। जाहिर है वे इन चुनौतियों से भागना भी नहीं चाहेंगे। फिलहाल तो राज्य की आम जनता इस विजय पर उन्हें शुभकामनाओं के सिवा क्या दे सकती है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. raman singh badhai ke patra hain
    narendra modi aur raman singh ne dikha diya hai ki bjp me bhi yogya leaders hain
    -roshan premyogi

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  2. जयराम दास.31 मई 2009 को 1:19 am

    ज्ञान,गरीबी,हरी भजन...कोमल वचन अदोष.
    तुलसी कबहू ना छोडिये..क्षमा,शील,संतोष.

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